गणेश चतुर्थी पर गणपति बप्पा मौर्या के नारों से गूंजेगा घरों का कोना-कोना

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  • संवाददाता || ई-रेडियो इंडिया
गणेश चतुर्थी, विघ्नहर्ता श्रीगणेश जी के जन्मोत्सव का पर्व है। प्रत्येक भारतीय के लिए यह एक महत्वपूर्ण त्योहार है, परंतु महराष्ट्र में इसे विशेष धूमधाम के साथ मनाया जाता है। 22 अगस्त 2020 को पड़ने वाली इस गणेश चतुर्थी पर मिट्टी के गणेश स्थापित करें, मिट्टी पंचतत्वों से बनी होती है और उसमें स्वाभाविक पवित्रता होती है। 

शिवपुराण में श्रीगणेश जन्म की कथा में बताया है कि देवी पार्वती ने पुत्र की इच्छा से मिट्टी का ही पुतला बनाया था, फिर शिवजी ने उसमें प्राण डाले थे। गणेशजी को वक्रतुंड कहा गया है, यानी इनकी सूंड दायें या बायें हाथ की ओर टेढ़ी होनी चाहिए। इस दिशा को समझना अति आवश्यक है, बायीं ओर मुड़ी हुई सूंड मोक्षप्राप्ति को प्रबल करता है, वहीं दायीं और मुड़ी हुई सूंड से लौकिक और भौतिक सुख मिलता है। 

गणेश जी का वाहन भी है तथा जिस मूर्ति में उनका वाहन न हो, ग्रंथों के अनुसार, ऐसी मूर्ति की पूजा करने से बचना चाहिए। गणेश जी को धूम्रवर्ण, यानी धुएँ के समान रंग वाले तथा भालवर्ण, यानी जिनके ललाट पर चंद्रमा विराजमान हों, भी कहा जाता है। गणेश पूजन के लिए चतुर्थी पर सुबह जल्दी उठकर नहाने के बाद उनकी मूर्ति पर शुद्ध घी और सिंदूर मिलाकर श्रृंगार करें, फिर जनेऊ धारण करवाकर मूर्ति को घर की उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण में स्थापित करें। धूप-दीप जलाएं, दूर्वा, फल-फूल अर्पित करें, लड्डुओं का भोग लगाएं और कर्पूर जलाकर आरती करें। गणेश उत्सव में रोज सुबह-शाम इस प्रकार से पूजा करें। अनंत चतुर्दशी पर इस मूर्ति का विसर्जन करें। इस प्रकार, मन से पूजा करने से करोड़ों यज्ञों का फल मिलता है, श्री गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूर्ण करने वाला व्रत माना जाता है।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ: 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा
अर्थ – ‘घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर काय, करोड़ सूर्य के समान महान प्रतिभाशाली। मेरे प्रभु, हमेशा मेरे सारे कार्य बिना विघ्न के पूरे करें (करने की कृपा करें)’  

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