निजीकरण तो बहाना है असली मकसद रियासतीकरण है: धर्मेंद्र मलिक

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  • संवाददाता, ई-रेडियो इंडिया
मेरठ। राष्ट्रीय हिंद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्मेंद्र मलिक ने भारत सरकार के निजीकरण रवैया का जमकर विरोध किया। पत्रकारों से बातचीत में धर्मेंद्र मलिक ने बताया कि 70 साल बाद बाजी पलट गई है और हम जहां से चले थे वहीं पहुंच रहे हैं, अंतर इतना है कि दूसरा रास्ता चुन कर।

देश जब 1947 में आजाद हुआ उस समय नई नवेली सरकार और मंत्री देश की रियासतों को आजाद भारत का हिस्सा बनाने के लिए संघर्ष करते दिखे थे। 562 रियासत को भारत में मिलाने के लिए हर प्रकार की नीति का इस्तेमाल किया जा रहा था क्योंकि देश की सारी संपत्ति इन्हीं रियासतों के पास थी।

कुछ प्रिया सरदारों ने प्रबल विरोध भी किया था मगर तत्कालीन सरकार कूटनीति से इन्हें आजाद भारत का हिस्सा बनाकर भारत के नाम से एक स्वतंत्र लोकतंत्र की स्थापना की। फिर देश की सारी संपत्ति सिमटकर गणतांत्रिक विद्या वाले संप्रभुता प्राप्त भारत के पास आ गई।

रेल, बैंक, कारखानों आदि का विलय भारत सरकार में किया गया और एक शक्तिशाली 21 वीं सदी के भारत का निर्माण हुआ। मात्र 70 साल बाद समय और विचार ने करवट ली, निजीकरण वाली ताकतें पूंजीवादी व्यवस्था के चलते राजनीति पर सवार होकर राजनीतिक परिवर्तन पर एकाग्र हो गईं। 

अब कुछ नए रजवाड़े होंगे कुछ पूंजीपति घराने और कुछ बड़े-बड़े राजनेता पुराने देश के रियासतदारों में गिनती शुरू करा चुके हैं। निजीकरण की आड़ में पूरे देश की सारी संपत्ति देश के चंद पूंजीपति घराना को सौंप देने की कुत्सित चाल चली जा रही है, ऐसे में निश्चित ही लोकतंत्र का वजूद खत्म हो जाएगा।

देश उन पूंजीपतियों के अधीन होगा जो परिवर्तित रजवाड़े की शक्ल में सामने उभर कर आएंगे यानी निजीकरण सिर्फ देश को 1947 के पहले वाली दौर में ले जाने की सनक मात्र है, जिसके बाद सत्ता के पास सिर्फ दादागिरी करने के सिवा अन्य कार्य नहीं होगा। दुखद है कि 562 रियासतों की संपत्ति मात्र चंद पुंजीपति घरानों को सौंप दी जाएगी। यहा मुफ्त इलाज के अस्पताल धर्मशाला या पियाऊ नहीं बनवाने वाले जैसा की रियासतों के दौर में होता था यह हर कदम पर पैसा वही करने वाले अंग्रेज एवं जुल्मी जमीदार होंगे। 

निजीकरण एक व्यवस्था नहीं बल्कि रियासतीकरण का उदय है, कुछ समय बाद नव रियासतीकरण वाले लोग कहेंगे कि देश के सरकारी अस्पतालों स्कूलों कॉलेजों से कोई लाभ नहीं है अतः इनको भी निजी हाथों में दे दिया जाए। तो ऐसे में जनता का क्या होगा अगर देश की आम जनता प्राइवेट स्कूल और हॉस्पिटलों के लोकतंत्र से संतुष्ट है तो रेलवे को भी निजी हाथों में जाने का स्वागत करें। हमने बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए सरकार बनाई थी ना कि सरकारी संपत्ति को दलाली के लिए बेचने को। सरकार घाटे का बहाना बनाकर सरकारी संसाधनों को बेच क्यों रही है अगर प्रबंधन सही नहीं तो सही करें। भागने से तो काम नहीं चलेगा यह एक साजिश के तहत सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है राष्ट्रीय हिंद समाज पार्टी निजीकरण का पुरजोर विरोध करेगी।
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