राजनीति

मायावती के लिये ‘दूसरे चंद्रशेखर’ बनेंगे आकाश आनंद

मंसूर उस्मानी साहब कहते हैं कि- वक़्त होता है बेवफ़ा यारों, आदमी बेवफ़ा नहीं होता

आजकल आकाश आनंद, चंद्रशेखर रावण और बहन मायावती जी का वक्त बदल रहा है… किसी के लिये अच्छा हो रहा है तो किसी के लिये बुरा… दलितों में आजकल अपने नेता को लेकर बड़ा असमंजस का माहौल है एक ओर आकाश आनंद को पार्टी से बाहर कर देना और दूसरी ओर चंद्रशेखर आजाद के रूप में दलितों के सामने विकल्प का आना बता रहा है कि आने वाले समय में देशभर के दलितों को एक राय होकर अपना नेता चुनना होगा।

दरअसल इस वक्त एक बड़ी चिंता जताई जा रही है-

पहली ये कि क्या पार्टी से निकाले जाने के बाद आकाश आनंद मायावती के लिये दूसरे चंद्रशेखर रावण बनेंगे?
और दूसरा सवाल यह है कि क्या दलितों के नेता के रूप में चंद्रशेखर रावण दूसरे ‘मायावती’ बनेंगे?

साथियों, दलित राजनीति के लिहाज से 1980 का दशक बेहद महत्वपूर्ण है। दलित चेतना को उभारने में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक रहे कांशीराम की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1980 के दशक में कांशी राम के शिष्य के तौर पर मायावती का चेहरा भारतीय राजनीति की क्षितिज पर उभरने लगा। दलित विचारधारा को उन्होंने आंदोलन के रूप में संगठित किया और राजनीतिक दल के रूप जनता के सामने विचारों को पेश किया।

बदलते समय के साथ मायावती का बहुजन का नारा सर्वजन में तब्दील हुआ। सर्वजन ने उनकी पुकार सुनी और 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में मायावती को जबरदस्त फायदा मिला। लेकिन 2012 से लेकर 2017 के चुनावी नतीजों ने बसपा को वेंटिलेटर पर ला दिया।

बसपा के बहुजन और सर्वजन के नारों के बीच राजनीतिक फलक पर दो महत्वपूर्ण चेहरे चंद्रशेखर ऊर्फ रावण और आकाश आनंद के रूप में अवतरित हुए हैं। इन नेताओं की ओर 20 करोड़ से ज्यादा की दलित आबादी अपनी नजरें गड़ाये देख रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मायावती अपनी पहचान को बरकरार रखने में कामयाब हो पाएंगी या नए चेहरों के बीच उनकी आभा निस्तेज हो जाएगी।

सबसे पहले बात करते हैं आकाश आनंद की–

इस्माईल राज़ साहब ने आनंद कुमार के उपर एकदम फिट बैठने वाला शेर कहा है कि…

उस वक़्त के सदमों ने मुझे चाट लिया है
जो वक़्त अभी मैं ने गुज़ारा भी नहीं था

आकाश आनंद 2017 में लंदन से पढ़ाई कर लौटे थे. उसके बाद वो बसपा की गतिविधियों में सक्रिय हो गए थे.उन्हें 2019 में बसपा का नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाया गया था. लेकिन पिछले साल लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया था. मायावती ने कहा था कि आकाश अभी परिपक्व नहीं हुए हैं. बसपा ने उन पर यह कार्रवाई तब की थी, जब उन्होंने अपनी रैलियों में सीधे पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर हमले शुरू किए थे।

बसपा के फैसले को कुछ लोगों ने बीजेपी के दबाव में लिया गया फैसला बताया था. लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर के पद पर बहाल कर दिया गया था. इस पद पर वो रविवार तक रहे. बसपा ने आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ को पद से हटाते हुए कहा है कि वो पार्टी में गुटबाजी को हवा दे रहे हैं. आकाश पर अपने ससुर के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया गया है।

लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर जारी प्रचार अभियान के बीच बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को दोनों महत्वपूर्ण पदों से हटा दिया है. आकाश आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर और बसपा प्रमुख मायावती की उत्तराधिकारी घोषित किया गया था. मायावती ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर पोस्ट कर के इसकी जानकारी दी. मायावती ने उन्हें पद से हटाने को लेकर किए गए पोस्ट में लिखा कि पार्टी व मूवमेन्ट के व्यापक हित में पूर्ण परिपक्वता आने तक अभी उन्हें इन दोनों अहम जिम्मेदारियों से अलग किया जा रहा है।

पार्टी से निकाले जाने के बाद आकाश आनंद ने अभी तक कुछ नहीं कहा है. वो अभी चुप हैं. ऐसे में आने वाले दिन काफी महत्पूर्ण है. बसपा की जो कार्यशैली रही है, उससे यह उम्मीद लगाई जा रही है कि आकाश आनंद को कभी भी पार्टी में वापस नहीं लिया है. क्योंकि राज्य सभा सदस्य रामजी गौतम के साथ आकाश के पिता राजाराम को भी बसपा का नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाया गया है. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि कोई बीच का रास्ता निकाला जाए. हालांकि इसके लिए उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि वो अपने ससुर के प्रभाव में नहीं हैं।

एक संभावना यह भी हो सकती है कि आकाश आनंद बसपा से अलग होकर अपना कोई सामाजिक राजनीतिक संगठन खड़ा करें. अगर वो ऐसा करते हैं तो यह राह काफी कठिन होगी. लेकिन इसमें बसपा के उन कार्यकर्ताओं का साथ मिल सकता है जो आकाश को पसंद करते हैं और उनमें बसपा का भविष्य देखते हैं. उनके साथ वो कार्यकर्ता और नेता भी आ सकते हैं जिन्हें या तो पार्टी से निकाला गया है या जो खुद ही पार्टी छोड़कर चले गए हैं या जो पार्टी में रहते हुए भी निष्क्रिय हैं।्र

उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से सांसद चंद्रशेखर कभी बसपा में तो नहीं रहे, लेकिन वो बसपा से नाखुश लोगों के दम पर ही उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे राज्यों में अपनी पार्टी आजाद समाज पार्टी का संगठन खड़ा करने में सफल रहे हैं. लेकिन यहां नकारात्मक बात यह रही है कि एक-दो लोगों को छोड़ दिया जाए तो बसपा से निकलकर अलग संगठन या पार्टी खड़ी करने वालों को बहुत सफलता नहीं मिली है।

इसकी वजह यह है कि दलित समाज पर अभी भी सबसे अधिक पकड़ मायावती का ही माना जाता है. लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती की यह पकड़ दिन प्रति दिन कमजोर पड़ रही है. बसपा की जगह बीजेपी और समाजवादी पार्टी की पकड़ दलित समाज में मजबूत होती जा रही है.

कुल मिलाकर आकाश आनंद मायावती के लिये राजनीति में दूसरे ‘चंद्रशेखर रावण’ बनकर उभरेंगे ऐसी प्रबल संभावना है।

अब बात करते हैं चंद्रशेखर रावण की

चंद्रशेखर रावण इन दिनों दलित राजनीति के फायरब्रांड नेता के रूप में सामने आ रहे हैं… चंद्रशेखर आजाद रावण को एक दलित नेता की तरह ही देखा जाता है। इस लोकसभा चुनाव में जब बसपा को, खासकर उत्तर-प्रदेश में एक भी सीट हासिल नहीं हुई, तब एकबारगी सबकी नजर चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ की भारी बहुमत से हुई जीत की ओर गई। आजाद ने उत्तर प्रदेश की नगीना सीट पर 51.19 प्रतिशत वोट हासिल किया। जबकि वहां बसपा को महज 1.33 प्रतिशत वोट ही मिल सका। आजाद ने अपने प्रतिद्वंदी भाजपा के ओमप्रकाश को डेढ़ लाख से अधिक वोटों से हराया। यहां सपा को 10.22 प्रतिशत वोट मिला।

2019 की लोकसभा के चुनाव के समय में बसपा के गिरीश चंद्र ने भाजपा के यशवंत सिंह को 1.66 लाख वोटों से हराया था। इस बार बसपा की जगह चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ ने लिया और पिछले के मुकाबले थोड़े कम वोट के अंतर पर भाजपा के उम्मीदवार को हरा दिया। इस बार बसपा की जगह आजाद समाज पार्टी के नेता आजाद की इस जीत के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। मुख्य निष्कर्ष तो यही हैः क्या आजाद समाज पार्टी बसपा की जगह ले रही है? क्या चंद्रशेखर आजाद मायावती की जगह ले रहे हैं?

इसका जवाब शायद हां में होगा… क्योंकि जब तक आकाश आनंद कोई स्टेप उठायेंगे तब तक चंद्रशेखर आजाद कोसों दूर निकल चुके होंगे… और ऐसे में आजाद समाज पार्टी… बहुजन समाज पार्टी का मजबूत विकल्प बन चुकी होगी….

मायावती का राजनीतिक उत्थान और अवसान

मायावती ने अपनी लोकप्रिय किताब ‘मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेंट का सफरनामा’ में लिखा है कि जिस तरह बहुजन समाज पार्टी बहुजन समाज के गौरव का प्रतीक है, वैसे ही बुद्धिजीवियों की नजर में मायावती भारतीय राजनीति में एक ऐसी नेता बनकर उभरीं हैं जिनकी आलोचना की जा सकती है, आरोप भी लगाए जा सकते हैं, लेकिन कोई उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकता है। मायावती ने आगे लिखा है कि मैंने अपने आपको एक ऐसी चट्टान की तरह ढाला है जो पिघलती नहीं, बल्कि नदियों का रास्ता बदलती है।

1991 में बीएसपी 12 सीटें जीती और 2007 में पार्टी ने सर्वाधिक 206 सीटें हासिल की। लेकिन 2017 में पार्टी 27 सीटों पर सिमटकर रह गई। पार्टी के बुरे प्रदर्शन से परेशान मायावती ने दो स्तरीय राजनीतिक योजना को सामने रखा जो कि राजनीति में प्रासंगिक बने रहने और अपने परिवार को कानूनी कार्यवाहियों से बचाने की उनकी हड़बड़ी को दिखाता है।

आखिरी बार कांग्रेस के साथ गठबंधन में 1996 में चुनाव लड़ने के बाद से कड़ा रुख बनाए रखने वाली मायावती ने पहली बार बीजेपी विरोधी फ्रंट में शामिल होने की इच्छा जाहिर की है। आज तक उन्होंने अकेले ही रास्ता तय किया। उन्हें जिनकी जरूरत थी उनसे नाता तोड़ा और जिन्हें उनकी जरूरत हो सकती थी, कठोरता पूर्वक सहयोगियों को सत्ता से हटाया।

राजनीति में समीकरण, लोगों की उम्मीद समय के साथ बदलती रहती है। आप कभी भी भावनात्मक राजनीति को लंबे समय तक हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। जिस वक्त कांशीराम और मायावती यूपी की सड़कों और गलियों में घूमा करते थे उस समय स्थितियां अलग थी।

1980 के दशक का समाज सामंती सोच से ज्यादा प्रभावित था। आप उसकी झलक यूपी में 90 के दशक में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार में देख सकते हैं। लेकिन राजनीति की गुणा और गणित ने दोनों को एक दूसरे से अलग कर दिया, जिसका असर बसपा के अवसान के रूप में नजर आने लगा। समय के साथ बसपा ने बहुजन के नारे को त्याग कर सर्वजन के नारे पर भरोसा किया और वो 2007 में कामयाब भी हुआ। लेकिन प्रशासनिक नाकामी ने 2012 में बसपा को सत्ता से बाहर कर दिया।

इस बीच राष्ट्रीय फलक पर गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी अवतरित हो रहे थे। मोदी ने एक अलग तरह के राजनीतिक बदलाव का नारा बुलंद किया जिसका असर ये हुआ कि बसपा का देश के सबसे बड़े सूबे में सफाया हो गया। राजनीतिक तौर हासिए पर जाने की वजह से दलित समाज के नए चेहरों का उदय हुआ।

लेकिन इन दिनों दलित समाज के इस चेहरे का धुंधलापन देखने को मिल रहा है और राजनीति में वक्त का भंवरजाल तेजी से दूसरे लोगों को मौका देने की ओर अग्रसर है…

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