बिहार

बिहार में विस चुनाव का पहला चरण

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में गुरुवार को शाम पांच बजे तक 60.18 फीसदी मतदान से एक बात तो साफ हो गई है कि बिहार में लोग राजनीतिक मामले में बहुत परिपक्व हैं।

प्राय: यह माना जाता है कि जब ज्यादा वोट डाले जाते हैं तो समझ लेना चाहिए कि मतदाता ने सत्ता विरोधी मतदान किया है। तर्क इसके उल्टे भी दिए जाते हैं, वुछ लोगों का मानना है कि सत्ता पक्ष में रुझान होने के कारण भी मतदान बढ़ जाते हैं। इसलिए सत्ता पक्ष के समर्थक कहते हैं कि उनके गठबंधन में शामिल पार्टियों को ही मतदाताओं ने वोट दिया है।

इसलिए वोटों के प्रतिशतता बढ़ने के मामले में मात्र अनुमान ही लगाया जा सकता है। ज्यादा वोटिंग होने के कईं कारण होते हैं। पहला कारण तो यह होता है कि 5 सालों बाद चुनाव आते हैं तब तक मतदाताओं की संख्या बढ़ जाती है कितु यह दावा करना नितांत नासमझी होती है कि बढ़े हुए वोटर किसी एक ही पार्टी को वोट देंगे।

सच तो यह है कि न तो कम वोटिंग का मतलब वोटरों की उदासीनता है यानि कि वोटर सत्ता से संतुष्ट हैं और उन्हें सरकार बदलने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती बल्कि उदासीन वोटर मानते हैं कि जैसा चल रहा है, वैसा चलना चाहिए। इसी के साथ अनुमान लगाने वाले ज्यादा वोटिंग को बदलाव के पक्ष में मान लेते हैं। कई बार ये अनुमान गलत साबित होते हैं।

दरअसल वोटर तो अपना काम करते हैं और कई कारणों से प्रभावित होते हैं कितु भारतीय मीडिया विश्लेषण करने में भावानात्मक तरीका अपनाती है। आज भी यदि मीडिया पुरानी परिपाटी से ही समीक्षा करेगी तो वह इसी तरह के परिणाम निकालेगी। सच तो यह है कि युवा पीढ़ी कल्पना लोक में नहीं रहना चाहती बल्कि उसकी अपनी प्रॉब्लम्स और उसके अपने लक्ष्य हैं।

इसीलिए उनके सोचने के तरीके अपने बाप-दादाओं से बिलकुल बदल चुके हैं। किन्तु बिहार का मतलब मात्र जाति से ही जोड़ा जाता है। मसलन हमें अपना वर्चुअल नजरिया बदलना होगा। अब आग्मेंटेटिव दृष्टिकोण से वोटर राजनेताओं को देखता है। मीडिया की खबरें और मांग पर आधारित होती हैं इसीलिए अण्ड-बण्ड परिणाम भी अनुमान के आधार पर ही निकाले जाते हैं।

बहरहाल परिणाम कुछ भी हो छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़कर चुनाव के वक्त किसी बड़ी हिंसा की खबर न आना चुनाव आयोग की व्यवस्था पर संतोष व्यक्त किया जा सकता है। श्रेय सियासी पार्टियों को भी मिलना चाहिए जिन्होंने वोटिंग के दिन अपने प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशियों के प्रति सहिष्णुता का बर्ताव किया। चुनाव में जीत तो एक की ही होनी है, बाकी सारे प्रत्याशियों को तो हार का सामना ही करना पड़ेगा। लोकतंत्र में इसी सहिष्णुता का महत्व है। इतना जरूर है कि यह चुनाव एनडीए और इंडिया महागठबंधन दोनों के भविष्य के लिए निर्णायक साबित होने वाला है।

लोकतंत्र में सभी पार्टियां जीतने के लिए चुनाव लड़ती हैं, इसीलिए जीत के दावे सभी करती हैं कितु सत्ता वही हासिल कर पाती हैं जिन्हें जनता जनार्दन आशीर्वाद देती है। यही तो भारतीय लोकतंत्र की गरिमा है कि जीतने के बाद एक पार्टी या गठबंधन जन सेवा में जुट जाती है जबकि हारी हुईं पार्टी भी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के तहत जन सेवा करती है।

News Desk

आप अपनी खबरें न्यूज डेस्क को eradioindia@gmail.com पर भेज सकते हैं। खबरें भेजने के बाद आप हमें 9808899381 पर सूचित अवश्य कर दें।

Share
Published by
News Desk

Recent Posts

भोपाल में मुस्लिम लड़कियों ने हिंदू युवतियों से दोस्ती कर भाइयों से कराया दुष्कर्म

भोपाल में 'द केरल स्टोरी' जैसी साजिश का खुलासा हुआ है, जहाँ मुस्लिम युवतियों ने…

2 hours ago

कैबिनेट ने श्रीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर 1,677 करोड़ रुपए की लागत के सिविल एन्क्लेव के विकास को मंजूरी दी

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने मंगलवार…

3 hours ago

शराबबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को शराबबंदी मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन…

5 hours ago

चुनाव आयोग ने आयोजित किया राष्ट्रीय गोलमेज सम्मेलन, सीईसी बोले- ‘मतदाता हमारे केंद्र में’

मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार ने मंगलवार को राष्ट्रीय गोलमेज सम्मेलन का उद्घाटन किया।…

5 hours ago

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सिंगापुर दौरे के दूसरे दिन राज्य को वैश्विक निवेश का तोहफा

ग्लोबल निवेशकों का भरोसा: जेवर एयरपोर्ट के दो प्रोजेक्ट्स को 4,458 करोड़ रुपये के निवेश…

6 hours ago

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में शोधार्थी पवन कुमार को सर्वश्रेष्ठ मौखिक प्रस्तुति पुरस्कार

मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के भौतिकी विभाग के शोधार्थी पवन कुमार ने अंतरराष्ट्रीय…

1 day ago

This website uses cookies.