सर्वाधिक महत्व रखने वाली कार्तिक शुक्ल पक्ष देवता ने एकादशी इस बार 12 नवंबर मंगलवार को हर्षण योग में मनाई जाएगी। जिस कारण इस पर्व का महत्व कई गुना अधिक बढ़ गया है। क्योंकि, हर्षण योग बेहद शुभकारी माना जाता है। इस योग में भगवान विष्णु की पूजा करने से साधक को शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस पर्व पर तुलसी शालिग्राम का विवाह भी होता है। इसी धार्मिकता पर चलते वर्ष भर में सबसे ज्यादा विवाह भी इसी दिन होते हैं।
बता दे, 17 जुलाई देवशयनी एकादशी के दिन भगवान नारायण शयन मुद्रा के लिए क्षीरसागर में चले गए थे। उसके बाद अब देवोत्थनी एकादशी के दिन जागेंगे। बता दे, भगवान के सोने से लेकर जागने तक की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। जिस कारण विवाह आदि मांगलिक कार्यों पर चातुर्मास की अवधि में पूर्णता विराम लग गया था। लेकिन अब देवोत्थनी एकादशी से विवाह, देव प्रतिष्ठा, यज्ञोपवीत संस्कार, गृह प्रवेश, नवीन कार्य, सहित तमाम मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाएंगे। यानी अब हर जगह बैंड बाजा की धूम रहेगी भारी संख्या में विवाह कार्य संपन्न होंगे।
यह मुहूर्त का सिलसिला 15 दिसंबर तक चलता रहेगा। ज्योतिष के अनुसार 15 दिसंबर को सूर्य देव धनु राशि में प्रवेश करेंगे और एक माह तक रहेंगे।इस अवधि को खरमास कहा जाता है और इस खरमास की अवधि में मांगलिककार्य पूर्णता वर्जित मानेजाते हैं। उसके बाद 15 जनवरी को सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करेंगे और मांगलिक कार्यों का फिर से शुभारंभ हो जाएगा। साथ ही मांगलिक कार्यों का सिलसिला होली तक चलता ही रहेगा। विवाह के शुभ मुहूर्त नवंबर में 11, दिसंबर में 11, जनवरी में 9, फरवरी में 13, और मार्च में चार रहेंगे।
देवउठनी एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत हो जाएं। इसके बाद पूजा स्थल की अच्छे से साफ-सफाई करें। अब घर के आंगन में भगवान विष्णु के पद चिह्न बनाए और उन्हें ढक दें। इसके बाद एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। पूजा में प्रभु श्रीहरि को गन्ना, सिंघारा और फल आदि अर्पित करें, साथ ही उन्हें जनेऊ व नए वस्त्र चढ़ाएं।
रात्रि के समय में पूजा स्थल पर मां लक्ष्मी सहित देवी-देवताओं के निमित्त 11 दीपक जलाएं और वंदना करें। अब सपरिवार भगवान विष्णु और उनके पद चिह्नों की पूजा-अर्चना करें। देवों को जगाने के लिए घंटी और शंख ध्वनि का इस्तेमाल करें और जयकार लगाएं। अंत में देवउठनी एकादशी व्रत की कथा सुनें।
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