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एसआईआर को लेकर वेस्ट बंगाल समेत तीन राज्यों में अधिक रार

चुनाव आयोग ने मंगलवार, चार नवंबर को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का काम देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शुरू कर दिया। पहले चरण में बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ घर घर जाकर मतगणना प्रपत्र बांटेंगे। उसके बाद उन्हें इकट्ठा करके कंप्यूटर में अपलोड किया जाएगा और मसौदा सूची जारी होगी। बिहार में परीक्षण के तौर पर हुए एसआईआर से अलग इस बार पहले चरण में कोई दस्तावेज नहीं मांगा जा रहा है।

इस बार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक आधार भी स्वीकार किया जा रहा है। तभी यह माना जा रहा था कि इस बार एसआईआर में उतना टकराव नहीं होगा, जितना बिहार में हुआ,लेकिन एक तरफ तमिलनाडु की एमके स्टालिन सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाकर टकराव बढ़ाया है तो उधर ममता बनर्जी ने सड़क पर उतर कर एक बड़े प्रदर्शन के जरिए इसका विरोध जताया।

केरल में भी ऐसा ही रुख है। इन तीनों राज्यों में भाजपा विरोधी पार्टियों की सरकार है। इनमें से एनडीए दो राज्यों में मुख्य विपक्षी गठबंधन है। केरल में भी भाजपा एक बड़ी ताकत बन रही है। सो, इन तीनों राज्यों में भाजपा और उसका गठबंधन टकराव के लिए तैयार है।

बिहार में फर्क यह था कि वहां एनडीए की सरकार थी। इसलिए सरकार की ओर से कोई असहयोग नहीं हुआ। तभी चुनाव आयोग को सिर्फ विपक्षी गठबंधन का जवाब देना पड़ा। इन राज्यों में पहले दिन से विवाद शुरू हो गया है। बंगाल में तो बीएलओ प्रशिक्षण के लिए ही नहीं जा रहे थे।

अनुशासन की कार्रवाई की धमकी देने पर वे गए तो वहां भी प्रदर्शन किया और आरोप लगाया कि चुनाव आयोग उन्हें दस्तावेज नहीं दे रहे है ताकि वे इस ट्रेनिंग को कार्य दिवस के तौर पर साबित कर सकें। अगर ऐसा नहीं होगा तो राज्य सरकार इसको छुट्टी में गिनेगी। बूथ लेवल अधिकारी सुरक्षा व्यवस्था की भी मांग कर रहे थे। सो, एक तरफ राज्य सरकारों को अविश्वास है तो दूसरी ओर भाजपा की तैयारी है।

भाजपा ने इसकी शुरुआत पश्चिम बंगाल से की है। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह 24 जून के बाद जारी जन्म प्रमाणपत्र को नहीं स्वीकार करे। ध्यान रहे 24 जून को चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर की अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना में मतदाताओं के सत्यापन के लिए 11 दस्तावेजों की सूची जारी की थी। उसमें आधार को नहीं रखा गया था।

बिहार में इस वजह से बहुत से लोगों को मतगणना प्रपत्र जमा कराने में दिक्कत हुई। इसके बाद पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर जन्म प्रमाणपत्र बनाने का काम शुरू हुआ। राज्य की ममता बनर्जी सरकार ने अपने कार्यकर्ताओं को जमीन पर उतारा, जिन्होंने मतदाता सूची चेक की और यह सुनिश्चित किया कि उनके समर्थकों के जरूरी दस्तावेज हों। तभी राज्य सरकार के अलग अलग विभागों ने बड़ी संख्या में लोगों को ऐसे दस्तावेज उपलब्ध कराए, जिनसे उनकी नागरिकता प्रमाणित हो सके।

अब भाजपा कह रही है कि चुनाव आयोग बिहार में एसआईआर की अधिसूचना जारी होने के बाद तैयार किए गए प्रमाणपत्र को स्वीकार नहीं करे। इसके लिए भाजपा के नेता सड़क पर उतरने के लिए भी तैयार हैं। उधर तमिलनाडु और केरल में ज्यादातर लोगों के पास पहले से जन्म प्रमाणपत्र या 10वीं तक पढ़ाई का प्रमाणपत्र है। लेकिन वहां भी पिछले चार महीने में काफी लोगों ने प्रमाणपत्र बनवाएं हैं। वहां भी एनडीए की पार्टियां इसका विरोध करेंगी। विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि वे बूथ लेवल एजेंट्स तो दे रही हैं लेकिन बूथ लेवल अधिकारियों से उनको सहयोग नहीं मिल रहा है।

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