टुकड़े-टुकड़े गैंग फिर एक्टिव, जेएनयू बना सियासी अखाड़ा
एक बार फिर राजनीति का कुख्यात जेएनयू मॉडल सुर्खियों में है। वही टुकड़े-टुकड़े गैंग, वही राष्ट्रविरोधी नारे और वही संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल। देश की राजधानी दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में मंगलवार को एक बार फिर माहौल गरमा गया, जब 2020 दंगों के आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने के बाद वामपंथी छात्रों के एक छोटे समूह ने नारेबाजी शुरू कर दी।
ये वही राजनीति है जिस पर बार-बार देश विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। ऐसी राजनीति जिसमें भारत माता का अपमान, सुरक्षाबलों की शहादत पर जश्न और समाज को बांटने वाले आयोजनों की बात सामने आती रही है। संख्या में भले ही ये लोग कम हों, लेकिन इनके विचार आग की उस चिंगारी जैसे माने जाते हैं, जो बड़ा नुकसान कर सकती है।
राजनीतिक दलों में मतभेद हो सकते हैं, सत्ता पक्ष और विपक्ष अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों की आस्था देश की संवैधानिक व्यवस्था में होती है। सवाल उन चेहरों पर है, जो लोकतंत्र और संस्थाओं पर ही हमला करते नजर आते हैं। शरजील इमाम के पुराने बयानों को लेकर भी यही बहस उठती रही है, जिनमें देश की अखंडता पर सवाल खड़े किए गए थे।
नागरिकता कानून के विरोध के दौरान फैलाई गई कथित गलतफहमियों को भी इसी वैचारिक धारा से जोड़ा जाता है। सरकार का कहना रहा कि कानून का उद्देश्य पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को राहत देना था, लेकिन विरोध को इस तरह पेश किया गया जैसे देश के एक वर्ग को निशाना बनाया जा रहा हो।
अब सवाल यह है कि क्या इस जेएनयू मॉडल की राजनीति को रोका जा सकता है? जानकार मानते हैं कि विचारों को खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन समय रहते तथ्यों और सच्चाई के साथ उनका जवाब देना जरूरी है। शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि भ्रम फैलने से पहले ही स्थिति स्पष्ट की जाए।
देश की न्याय व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने वाली इस सोच की हकीकत समाज के सामने आना जरूरी है, ताकि राष्ट्रविरोधी नैरेटिव को समय रहते बेनकाब किया जा सके।
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