Hindi Patrakarita Diwas
Hindi Patrakarita Diwas: वह 30 मई का ही दिन था, जब भारत में एक क्रांतिकारी युग का उदय हुआ था। एक ऐसा क्रांतिकारी युग, जो खुद अपनी बेबाक दुनिया रचने जा रहा था। जिसकी चाह न सिर्फ स्वधीनता की प्राप्ति थी, बल्कि देश के क्रांतिकारियों, नौंजवानो, लेखकों और कलमकारों को अपनी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भी देना था। देश में कई अंग्रेजी अखबार अपनी पैठ बना चुके थे। उनमें भारतीयों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का कोई स्थान नहीं था।
उस समय हिंदी भाषी भारतीयों के पास ऐसा सशक्त माध्यम नहीं था, जिन्हे वह अपना कह सके, जिसके माध्यम से अपनी बात तानाशाही अंग्रेजी हुकुमत तक पहुंचा सके। 30 मई 1826 को पंडित जुगलकिशोर का पहला हिंदी अखबार उदन्त मार्तण्ड प्रकाशित हुआ और यहीं से शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता की क्रांति। इसी दिन को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। आज हिंदी पत्रकारिता के 195 साल हो गए हैं।
इस दरमियान कई समाचार पत्र शुरू हुए, उनमें से कई बंद भी हुए, लेकिन उस समय शुरू हुआ, हिंदी पत्रकारिता का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। हिंदी पत्रकारिता का 195 साल का क्रांतिकारी सफर बड़ा उठा पटक भरा रहा है। उदंत मार्तण्ड के बाद कई हिंदी अखबारों का प्रकाशन शुरू हुआ। सभी ने अंग्रेजी हुकुमतों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अंदर क्रांति की ऊर्जा भरने का काम किया।
स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों को सक्रियता मुख्य रूप से हिंदी पत्रकारिता ने ही दी थी। कई लेखकों, संपादकों, पत्रकारों ने हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से क्रांतिकारी आंदोलनकारियों को जोड़ने का काम किया, एवं उनके अंदर नई ऊर्जा का प्रवाह किया।
लेकिन हम हिंदी पत्रकारिता के 195 सालों का आंकलन करते हैं तो पाते हैं कि वर्तमान की पत्रकारिता ने वो तेवर खो दिए हैं जो आजादी के पहले की पत्रकारिता ने स्थापित किए थे। उदंत मार्तण्ड की कमी हमें खलने लगी है। क्योंकि आज की पत्रकारिता में न विचार बचे, न समाचार बचे, बचा है तो बस बाजारवाद।
मीडिया की अपनी कोई विचारधारा नहीं रह गई है। क्योंकि मीडिया में राजनीति और राजनीति में मीडिया ने ऐसी घुसपैठ की है, कि दोनों एस दूसरे से दूषित हो गए। न तो मीडिया की कोई स्वतंत्रता बची, और न राजनीतिक का स्वाभिमान बचा। वर्तमान की हिंदी पत्रकारिता ने अपनी दुनिया खुद बना ली है, जिसमें से जनता की आवाज और लोकतंत्र के मायने सब कुछ गायब है। मीडिया अपनी दुनिया का एक ऐसा सिपाही बन बैठा, जिसकी रपट लिखने वाला कोई नहीं है। मीडिया दोषियों की सिनाख्त करने वाला दरोगा, और सजा सुनाने वाली अदालत बन बैठी है।
यही वजह है कि आज मीडिया की साख लगातार गिरती जा रही है। लोगों में मीडिया के प्रति काफी हद तक विश्वास नहीं रह गया है। उदंत मार्तण्ड ने हिंदी पत्रकारिता की जिस इमारत को अपनी त्याग, तपस्या, निडरता और बेबाकपन से खड़ी की थी, आज वह वाणों की सैया पर पड़े भीष्मपितामह की तरह कराह रही है। आज की पत्रकारिता, डर का महल बन गई है। वह सत्ता से सवाल करने की जगह उसकी वाहवाही करने लगी हैं।
मीडिया ने सत्ता को डर की चादर बना लिया है, जिसे ओढ़कर वह थर-थर कांपती है। यही वजह है कि, प्रेस फ्रीडम इंडेक्स यानी कि प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारतीय मीडिया लगातार नीचे की ओर खिसकती जा रही है। रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स के वार्षिक विश्लेषण के अनुसार वैष्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में 142वे स्थान पर हैं। जबकि साल 2019 में भारत 140वे स्थान पर था।
आज हमें उदंत मार्तण्ड जैसे उन सभी बेबाक, अखबारों की कमी खलने लगी है, जिन्होंने तानाशाही हुकुमतों को सच्चाई का आईना दिखाया था, उनकी कड़ी आलोचना की थी।
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