
Samodhpur Village Ramlila का आयोजन इस वर्ष भी विजय दशमी के पावन अवसर पर क्षेत्र के अंतिम रामलीला और मेले के रूप में संपन्न हुआ, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। सुइथाकला/शाहगंज क्षेत्र के समोधपुर गांव में प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा न केवल धार्मिक उत्साह का प्रतीक है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और एकता का भी जीवंत उदाहरण पेश करती है।
जब पूरे क्षेत्र की रामलीलाएं समाप्त हो जाती हैं, तब Samodhpur Village Ramlila का आरंभ होता है, जो विजय दशमी के मेले के साथ समापन की ओर ले जाता है। इस बार भी राम-रावण युद्ध की भव्य प्रस्तुति और रावण दहन के साथ मेले में चाट, जलेबी, मिठाइयों का आनंद लेने के लिए आसपास के गांवों से लोग पहुंचे। यह आयोजन न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का माध्यम भी बनता है, जहां पुरानी यादें ताजा होती हैं और नई पीढ़ी परंपराओं से जुड़ती है।
Samodhpur Village Ramlila: प्राचीन परंपरा और वरिष्ठ कलाकारों की विरासत
Samodhpur Village Ramlila की जड़ें प्राचीन काल में हैं, जहां भगवान श्री राम की लीला को श्रद्धा पूर्वक मंचित किया जाता रहा है। गांव के वरिष्ठ वंश बहादुर सिंह नेपा बाबू रामलीला के व्यास हैं जिनकी निर्देशन शैली आज भी लोगों की जुबान पर है। राम के पात्र में शिक्षक अमर बहादुर सिंह बैंस, लक्ष्मण के रूप में शिक्षक बसंत लाल सोनी, और रावण के रोल में शिक्षक गंगा प्रसाद सिंह की अभिनय कला ने इस रामलीला को क्षेत्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई।
ये कलाकार न केवल अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते थे, बल्कि रामायण के संदेशों को जीवंत रूप देते थे। आज उन्हीं की विरासत को आगे बढ़ाते हुए उनके बड़े बेटे राजेश सिंह लंकेश रावण का रोल निभा रहे हैं, जिनकी दमदार आवाज और अभिनय रावण के क्रूर चरित्र को साकार करता है।
हनुमान के पात्र में एडवोकेट अमर बहादुर सिंह की भक्तिपूर्ण प्रस्तुति दर्शकों को भाव विभोर कर देती है, जबकि सीता का रोल मुन्नी लाल द्वारा निभाया जाता है, जो माता सीता की करुणा और धैर्य को खूबसूरती से उकेरते हैं। दशरथ महाराज के रोल में स्वर्गीय खरबोटी मास्टर की यादें आज भी जीवित हैं, जिनकी शानदार प्रस्तुति से रामलीला की गरिमा बढ़ती थी।

यह Samodhpur Village Ramlila न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि नैतिक शिक्षा का माध्यम भी। पुराने कलाकारों की कमी खलती है, लेकिन नई पीढ़ी जैसे राजेश सिंह और अमर बहादुर सिंह इसे जीवित रखे हुए हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि दशकों पहले जब बिजली की सुविधा नहीं थी, तब लालटेन और मशालों की रोशनी में रामलीला होती थी। आज मंच पर आधुनिक लाइटिंग और साउंड सिस्टम है, लेकिन श्रद्धा वही पुरानी है।
इस वर्ष रामलीला के दौरान राम-रावण संवादों ने दर्शकों को रामायण की गहराई में डुबो दिया। रावण का पात्र जब अपनी माया का प्रदर्शन करता है, तो बच्चे उत्साह से तालियां बजाते हैं। इसी तरह, हनुमान की लंका दहन की लीला में आग के गोले और धुएं का प्रभाव इतना जीवंत होता है कि दर्शक खुद को रामायण काल में महसूस करते हैं। Samodhpur Village Ramlila की यह विशेषता है कि यह व्यावसायिक नहीं, बल्कि पूर्णतः स्वैच्छिक और श्रद्धा आधारित है। गांव के युवा मंच सजाने, पात्रों के लिए वेशभूषा तैयार करने में रात-दिन मेहनत करते हैं। इस बार रामलीला 10 दिनों तक चली, जिसमें रोजाना सैकड़ों दर्शक पहुंचे।
Samodhpur Village Ramlila: राम-रावण युद्ध और रावण दहन की भव्यता
Samodhpur Village Ramlila का क्लाइमेक्स राम-रावण युद्ध और रावण दहन होता है, जो विजय दशमी पर संपन्न हुआ। इस बार युद्ध दृश्य में राम (पात्र) के बाणों से रावण का पतन इतना реалистиक था कि दर्शक चीत्कार कर उठे। रावण का विशाल पुतला, जो 50 फीट ऊंचा था, आग की लपटों में जलता देख पूरा मैदान जय श्री राम के नारों से गूंज उठा।
सीता मैया की अयोध्या वापसी की लीला ने महिलाओं और बच्चों को भावुक कर दिया। यह दृश्य रामायण के अंतिम भाग को जीवंत करता है, जहां अच्छाई की बुराई पर विजय होती है। रावण दहन के बाद आतिशबाजी ने आकाश को रंगीन बना दिया, और लोग विजय दशमी की बधाइयां देते हुए एक-दूसरे से गले मिले।
युद्ध दृश्य की तैयारी में गांव के कलाकारों ने अभ्यास किया। राजेश सिंह ने बताया कि रावण का रोल निभाते हुए उन्हें अपने पिता गंगा प्रसाद सिंह की याद आती है, जो कभी इसी मंच पर गरजते थे। हनुमान पात्र अमर बहादुर सिंह ने लंका दहन के दौरान इतनी ऊर्जा दिखाई कि दर्शक उनकी भक्ति में डूब गए। Samodhpur Village Ramlila में विशेष प्रभावों के लिए स्थानीय कारीगरों ने पुतले बनाए, जिनमें पर्यावरण अनुकूल सामग्री का उपयोग किया गया।
रावण दहन के समय पुलिस व्यवस्था भी थी, ताकि कोई दुर्घटना न हो। इस वर्ष भीड़ पिछले वर्ष से अधिक थी, क्योंकि आसपास के गांवों जैसे सुइथाकला, शाहगंज से बसें और वाहन भरकर लोग आए। रामलीला समिति के अध्यक्ष ने बताया कि यह आयोजन बिना किसी सरकारी सहायता के गांव वासियों के चंदे से होता है। रावण दहन के बाद मेले का उद्घाटन हुआ, जहां विजय दशमी का उत्साह चरम पर था।

Samodhpur Village Ramlila: मेले का आनंद और सामाजिक एकता
Samodhpur Village Ramlila के समापन के साथ लगा विजय दशमी का मेला क्षेत्र का अंतिम मेला है, जो रात भर चलता है। मेले में चाट की स्टॉलों पर तीखी चटनी वाली पापड़ी चाट, गरमागरम जलेबी, रसगुल्ले और अन्य मिठाइयों की खुशबू चारों ओर फैली। बच्चे झूलों पर झूलते, खिलौने खरीदते, जबकि बड़े चाट-पकौड़ी का लुत्फ उठाते। आसपास के गांवों से आए लोग मेले को देखने और खरीदारी करने पहुंचे। मेला न केवल व्यावसायिक है, बल्कि सामाजिक मेलजोल का अवसर भी, जहां पुराने मित्र मिलते हैं और नई दोस्तियां बनती हैं।
इस वर्ष मेले में 200 से अधिक स्टॉल लगे, जिनमें स्थानीय हस्तशिल्प, कपड़े, बर्तन आदि बिके। चाट विक्रेता रामू चाचा ने बताया कि Samodhpur Village Ramlila के मेले में उनकी चाट सबसे प्रसिद्ध है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। जलेबी बनाने वाले कारीगरों ने पारंपरिक तरीके से चाशनी में डुबोई जलेबियां परोसीं, जो मुंह में घुलते ही स्वाद का विस्फोट करती हैं।

मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए, जहां लोक गायक रामायण भजन गाते रहे। बच्चों के लिए magic show और puppet show का आयोजन किया गया।
Samodhpur Village Ramlila और मेला न केवल धार्मिक उत्सव है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है। किसान अपनी फसल बेचते हैं, दुकानदार मुनाफा कमाते हैं। इस बार मौसम अनुकूल रहा, कोई बारिश नहीं हुई, जिससे भीड़ और बढ़ गई।
गांव की प्रधान श्रीमती चंदा अमरनाथ ने कहा कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आने वाली पीढ़ियां इसे संजोकर रखेंगी। कुल मिलाकर, Samodhpur Village Ramlila ने एक बार फिर साबित किया कि रामायण की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं – सत्य की विजय, धर्म की स्थापना और परिवार की एकता।
