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    केरल विधानसभा चुनाव 2026: LDF vs UDF मुकाबला, जानिए पूरा चुनावी गणित

    केरल विधानसभा चुनाव 2026राज्य की चुनावी तस्वीर दो मोर्चों में सीधा मुकाबला

    केरल की 16वीं विधानसभा के लिए चुनाव 9 अप्रैल 2026 को एक चरण में कराए जाएंगे। चुनाव प्रक्रिया 16 मार्च से नामांकन अधिसूचना जारी होने के साथ शुरू हो चुकी है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 23 मार्च निर्धारित की गई है। नामांकनों की जांच 24 मार्च को होगी और 26 मार्च तक उम्मीदवार अपने नाम वापस ले सकेंगे। मतदान 9 अप्रैल को होगा और मतगणना 4 मई को की जाएगी। वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 23 मई 2026 को समाप्त हो रहा है।

    भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, केरल विधानसभा चुनाव 2026 में कुल 2,69,53,644 मतदाता मतदान के पात्र हैं। इनमें 1,31,26,048 पुरुष, 1,38,27,319 महिलाएं और 277 तृतीय लिंग के मतदाता शामिल हैं। राज्य में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक है, जो केरल की सामाजिक संरचना और मतदाता भागीदारी को दर्शाती है। राज्य में मतदान प्रतिशत परंपरागत रूप से उच्च रहा है।

    2011 की जनगणना के अनुसार, केरल की कुल जनसंख्या लगभग 3.34 करोड़ है, जिसमें 54.73 प्रतिशत हिंदू, 26.56 प्रतिशत मुस्लिम और 18.38 प्रतिशत ईसाई आबादी शामिल है। ये सामाजिक और धार्मिक समीकरण चुनावी परिदृश्य को प्रभावित करते हैं।
    केरल में 2016 से वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार है, जिसका नेतृत्व पिनाराई विजयन कर रहे हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा ने 140 में से 99 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। यह परिणाम राज्य की उस परंपरा से अलग था, जिसमें आमतौर पर हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता रहा है।

    वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ)के प्रमुख घटक दलों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, केरल कांग्रेस (एम), जनता दल (सेक्युलर) और अन्य वामपंथी दल शामिल हैं। यह गठबंधन राज्य में वामपंथी राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है। जबकि संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) राज्य का प्रमुख विपक्षी गठबंधन है, जिसका नेतृत्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस करती है। यूडीएफ में कांग्रेस के अलावा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस (जोसेफ), रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और अन्य सहयोगी दल शामिल हैं। 2021 के चुनाव में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी और वह विपक्ष में बना रहा।

    राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) भी राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है। इसका नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी कर रही है। इसके घटक दलों में भारत धर्म जन सेना, ट्वेंटी-ट्वेंटी पार्टी, केरल कामराज कांग्रेस, अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और जनता समाजवादी पार्टी शामिल हैं। वर्तमान विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी का कोई सदस्य नहीं है, जबकि 2016 के चुनाव में उसे एक सीट प्राप्त हुई थी।

    केरल विधानसभा में कुल 140 सीटें हैं। 2021 के चुनाव में 16 विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य और 6 निर्दलीय उम्मीदवार निर्वाचित हुए थे। 2016 में भी 13 राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और 6 निर्दलीय सदस्य विधानसभा में पहुंचे थे। यह राज्य में बहुदलीय उपस्थिति को दर्शाता है।

    तिरुवनंतपुरम से राजनीतिक विश्लेषक साजन गोपालन के अनुसार, छोटी-छोटी विधानसभा सीटों के कारण चुनावी रुझान का अनुमान लगाना कठिन है, लेकिन युवाओं का मुद्दा महत्वपूर्ण है और राजनीतिक दलों को सेकण्ड जनरेशन के विकास पर ध्यान देना होगा।केरल में करीब 2.69 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 20 प्रतिशत युवा हैं, जो बहुत ही निर्णायक हैं। कई सीटों पर युवा वोट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, खासकर शहरी और शिक्षित क्षेत्रों में। युवाओं में चुनाव में मतदान को लेकर राजनीतिक चेतना बढ़ी है और वे प्रगतिशील उम्मीदवार और पार्टी के एजेंडे को देखकर मतदान कर रहे हैं। कई राजनीतिक दलों ने पीढ़ीगत बदलाव करते हुए युवा नेताओं को आगे बढ़ाया है।

    वाम लोकतांत्रिक मोर्चा एक बार फिर पिनाराई विजयन के नेतृत्व में चुनाव मैदान में है। पिनाराई विजयन धर्मदम विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार हैं। यह उनका सातवां विधानसभा चुनाव है और उनका राजनीतिक जीवन पांच दशकों से अधिक का रहा है। राज्य में मुख्य मुकाबला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के बीच माना जा रहा है। यूडीएफ के लिए नेतृत्व की अधिकता एक चुनौती बन रही है, जबकि वाम लोकतांत्रिक मोर्चा में पिनाराई विजयन का मजबूत और स्थिर नेतृत्व उसकी प्रमुख ताकत है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन तीसरे विकल्प के रूप में चुनाव मैदान में है और वह अपने जनाधार का विस्तार करने का प्रयास कर रहा है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में केरल के ईसाई समुदाय से आने वाले वरिष्ठ नेता जॉर्ज कुरियन को केंद्रीय राज्य मंत्री बनाया गया है। वे भारतीय जनता पार्टी के केरल के महासचिव हैं और राज्य में पार्टी का प्रमुख ईसाई चेहरा माने जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी इसके माध्यम से ईसाई मतदाताओं को साधने का प्रयास कर रही है। भारतीय जनता पार्टी ‘केरलम’ नाम को मलयाली गौरव के रूप में प्रस्तुत कर रही है। राज्य भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने इसका समर्थन किया है। दक्षिण भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पार्टी इस चुनाव को महत्वपूर्ण मान रही है।

    उत्तर केरल के कसारगोड से पर्यावरण कार्यकर्ता शम्शुद्दीन ए.के. के अनुसार, इस बार मुकाबला दोनों मोर्चों के लिए तगड़ा है, लेकिन मतदाता बदलाव के मूड में दिखाई दे रहा है। उनका कहना है कि कोई भी पार्टी पर्यावरण को प्रमुख चुनावी मुद्दा नहीं बनाती, जबकि केरल जैव विविधता, समुद्र तटों और पश्चिमी घाट के कारण समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों वाला राज्य है। यह मालाबार तट पर स्थित है और आयुर्वेद जैसी प्राचीन चिकित्सा पद्धति का जन्मस्थान भी माना जाता है।

    चुनाव के प्रमुख मुद्दों में शबरिमला मंदिर से जुड़ा विषय शामिल है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद सभी आयु वर्ग की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश को लेकर पहले भी विवाद हुआ था और यह मुद्दा चुनाव प्रचार में फिर उभर सकता। मानव- वन्यजीव संघर्ष भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। वन क्षेत्रों से सटे इलाकों में जंगली हाथियों और अन्य वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे जनहानि और फसलों को नुकसान हुआ है। प्रभावित क्षेत्रों में मुआवजे और सुरक्षा उपायों की मांग उठती रही है।

    कानून-व्यवस्था का मुद्दा भी चुनाव में शामिल है। विपक्ष ने राज्य में हिंसा और पुलिस से जुड़े मामलों को उठाया है, जबकि सरकार इन आरोपों का खंडन करती रही है। विकास कार्य भी चुनाव का एक प्रमुख मुद्दा है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार अपने कार्यकाल के दौरान सड़क, सार्वजनिक परिवहन, बंदरगाह और तटीय परियोजनाओं से जुड़े विकास कार्यों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को दी जा रही पेंशन और अन्य सहायता को भी प्रमुखता दी जा रही है।राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर स्थिति के कारण मतदाताओं में जागरूकता का स्तर अधिक है। इसका प्रभाव चुनावी भागीदारी और मुद्दों के चयन पर भी देखा जाता है। केरल में मतदान प्रतिशत आमतौर पर राष्ट्रीय औसत से अधिक रहता है।

    चुनाव के दौरान सभी राजनीतिक दल रैलियों, जनसभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार कर रहे हैं। डिजिटल माध्यम चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। 4 मई 2026 को मतगणना के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा अपनी सत्ता बरकरार रखता है या संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा वापसी करता है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राज्य की राजनीति में अपनी स्थिति कितनी मजबूत कर पाता है।

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    प्रो. (डॉ.) सुभाष चंद्र थलेडी

    (लेखक मीडिया स्टडीज के प्रोफेसर और भारतीय प्रसारण सेवा (IBS) के पूर्व अधिकारी हैं।)

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    News Desk

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