बिहार में जाति की सियासत काम नहीं आयी

बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजे हैरान भले ही करें किन्तु वास्तविकता यह है कि जो हालात पैदा हो चुके थे, उससे यही परिणाम आना था।

कभी जाति की राजनीति के लिए विशेष पहचान रखने वाला बिहार अब बिलकुल बदल गया है। जिस बिहारी को बिजली के बदले लालटेन जलाने की सलाह मिलती थी, सड़क की मांग करने पर भैंस की पीठ पर बैठने की सलाह दी जाती थी, पढ़ लिखकर डाक्टर और इंजीनियर बनने की चाहत बताने पर चरवाहा बनने की नसीहत मिलती थी, अपहरण पीड़ित बिहारियों को अपराधियों से समझौते करने की सलाह दी जाती थी, उसी राज्य में अब युवा वोटर अपने भविष्य की चिन्ता करते हैं और चाहते हैं कि राज्य में सरकार कोई भी बने वह व्यक्तिगत नहीं बल्कि राज्य के नागरिकों की चिन्ता करे।

कुशासन के प्रतीक बन चुके लालू-राबड़ी आज भी बिहार में अपराध के अमिट हस्ताक्षर बन चुके हैं। वह चाहे जितनी कोशिश कर लें उनके माथे से जंगलराज का काला तिलक आज भी चमक रहा है। जबकि बिहार में लोगों को अब विकास का आनंद आना शुरू हो गया। बिहारी अब जाति की राजनीति की वास्तविकता समझ चुका, यही कारण है कि अब वह नेताओं के झांसे में नहीं आता। उसने देश के दूसरे राज्यों को देखा, उसने बिहार की बर्बादी को देखा और सुना था। बिहार के वोटरों को अब लफ्फाजी नहीं विकास चाहिए ठीक वैसे ही जैसे कि दूसरे राज्यों में हो रहा है। इसलिए तमाम कोशिशों के बावजूद बिहार के वोटर भ्रमित नहीं हुए।

ऐसा नहीं है कि बिहार में वे वोटर खत्म हो गए जो लालू चरित्र में पाए जाते हैं किन्तु बदकिस्मती से उन्हें आकर्षित करने वाला लालू के अलावा कोई और नहीं है। इसका परिणाम यह हुआ कि लालू के कोर वोटर इस चुनाव में उस तरह की मदद तेजस्वी की नहीं कर पाए जैसी कि वे पहले किया करते थे। यही नहीं लालू-राबड़ी परिवार में कलह के कारण भी आरजेडी पस्त हुई। लालू-राबड़ी प्रचार से दूर थे और बेटे अलग-अलग पार्टियों से लड़े तो बेटियां भी दोनों के अलग-अलग गुटों में शामिल हो गई।

सच तो यह है कि चुनाव के वक्त न सिर्फ लालू परिवार गुटबाजी का शिकार हो चुका था बल्कि इंडिया गठबंधन में भी एकजुटता का अभाव था। इंडिया गठबंधन के सभी घटक दल मिलकर आम सहमति से टिकट नहीं बांट सके, परिणामस्वरूप तमाम सीटों पर इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी आपस में ही लड़कर निपट गए।

यह हकीकत है कि महिलाओं ने एनडीए गठबंधन के प्रत्याशियों को जाति से हटकर वोट दिए लेकिन इसका भी एक ही कारण था कि उन्हें इंडिया गठबंधन के वादे पर भरोसा नहीं रहा क्योंकि वे 10 हजार पा चुकी थीं। उनको शुरू से ही नीतीश वुमार पर विश्वास रहा, इसलिए उन्होंने जमकर समर्थन किया।

सच तो यह है कि अब जबकि एनडीए को आशातीत सफलता मिली है तो इसका श्रेय लेने वाले कारकों का टोटा नहीं है किन्तु यह भी वास्तविकता है कि यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच समझ और सहयोग की भावना मजबूत न होती तो इस परिणाम की कल्पना नहीं की जा सकती थी। इसके अलावा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी भाजपा संगठन को जिस तरह सुगठित व सक्रिय किया वह पार्टी के लिए काफी हितकर साबित हुआ। कुल मिलाकर एनडीए गठबंधन के सभी घटक दल आपस में तालमेल से लड़े यह उनके लिए सफलता का मूल कारण साबित हुआ।

इंडिया गठबंधन की मुश्किल यह है कि वे अपने खिलाफ सुनामी से भी सबक लेने को तैयार नहीं हैं। उन्हें इस बात की समीक्षा भी नहीं करनी है कि उनकी इतनी बुरी पराजय और एनडीए की इतनी शानदार जीत क्यों हुईं!

‘वोट चोरी’ का गीत फटे बांस की बांसुरी से निकली बेसुरी तान भी उनके काम तो नहीं आया किन्तु एसआईंआर के कारण तमाम फर्जी वोटर जरूर मतदान से अलग हो गए। कहने का तात्पर्य यह है कि बिहार के चुनाव से अब यह साबित हो गया है कि वहां के वोटरों की जरूरतें और उम्मीदें दोनों बदल चुकी हैं इसलिए मोदी-नीतीश दोनों को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति गंभीर होना होगा अन्यथा ये ही वोटर 2030 में हर-हर गंगे करने में संकोच नहीं करेंगे। यदि यह मान लें कि बिहार में वोटरों की चाहत में बदलाव की आंधी ने विपक्ष को जड़ से ही उखाड़ दिया तो सरकार यदि उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी तो फिर यही आंधी विपरीत दिशा में भी बह सकती है।