- डॉ किशोर कुमार पंत, उत्तराखंड
अंतराष्ट्रीय स्तर पर मानव सभ्यता ने तकनीकी प्रगति की ऐसी रफ्तार पकड़ी है कि हर दिन कोई नया उपकरण, कोई नया मॉडल और कोई नई स्क्रीन हमारे सामने आ खड़ी होती है। मोबाइल फोन, टैबलेट, कंप्यूटर और न जाने कितने गैजेट हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन चुके हैं। परंतु इस चमकदार प्रगति के पीछे एक अदृश्य अंधकार भी पल रहा है, जिसे हम अनदेखा कर रहे हैं। वह अंधकार है—ई-वेस्ट। हम सबने जीवन में न जाने कितने मोबाइल, टैबलेट और कंप्यूटर बदले हैं, लेकिन क्या कभी सोचा कि वे गए कहाँ? क्या सचमुच उन्हें किसी ने रिसाइकिल किया या वे कबाड़ के रूप में ज़मीन और पानी को जहरीला बनाते हुए हमारी धरती का हिस्सा बन गए?
संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर रिपोर्ट बताती है कि दुनिया हर साल लगभग बासठ मिलियन टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करती है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि एक ऐसी भयावह सच्चाई है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जहरीली विरासत बनकर छोड़ी जा रही है। यह विडंबना है कि इस ई-वेस्ट का केवल बीस प्रतिशत हिस्सा ही औपचारिक रूप से रिसाइकिल होता है। शेष या तो खुले में जला दिया जाता है, या ज़मीन में गाड़ दिया जाता है, या फिर गरीब देशों की झुग्गियों और कबाड़ी बाजारों में बेहद असुरक्षित ढंग से तोड़ा-फोड़ा जाता है।
हम समझते हैं कि परमाणु हथियार मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।
लेकिन गहराई से सोचें तो ई-वेस्ट उससे भी ज्यादा भयावह है। परमाणु विस्फोट शहरों को पल भर में राख कर देता है, पर ई-वेस्ट पीढ़ी दर पीढ़ी, धीमे जहर की तरह, सभ्यता को अंदर से खत्म करता है। पारा और सीसा बच्चों के दिमाग को नुकसान पहुंचाते हैं, कैडमियम किडनी और हड्डियों को बर्बाद कर देता है, लिथियम और कोबाल्ट पानी और मिट्टी को लंबे समय तक जहरीला बनाए रखते हैं। खुले में जलाए गए पुराने मोबाइल और बैटरियां कैंसरकारी धुएं छोड़ती हैं। यह सब मिलकर उस वातावरण को विषाक्त कर देता है जिसमें हम सांस लेते हैं, पानी पीते हैं और भोजन उगाते हैं।
तकनीकी कंपनियों का लालच भी इस त्रासदी के पीछे है। वे अपने उत्पादों को इस तरह डिजाइन करती हैं कि कुछ ही वर्षों में वे बेकार हो जाएं। मोबाइल की बैटरियां अब रिपेयर योग्य नहीं रहीं, लैपटॉप जल्द ही धीमे पड़ जाते हैं और टैबलेट में स्टोरेज की सीमा जानबूझकर रखी जाती है। इसके साथ ही विज्ञापनों का मायाजाल हमें हर साल नया मॉडल खरीदने पर मजबूर करता है। यह ‘अपग्रेड कल्चर’ हमारी मानसिकता में गहराई से बैठ चुका है। परिणामस्वरूप उपभोक्तावाद और कॉर्पोरेट लालच मिलकर पृथ्वी पर जहरीले कचरे का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं।
आज स्थिति यह है कि दुनिया के लगभग हर राष्ट्र ने ई-वेस्ट प्रबंधन के लिए कानून तो बना दिए हैं, लेकिन उनका पालन बहुत ढीले-ढाले ढंग से हो रहा है। यूरोप ने उत्पादक कंपनियों पर यह जिम्मेदारी डाली है कि वे अपने बेचे गए उत्पाद वापस लें और रिसाइकिल करें। जापान ने घरेलू उपकरणों की रिसाइक्लिंग को कानूनी दायरे में लाया है। भारत ने भी ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स बनाए हैं और लाखों टन ई-वेस्ट आधिकारिक तौर पर इकट्ठा किया जाता है, लेकिन असलियत यह है कि आधे से अधिक ई-वेस्ट अनौपचारिक क्षेत्र में चला जाता है, जहाँ गरीब मजदूर जान जोखिम में डालकर धुएं और जहरीली गैसों के बीच इन्हें तोड़ते-जलाते हैं।
हमारी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि न तो सरकारें पूरी तरह गंभीर हैं, न ही आम जनता। मोबाइल बदलना अब एक आदत बन गई है। एक नया मॉडल आते ही पुराना फोन हमें ‘आउटडेटेड’ लगने लगता है। हम यह सोचे बिना नया खरीद लेते हैं कि पुराना कहाँ जाएगा। कंपनियां इस मानसिकता का फायदा उठाती हैं और हर साल नया मॉडल लॉन्च करती हैं।
राष्ट्र अपने कचरे को गरीब देशों में भेजकर जिम्मेदारी से बच जाते हैं। यह सामूहिक लापरवाही किसी अपराध से कम नहीं, जिसमें हम अपनी आने वाली पीढ़ियों की कब्र खुद अपने ही हाथों से खोद रहे हैं।
अगर यही चलता रहा तो अगले बीस वर्षों में ई-वेस्ट सौ मिलियन टन से भी अधिक हो जाएगा। ऐसी स्थिति में हमारी मिट्टी इतनी जहरीली हो जाएगी कि खेती करना असंभव हो जाएगा। पानी में धातुएं घुलकर पीने योग्य जल समाप्त कर देंगी। हवा में जहरीली गैसें सांस लेना कठिन बना देंगी। यह भविष्य किसी विज्ञान-कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारी ही बनाई हुई सच्चाई है।
इस संकट से निकलने का रास्ता भी हमारे ही पास है। विश्व समुदाय को चाहिए कि जलवायु परिवर्तन की तरह ई-वेस्ट पर भी एक वैश्विक संधि बनाई जाए। हर राष्ट्र को उत्पादक कंपनियों पर सख्त जिम्मेदारी डालनी चाहिए कि वे अपने उत्पादों का रिसाइक्लिंग सुनिश्चित करें। सर्कुलर इकोनॉमी की ओर बढ़ना होगा, जहाँ हर उत्पाद को इस तरह बनाया जाए कि उसका हर हिस्सा रिसाइकिल हो सके। उपभोक्ताओं को भी समझना होगा कि नया मोबाइल खरीदना केवल व्यक्तिगत फैशन नहीं, बल्कि वैश्विक बोझ है। हमें रिपेयर, री-यूज़ और शेयरिंग की संस्कृति को अपनाना होगा।
ई-वेस्ट केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, यह सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न है। आज अगर हमने अपनी आदतें नहीं बदलीं, तो कल हमारी संताने एक ऐसी धरती पर जन्म लेंगी जहाँ भोजन जहरीला होगा, जल विषाक्त होगा और हवा मौत का पैगाम होगी। तकनीक का असली उद्देश्य मानवता को जीवन देना है, जीवन छीनना नहीं। इसलिए अब समय आ गया है कि हम तकनीक को मानवता का वरदान बनाएं, न कि अभिशाप। यही हमारी जिम्मेदारी है और यही हमारे अस्तित्व की अंतिम शर्त भी।