Report by : News Desk
Published at :
विकास के आंकड़ों से आगे आदिवासी बच्चों की भूख
विज्ञापन
विज्ञापन
विकास के आंकड़ों से आगे आदिवासी बच्चों की भूख

देश की अर्थव्यवस्था के आकार और विकास दर से जुड़े आंकड़े निश्चित रूप से उपलब्धियों का संकेत देते हैं, लेकिन विकास की सार्थकता तब सामने आती है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। मध्य प्रदेश के बालाघाट से आदिवासी बच्चों की मौत की खबरें इसी बुनियादी सवाल को सामने रखती हैं। जब एक ओर देश की आर्थिक प्रगति के बड़े दावे किए जा रहे हों और दूसरी ओर गरीब परिवारों के बच्चे कुपोषण, दूषित पानी और इलाज के अभाव से जूझ रहे हों, तो विकास के मॉडल की प्राथमिकताओं पर विचार जरूरी हो जाता है।

बालाघाट में मई से बच्चों की मौत की खबरें सामने आने के बावजूद समस्या पर पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई देने का आरोप इस मामले को और चिंताजनक बनाता है। स्रोत के अनुसार सरकारी आंकड़ों में मृत बच्चों की संख्या 32 तक पहुंचने की बात सामने आई है। यदि किसी क्षेत्र में लगातार बच्चों की मौत हो रही हो, तो केवल तत्काल चिकित्सा सहायता ही नहीं, बल्कि उसके मूल कारणों की पहचान और स्थायी समाधान भी जरूरी है।

कुपोषण केवल भोजन की कमी का प्रश्न नहीं है। दूषित पानी, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच, गरीबी और जागरूकता का अभाव मिलकर इसे गंभीर संकट में बदल सकते हैं। खासकर दूरदराज के आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों की उपलब्धता, चिकित्सकीय कर्मचारियों की मौजूदगी और समय पर उपचार की व्यवस्था की नियमित निगरानी आवश्यक है। मुफ्त इलाज और खाद्यान्न जैसी योजनाओं की घोषणा तभी सार्थक मानी जाएगी, जब जरूरतमंद परिवार वास्तव में उनका लाभ उठा सकें।

बालाघाट की घटनाएं यह भी बताती हैं कि सरकारी योजनाओं और जमीनी क्रियान्वयन के बीच की दूरी को लगातार मापना होगा। कागज पर उपलब्ध सुविधा और किसी गांव के परिवार तक पहुंची सुविधा एक ही बात नहीं है। यदि किसी बच्चे को अस्पताल तक पहुंचने में कठिनाई होती है, पोषण उपलब्ध नहीं होता या पीने का पानी ही सुरक्षित नहीं है, तो केवल योजना का अस्तित्व उस बच्चे की समस्या का समाधान नहीं कर सकता।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जवाबदेही का है। बच्चों की मौत जैसी घटनाओं को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनाकर छोड़ देना समस्या को और लंबा करेगा। प्रशासन को यह पता लगाना होगा कि मौतों के वास्तविक कारण क्या हैं, किन स्तरों पर व्यवस्था विफल हुई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए। साथ ही प्रभावित परिवारों को तत्काल चिकित्सा, पोषण और अन्य जरूरी सहायता मिलनी चाहिए।

विकास का अर्थ केवल बड़ी अर्थव्यवस्था, ऊंची विकास दर या नई परियोजनाएं नहीं है। उसका अर्थ यह भी है कि किसी गरीब आदिवासी परिवार का बच्चा भूख और बीमारी के कारण असमय मृत्यु का शिकार न हो। देश की प्रगति की सबसे कठिन परीक्षा वहीं होती है, जहां सरकारी आंकड़ों की चमक सबसे कम और जरूरत सबसे ज्यादा होती है। बालाघाट की खबरें इसी कसौटी पर व्यवस्था को परखने का अवसर देती हैं।

Follow E RADIO INDIA on WhatsAppJoin ›