भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में वैचारिक निष्ठा और व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा के बीच का द्वंद्व अक्सर सार्वजनिक चर्चा का विषय बनता है। हाल के दिनों में मधु पूर्णिमा किश्वर के दृष्टिकोण में आया बदलाव इसी कड़वे सच को उजागर करता है। जो लेखिका कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और विजन के कसीदे पढ़ा करती थीं, आज वही उनके धुर विरोधियों की पंक्ति में खड़ी नजर आती हैं। तथ्यों और परिस्थितियों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि इस विरोध की जड़ें वैचारिक न होकर व्यक्तिगत हितों और अधूरी इच्छाओं में दबी हुई हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि मधु किश्वर की सक्रियता के पीछे राज्यसभा की सीट या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के कुलपति (VC) जैसे प्रतिष्ठित पद को पाने की गहरी लालसा थी। वर्ष 2013-14 के दौरान, जब वे मोदी जी पर अपनी पुस्तक लिख रही थीं, तब उनकी निष्ठा अपने चरम पर थी। संभवतः उन्हें लगा था कि प्रधानमंत्री के पक्ष में विमर्श खड़ा करने के पुरस्कार स्वरूप उन्हें कोई बड़ा संवैधानिक पद प्राप्त होगा। किंतु नरेंद्र मोदी की राजनीति चापलूसी और व्यक्तिगत लाभ के बजाय योग्यता और संगठनात्मक अनुशासन पर टिकी है। जब मोदी जी ने उनके ‘चापलूसी भरे व्यवहार’ को तवज्जो नहीं दी और उन्हें कोई राजनीतिक लाभ नहीं पहुँचाया, तो प्रशंसा का वह स्वर अचानक कटु आलोचना में बदल गया।
आज 75 वर्ष की आयु में मधु किश्वर जिस प्रकार की बयानबाजी कर रही हैं, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। उनके हालिया आचरण से ऐसा प्रतीत होता है कि वे अनजाने में या जानबूझकर उन शक्तियों (डीप स्टेट) के हाथों का मोहरा बन रही हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य भारत की छवि धूमिल करना है। राहुल गांधी का वह पुराना संकल्प, जिसमें उन्होंने मोदी की ‘मजबूत छवि’ को तोड़ने की बात कही थी, अब इन किरदारों के माध्यम से धरातल पर उतरता दिख रहा है। एप्स्टीन फाइल जैसे वैश्विक विवादों में भाजपा नेताओं का नाम उछालना इसी बड़ी साजिश का हिस्सा है ताकि प्रधानमंत्री को चरित्रहीन सिद्ध किया जा सके।
यह विडंबना ही है कि जो महिला 14 वर्षों तक मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री रहे नरेंद्र मोदी से ‘सुरक्षित दूरी’ बनाने का दावा करती है, वह तब कहाँ थी जब वह गुजरात में उनकी चमचागिरी में व्यस्त थी? एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की सुरक्षा और निगरानी इतनी कड़ी होती है कि वहां किसी भी प्रकार की अनैतिकता की गुंजाइश नहीं होती। मधु किश्वर द्वारा लगाए जा रहे आरोप उनकी विक्षिप्त मानसिकता और ‘पद न मिलने’ की कुंठा को दर्शाते हैं।
सत्ता के लाभ के लिए पलटी मारने वाली इस सूची में केवल किश्वर ही नहीं, बल्कि सुब्रमण्यम स्वामी और सत्यपाल मलिक जैसे कई नाम शामिल हैं। एआई (AI) और डीपफेक के इस युग में विरोधियों का यह गिरोह फर्जी वीडियो और मनगढ़ंत कहानियों के जरिए देश को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है। राहुल गांधी और उनके समर्थकों का यह एजेंडा देश की स्थिरता के लिए घातक है। राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने वाले नागरिकों को इन ‘ज्ञान की दुकानों’ के पीछे छिपे असली चेहरों को पहचानना होगा।
सुशील कुमार बतरा







