साहिल की मौत से उठे संस्थागत सवाल

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निष्पक्ष जांच, संवेदना और समान नियमों के भरोसे की जरूरत

आईआईटी बांबे के छात्र साहिल वाकोडे की आत्महत्या एक गहरी मानवीय त्रासदी है। एक परिवार ने अपना बेटा खोया, सहपाठी सदमे में हैं, परिसर के भीतर भरोसे को चोट पहुंची है और एक शिक्षक आरोपों के घेरे में हैं। ऐसे समय में संवेदना, संयम और निष्पक्षता तीनों जरूरी हैं। किसी की पीड़ा को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन पीड़ा को अपने आप में प्रमाण भी नहीं माना जा सकता। इसी तरह संस्थान की प्रतिष्ठा आरोपों को दबाने का आधार नहीं बन सकती और केवल आरोप लग जाने से किसी को दोषी ठहराना भी उचित नहीं है।

सत्य तक पहुंचने का रास्ता निष्पक्ष जांच से ही होकर गुजरता है। आत्महत्या जैसी त्रासदी को राजनीतिक या मीडिया के तत्काल निष्कर्षों का विषय बनाने के बजाय उसके पीछे मौजूद सभी संभावित परिस्थितियों की पड़ताल जरूरी है। टीवी बहसों की उत्तेजना, सोशल मीडिया पर तत्काल फैसले और जांच पूरी होने से पहले गिरफ्तारी या दोषमुक्ति की मांग सत्य की खोज को और कठिन बना सकती है।

आईआईटी केवल शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की प्रमुख वैश्विक पहचान में शामिल संस्थान हैं। क्यूएस विश्व विश्वविद्यालय रैंकिंग 2026 में आईआईटी बांबे दुनिया में 129वें और भारत में दूसरे स्थान पर रहा। दशकों में अर्जित ऐसी प्रतिष्ठा की रक्षा आवश्यक है, लेकिन प्रतिष्ठा सवालों को दबाने से नहीं, बल्कि कठिन सवालों का ईमानदारी से सामना करने से मजबूत होती है।

साहिल की मृत्यु से पहले की घटनाओं को लेकर अलग-अलग पक्ष सामने आए हैं। एक ओर परीक्षा के दौरान फोन के इस्तेमाल और परिवार की ओर से जातिगत भेदभाव के आरोप हैं। दूसरी ओर आईआईटी बांबे का कहना है कि छात्र ने प्रशासन के समक्ष ऐसी कोई शिकायत नहीं की थी। शिक्षक समुदाय की ओर से यह तर्क दिया गया कि परीक्षा निरीक्षक ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की।

पुलिस ने आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के तहत मामला दर्ज किया है, लेकिन अभी किसी आरोप का अंतिम रूप से सिद्ध होना बाकी है। इसलिए किसी एक पक्ष की कहानी को जांच पूरी होने से पहले अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।

जातिगत भेदभाव भारत की सामाजिक वास्तविकता है और प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के साथ उसका प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाता है, ऐसा मानना भी सही नहीं होगा। भेदभाव हमेशा स्पष्ट या लिखित आदेश के रूप में सामने नहीं आता। उपहास, कमतर समझे जाने या सूक्ष्म आक्रामक व्यवहार के रूप में भी इसकी अभिव्यक्ति हो सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित राष्ट्रीय कार्यबल ने उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण विरोधी सोच, जातिगत मजाक, सूक्ष्म आक्रामक व्यवहार और असमान शैक्षणिक सहयोग जैसी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया है। वास्तविक शिकायतों को केवल राजनीतिक मुद्दा बताकर खारिज करना छात्रों का भरोसा कमजोर कर सकता है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सामाजिक रूप से वंचित वर्ग से आने वाला छात्र भी परीक्षा अनुशासन से मुक्त नहीं हो सकता। नकल के आरोप की जांच करना शिक्षक का दायित्व है। यदि जांच में यह सामने आता है कि संबंधित शिक्षक ने नियमों के अनुसार काम किया और जातिगत अपमान नहीं किया, तो उनकी प्रतिष्ठा बहाल होनी चाहिए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में छात्रों को संभलने और दोबारा खड़े होने का अवसर देना भी है। नियम कठोर हो सकते हैं, लेकिन व्यवहार अपमानजनक नहीं होना चाहिए। अनुशासन के साथ सुनवाई, स्पष्ट प्रक्रिया, परामर्श और भावनात्मक सहयोग भी संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2020-21 से 2024-25 के बीच आईआईटी में 53 छात्रों की मौत हुई, जिनमें 45 आत्महत्याएं थीं। मृतकों में 29 छात्र एससी-एसटी अथवा ओबीसी समुदायों से थे। ये आंकड़े अपने आप में आत्महत्याओं का कारण जातिगत भेदभाव सिद्ध नहीं करते, लेकिन इस संभावना को भी स्वतः खारिज नहीं करते। छात्र आत्महत्या अक्सर किसी एक घटना का परिणाम नहीं होती। शैक्षणिक दबाव, अकेलापन, मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक चिंता, पारिवारिक अपेक्षाएं और सामाजिक भेदभाव जैसे कई कारक एक साथ भूमिका निभा सकते हैं।