Kunda Vidhan Sabha Election 2022: राजा भैया अपनी पार्टी से ही भरेंगे हुंकार

Kunda Vidhan Sabha Election 2022: राजा भैया अपनी पार्टी से ही भरेंगे हुंकार
Kunda Vidhan Sabha Election 2022: राजा भैया अपनी पार्टी से ही भरेंगे हुंकार

Kunda Vidhan Sabha Election 2022: विधानसभा चुनाव को लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में कड़ाके की ठंड के बावजूद माहौल गर्म है। यहां के बाहुबलियों पर नजर डालें तो पता चलता है कि उनके विधानसभा में पिछले 5 या 10 वर्षों से एक ही प्रत्याशी का अच्छा खासा दबदबा देखने को मिलता है।

प्रतापगढ़ के कुंडा में बाहुबली विधायक राजा भैया का नाम तो आपने सुना होगा। वही राजा भैया जिनके बारे में तमाम अफवाहें उड़ाई जाती हैं। चुनाव के नजदीक आते ही सियासी पंडितों की निगाह भला कुंडा विधानसभा सीट पर ना जाए ऐसा हो ही नहीं सकता।

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रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया यहां पर पिछले तीन दशक से काबिज है और उनके वर्चस्व के आगे किसी भी पार्टी की सियासी चाल कामयाब नहीं हो पाती। उनका रसूख, उनका रुतबा और उनकी सियासी पकड़ आज तक किसी पार्टी के समझ से बाहर की बात रही है।

राजा भैया की अपनी पार्टी है नाम है जनसत्ता दल लोकतांत्रिक। माना जा रहा है कि राजा भैया इस बार अपनी ही पार्टी के जरिए जनता के बीच वोट मांगने जाएंगे। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजा भैया इस बार 3 दशकों का रिकॉर्ड दोहरा पाएंगे या फिर उनका यह रिकॉर्ड टूट जाएगा? 

कुंवर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया अखिलेश यादव की सपा सरकार में मंत्री भी रहे हैं( प्रतापगढ़ के कुंडा में डिप्टी एसपी जिया उल-हक की हत्या के सिलसिले में नाम आने के बाद रघुराज प्रताप सिंह को अखिलेश मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था। हालांकि, क्लीनचिट मिलने के बाद उन्हें दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया था। 

राजा भैया साल 1993 से अब तक लगातार 6 बार से चुनाव जीतते आ रहे हैं. 1993 और 1996 में बीजेपी ने उन्हें परोक्ष रूप से सपोर्ट किया जबकि 2002, 2007 और 2012 में सपा ने समर्थन किया।

वह कल्याण सिंह, दिवंगत राम प्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह व मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में मंत्री भी रहे हैं. इससे पहले, कुंडा सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे नियाज हसन का कब्जा रहा. वह वर्ष 1962 से 1989 तक यहां से पांच बार विधायक रहे। 

देखना यह है कि राजा भैया अपनी पार्टी से चुनाव मैदान में उतरने के पश्चात कैसा प्रदर्शन कर पाते हैं, हालांकि तीन दशकों का रिकॉर्ड देखते हुए यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि राजा भैया का रसूख, और उनके सियासी तिलिस्म को तोड़ने का माद्दा अभी तक किसी पार्टी के पास है ही नहीं।