नई दिल्ली। मोबाइल गेम अब बच्चों के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि मस्तिष्क विज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार ये बच्चों के दिमाग को प्रभावित कर उसे धीरे-धीरे अपने नियंत्रण में ले रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गेम खेलने से मिलने वाली त्वरित खुशी मस्तिष्क में डोपामाइन का अत्यधिक स्राव करती है, जिससे मेहनत, धैर्य और समय के बाद मिलने वाली वास्तविक उपलब्धियां बच्चों को नीरस लगने लगती हैं।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली के बिहेवियरल एडिक्शन क्लिनिक से जुड़े वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. यतन पाल सिंह बल्हारा के अनुसार मोबाइल गेम बच्चों के मस्तिष्क के रिवार्ड सिस्टम को प्रभावित करते हैं। हर लेवल पूरा होने, अंक मिलने या वर्चुअल इनाम पर डोपामाइन का स्राव होता है, जिससे मस्तिष्क बार-बार उसी तरह की उत्तेजना की मांग करने लगता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि वास्तविक जीवन में खुशी की प्रक्रिया धीमी लेकिन टिकाऊ होती है, जैसे लंबे समय की पढ़ाई के बाद सफलता या अभ्यास से खेल में जीत। इसके विपरीत मोबाइल गेम बिना किसी विशेष मेहनत के कुछ ही मिनटों में वही ‘पुरस्कार’ दे देते हैं, जो अस्थायी होते हैं। इसी कारण बच्चों में गेम खेलने की इच्छा बार-बार पैदा होती है।
मस्तिष्क विज्ञान विशेषज्ञों का मानना है कि जिन बच्चों के जीवन में अकेलापन, भावनात्मक संवाद की कमी या पारिवारिक तनाव होता है, वे इस त्वरित राहत की ओर अधिक तेजी से आकर्षित होते हैं। धीरे-धीरे गेमिंग का समय बढ़ता जाता है और पढ़ाई, खेलकूद तथा परिवार के साथ समय बिताना उबाऊ लगने लगता है।
Stanford University की प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. अन्ना लेम्बके ने अपनी पुस्तक डोपामाइन नेशन में चेतावनी दी है कि स्क्रीन और गेम से अचानक दूरी बनाने पर बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, उदासी और विदड्रॉअल जैसे लक्षण उभर सकते हैं, जो गंभीर मानसिक जोखिम का संकेत हैं।
कोविड के बाद बच्चों में बढ़ते सामाजिक अलगाव पर हुए अध्ययनों और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल लत, ऑनलाइन गेमिंग और पारिवारिक संवाद की कमी बच्चों को मानसिक रूप से असुरक्षित बना रही है। विशेषज्ञों के अनुसार जब अकेलापन और गेमिंग लत एक साथ बढ़ती हैं, तो मानसिक प्रतिक्रियाएं और अधिक गंभीर हो जाती हैं।
विशेषज्ञों की सलाह है कि बच्चों पर अचानक प्रतिबंध न लगाया जाए, बल्कि स्क्रीन टाइम धीरे-धीरे कम किया जाए। बच्चों से संवाद कर यह समझने की कोशिश की जाए कि उन्हें गेम में क्या आकर्षित करता है। वास्तविक जीवन में प्रशंसा, खेल, रुचियों और परिवार के साथ समय बिताने जैसे सकारात्मक इनाम दिए जाएं। यदि चिड़चिड़ापन, नींद में कमी या पढ़ाई में गिरावट दिखाई दे, तो तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।
यह केवल मोबाइल गेम का नहीं, बल्कि बच्चों के मस्तिष्क पर डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव का गंभीर संकेत है। समय रहते इस डोपामाइन के जाल को नहीं समझा गया, तो बच्चों के सपने वर्चुअल दुनिया में ही उलझते चले जाएंगे।
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