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कोलकाता में चिकित्सक के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या को लेकर पूरे देश में आक्रोश

कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में प्रशिक्षु चिकित्सक के साथ दुष्कर्म एवं उसकी हत्या से न सिर्फ कोलकाता में बल्कि पूरे देश में आक्रोश व्याप्त है।

मंगलवार को कोलकाता और इससे लगे हावड़ा के विभिन्न हिस्सों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच उस वक्त झड़पें हुईं जब आंदोलनकारियों ने राज्य सचिवालय की ओर मार्च करने के लिए अवरोधकों को गिराने का प्रयास किया।

दरअसल प्रदर्शनकारी राज्य सचिवालय को घेरने के साथ-साथ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस्तीफे की मांग भी कर रहे थे। राज्य सचिवालय के घेराव को ही नबन्ना प्रोटेस्ट का नाम दिया गया था।

यह सच है कि जब कोई भी आंदोलन चलाने की जिम्मेदारी भीड़ पर छोड़ दी जाती है तो उसका यही परिणाम होता है। लोकतंत्र में आंदोलन चलाते वक्त प्रदर्शन, त्याग पत्र की मांग, रास्ता बंद इत्यादि सामान्य बात है किन्तु आंदोलन के लिए भी कुछ नियम निर्धारित होते हैं। जो भी लक्ष्मण रेखा लांघने की कोशिश करेगा, तो अनर्थ तो होना ही है। कोलकाता में जो भी हिंसक घटना घटी है उसके लिए आंदोलनकारी नेताओं की भी उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी कि राज्य सरकार और पुलिस की है।

यदि आंदोलनकारी पुलिस के प्रतिबंधों की परवाह करते तो शायद यह घटना नहीं घटती। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का त्याग पत्र मांगने वाली भीड़ को बिना पिटे वह जाने देती, यह संभव है ही नहीं। ममता एक बड़े राज्य की मजबूत जनाधार वाली नेत्री हैं, किन्तु उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह कभी भी किसी को अपनी तरफ हाथ और आंख उठाने पर बर्दाश्त नहीं कर पातीं। यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। रही बात पुलिस की तो पुलिस को धैर्यं से काम लेना नहीं आया। यदि वह चाहती तो सचिवालय पर एकत्र प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करके कहीं और छोड़ देती तो यह नौबत ही नहीं आती। लेकिन जब इशारा मुख्यमंत्री कार्यांलय और शीर्ष नेताओं से मिलता है तो पुलिस भी जनता की पिटाईं बड़े पैशाचिक तरीके से करती है।

बहरहाल यह आंदोलन के नेता यदि समझ से काम करते तो यह टकराव न होता और यदि पुलिस प्रशासन सतर्क और सक्रिय रहता तो यह नौबत आती ही नहीं। आंदोलनकारियों को अब यह हकीकत स्वीकार करनी होगी कि जब मामला सीबीआई के हाथ में है तो वह सचिवालय घेरने के लिए जा ही क्यों रहे हैं। साथ ही ममता बनर्जी को भी सोचना चाहिए कि सत्ता में होने पर उसे सभी वर्गो की चिन्ताओं पर ध्यान देना होता है। यदि प्रदर्शनकारी कुछ देर प्रदर्शन कर ही लेते तो कौन सा पहाड़ गिर जाता।

बहरहाल आन्दोलनकारियों को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ममता के खिलाफ कोलकाता में प्रदर्शन करने से कुछ हासिल नहीं होगा। जब तक ममता का बस चलेगा, वे मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ने वाली हैं, चाहे इसके लिए उन्हे कोई भी कीमत क्यों न देनी पडे। इसलिए आन्दोलनकारियों को चाहिए कि कोलकाता में प्रदर्शन के बजाय दिल्ली में केन्द्र सरकार पर दबाव बनाए कि वह ममता सरकार को बर्खास्त करे।

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