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कहीं जोगेंद्र नाथ मंडल तो नहीं बनने जा रही हैं मायावती?

March 10, 2025 | by editor

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March 10, 2025 | by editor

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March 9, 2025 | by editor

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March 9, 2025 | by editor

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March 9, 2025 | by editor

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March 6, 2025 | by editor

साथियों नमस्कार, अगर इस वीडियो को आप देखना शुरू कर चुके हैं तो एक बात तय है कि आप राजनीतिक समाचारों को निश्चित तौर पर सुनना व देखना पसंद करते हैं…

इस वीडियो में चर्चा होगी कि क्या आकाश आनंद के निकालने के बाद क्या बसपा प्रमुख बहन मायावती जी की स्थिति भारत पाकिस्तान के बंटवारे के समय वाले दलित चिंतक जोगेंद्र नाथ मंडल जैसी तो नहीं हो रही है?

चूंकि आप एक सजग और जिम्मेदार नागरिक हैं इसलिये आपसे अनुरोध है कि पूरी वीडियो को ध्यान से देखें… और जहां मैं गलत दिखूं तो करेक्ट करें और सही दिखूं तो कमेंट में हमारा हौसला बढ़ाने के लिये अपनी राय व्यक्त करें…

दोस्तों राजनीतिक अनिश्चितताओं का खेल है और ऐसे में कब क्या हो जाये इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है… लेकिन राजनीतिक इतिहास से अगर आंखे मूंद ली जायें तो हमें अंधेरे में तीर चलाने जैसा परिणाम हासिल होता है…

इससे पहले आगे बढ़ें आइये जानते हैं कि जोगेन्द्र नाथ मंडल कौन थे… और उनका परिचय क्या है…

दलित चिंतक और बाबा साहब के सहयोगी के रूप में प्रसिद्ध होने वाले जोगेन्द्र नाथ मंडल का जन्म 29 जनवरी, 1904 में हुआ, उनका जन्मस्थान गुलाम भारत के बारीसल जिले में हुआ था जो वर्तमान में बांग्लादेश का हिस्सा है।

जोगेंद्र नाथ मंडल नमूसूरा समुदाय से आते थे। तब ये समुदाय हिंदू जाति व्यवस्था के बाहर माना जाता था। उन्होंने इसी मुद्दे पर आंदोलन खड़ा किया था। जोगेन्द्र नाथ मंडल ने 1937 के भारतीय प्रांतीय विधानसभा चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था। उन्होंने बखरागंज उत्तर पूर्व ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र बंगाल विधान सभा में एक सीट पर चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जिला समिति के अध्यक्ष सरकल कुमार दत्ता को हराया।

सुभाष चंद्र बोस और शरतचंद्र बोस दोनों ने इस समय जोगेन्द्र नाथ मंडल को काफी प्रभावित किया था। 1940 में जोगेन्द्र नाथ मंडल मुस्लिम लीग के साथ जुड़ गए थे जो एकमात्र दूसरी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पार्टी थी। कहा जाता है कि इसी समय के आसपास जोगेन्द्र नाथ मंडल और भीमराव अंबेडकर ने अनुसूचित जाति संघ की बंगाल शाखा की स्थापना की थी।

15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद, जोगेन्द्र नाथ मंडल पाकिस्तान के संविधान सभा के सदस्य और अस्थायी अध्यक्ष बने और कानून और श्रम के लिए नए बने देश के पहले मंत्री की जिम्मेदारी उन्हें दी गई। पाकिस्तानी अखबार डॉन के अनुसार जोगेन्द्र नाथ मंडल को 1946 में भारत के विभाजन से पहले तैयार राजनीतिक सेटअप में मुस्लिम लीग के मंत्री के रूप में प्रतिनिधित्व करने का गौरव मिला था। बाद में, उन्होंने 11 अगस्त, 1947 को संविधान सभा के ऐतिहासिक सत्र की अध्यक्षता की, जहां मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरल के रूप में शपथ ली। जिन्ना ने हिंदू धार्मिक पदानुक्रम के सबसे निचले स्तर जिसे अछूत या दलित माना जाता था, उस वर्ग से आने वाले जोगेन्द्र नाथ मंडल पर भरोसा किया था।

लेकिन अब शुरू हुआ जोगेंद्र नाथ मंडल के पतन का समय… जोगेन्द्र नाथ मंडल पाकिस्तान सरकार के उच्चतम पदों में हिंदू सदस्य के तौर पर 1947 से 1950 तक तत्कालीन राजधानी कराची के बंदरगाह शहर में रहते थे। लेकिन वो पाकिस्तान सरकार में दलितों की स्थिति को लेकर हो रही ज्यादती से व्यथित थे… पाकिस्तान में दलितों के उत्थान के अनेकों असफल प्रयासों के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल साल 1950 में वो पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा देने के बाद भारत वापस लौटे आये।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि पाकिस्तानी प्रशासन में हिंदू विरोधी पूर्वाग्रह मजबूती से अपनी जड़ें जमा चुका है। उन्होंने अपने इस्तीफे में सामाजिक अन्याय और गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार से संबंधित घटनाओं का उल्लेख किया था।

बंटवारे के बाद से ही कुछ ही समय बाद पाकिस्तान में गैर मुस्लिमो को निशाना बनाया जाने लगा। हिन्दुओं के साथ लूटमार, बलात्कार की घटनाएं सामने आने लगीं तो जोगेन्द्र नाथ मंडल ने इस विषय पर सरकार को कई पत्र लिखे। लेकिन सरकार ने उनकी एक न सुनी। जोगेन्द्र नाथ मंडल को बाहर करने के लिए उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जाने लगा।

जोगेन्द्र नाथ मंडल को इस बात का एहसास हुआ, जिस पाकिस्तान को उन्होंने अपना घर समझा था, वो उनके रहने लायक नहीं है। वह बहुत आहत हुए, क्योंकि उन्हें यकीन था कि पाकिस्तान में दलितों के साथ अन्याय नहीं होगा। तकरीबन दो सालों में ही दलित मुस्लिम एकता का उनका ख्बाब टूट गया था, जिसके बाद वो वापस हिंदुस्तान लौट आए थे।

भारत में आने के बाद कुछ वर्ष गुमनामी की जिन्दगी जीने के बाद 5 अक्टूबर, 1968 को पश्चिम बंगाल में उन्होंने अंतिम सांस ली।

अब सवाल यह है कि मायावती का जोगेन्द्र नाथ मंडल की कहानी से क्या संबंध हैं? इस वक्त दलित राजनीति में मायावती का चेहरा सबसे बड़ा है और उनकी ओर करोड़ों दलित उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। लेकिन मायावती जी अपनी राजनीतिक व पारिवारिक संघर्षों में इस वक्त मंझधार में तैर रही हैं…

दलितों के प्रति उनकी चिंता तो है लेकिन अनैतिक रूप से अर्जित अकूत धन–संपदा और परिवार में बढ़ती उलझनें उनके मिसन की धार को कमजोर कर रही हैं… दूसरी ओर राजनीतिक समकीरणों की बात करें तो मायावती दलित–मुस्लिम समीकरण के सहारे राजनीतिक संघर्षों के लिये जानी जाती हैं…

यही हाल जोगेंद्र नाथ मंडल की भी थी। उन्होंने भारत बंटवारे के समय पाकिस्तान जाने का निर्णय इसीलिये लिया था क्योंकि उन्हें पता था कि दलित मुस्लिमों के साथ आसानी से रह सकते हैं… मगर वहां जाने के कुछ ही वर्षों में उनका सपना चूर–चूर हो गया… और घोर निराशा हाथ लगी…

अभी तक मायावती जी का भी दलित–मुस्लिम समीकरण का तिलिस्म अन्य पार्टियों के लिये अबूझ पहेली की तरह था… मगर अब राजनीति में वह दौर शुरू हो चुका है जिसमें हिन्दू–मुस्लिम की राजनीति चरम पर है और दलित–मुस्लिम का समीकरण कहीं भी स्पष्ट रूप से एक साथ एक मंच पर आता हुआ दिखाई नहीं देता…

कहने का तात्पर्य यह है कि अब दलितों को जोड़ने की जो वजहें पहले मायावती जी के पास हुआ करती थी अब उन वजहों को लेकर दलित सशंकित है… पिछले चुनावों में मायावती जी की पार्टी की परफार्मेंस को देखें तो पता चलता है कि उनसे वोटर्स का मोहभंग हो रहा है। उनका वोट प्रतिशत 40 से सिमट कर अब सात प्रतिशत पर आ गया है।

वर्ष 2007 विधानसभा चुनाव में बीएसपी सुप्रीमो मायावती के नेतृत्व में पार्टी को अकेले 40.43% वोट मिले थे। इतना वोट पाकर बीएसपी ने 206 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज कर यूपी की सत्ता हासिल कर ली थी। 2007-2012 तक यूपी की सत्ता में रही BSP का जनाधार धीरे-धीरे खिसकता गया। पार्टी को 2012 में 25.91% वोट के साथ 80 सीटें मिली, 2017 में 22.23% वोट के साथ 19 सीट मिली और 2022 में 12.83% वोट के साथ महज 1 सीट मिली। वहीं बीएसपी सुप्रीमो Mayawati के नेतृत्व में यूपी विधानसभा उपचुनाव 2024 में पार्टी को वोट प्रतिशत लगभग 7% तक पहुंच गया है।

कुल मिलाकर जोगेंद्र नाथ मंडल की तरह ही मायावती का शायद आने वाले कुछ ही समय में हस्त्र देखने को मिले। मुस्लिमों के सहारे दलित उत्थान की बातें महज कोरी कल्पना हैं बल्कि निराधार भी…

जो भी दलित आकाश आनंद में अंडर करंट देख रहे थे उसका भी कनेक्शन काटकर मायावती ने यह सिद्ध कर दिया कि अब आने वाले समय में बहुजन समाज पार्टी की दशा व दिशा भारत–पाकिस्तान के बंटवारे के समय जोगेंद्र नाथ मंडल की तरह ही होगा।