
जनादेश, चुनाव आयोग और बदलती चुनावी व्यवस्था पर बहस
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनावी व्यवस्था आज राजनीतिक बहस के केंद्र में है। चुनाव में मिली हार को लेकर चुनाव प्रक्रिया और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवालों के बीच भारत की चुनावी यात्रा को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में देखना जरूरी है। स्वतंत्रता के बाद कठिन परिस्थितियों में लगातार चुनाव कराने वाले चुनाव आयोग की उपलब्धियां और उसकी कार्यप्रणाली दोनों लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा रही हैं।
25 जनवरी 1950 को संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 के तहत चुनाव आयोग की स्थापना हुई। स्वतंत्र, निष्पक्ष और संवैधानिक रूप से जवाबदेह चुनाव कराने की जिम्मेदारी वाली यह संस्था शुरुआत में एक सदस्यीय थी, जिसे 1989 के बाद तीन सदस्यीय बनाया गया। संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम आयोग के कामकाज की मूल आधारशिला रहे हैं।
1952 में हुए पहले आम चुनाव आयोग के लिए असाधारण चुनौती थे। करीब 36 करोड़ की आबादी में 17 करोड़ से अधिक मतदाताओं के लिए 489 लोकसभा सीटों और राज्यों की विधानसभा सीटों पर मतदान कराना था। देश के विशाल भौगोलिक क्षेत्र, कठिन जलवायु, सीमित परिवहन सुविधाओं और कम साक्षरता के बीच मतदाता सूची, मतदान केंद्र, मतपत्र, मतपेटियां और मतदान व्यवस्था तैयार करना अपने आप में एक बड़ा प्रयोग था।
25 अक्टूबर 1951 से 27 मार्च 1952 तक चले चुनाव में 68 चरणों में मतदान हुआ। लाखों मतदान कर्मियों की तैनाती के साथ दूरदराज के क्षेत्रों में अस्थायी सड़क और पुल तक बनाए गए। रेगिस्तान से लेकर पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों तक मतदाता लंबी दूरी तय कर मतदान केंद्रों तक पहुंचे। इस चुनाव में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने मतदान किया और मतदान प्रतिशत 45 से अधिक रहा। इसके बाद 1957 में मतदान प्रतिशत करीब 46, 1962 में 56 और 1967 में 61 प्रतिशत तक पहुंचा।
पहले आम चुनाव में 53 से अधिक राजनीतिक दल और बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में थे। उस समय कुछ लोकसभा क्षेत्रों में एक सामान्य और एक अनुसूचित जाति या जनजाति के प्रतिनिधि के निर्वाचन की अस्थायी व्यवस्था भी थी। यह व्यवस्था 1957 तक जारी रही। 17 अप्रैल 1952 को पहली लोकसभा के गठन के साथ स्वतंत्र भारत की संसदीय लोकतांत्रिक यात्रा ने औपचारिक रूप से नया चरण शुरू किया।
इसके बाद चुनाव आयोग की व्यवस्था लगातार विकसित होती गई। मतदाता पहचान पत्र, नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदान के प्रति जागरूकता, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और मतदान प्रक्रिया के सरलीकरण जैसे बदलाव चुनाव व्यवस्था का हिस्सा बने। बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स के दौर से निकलकर भारतीय चुनाव व्यवस्था आज ईवीएम और वीवीपैट तक पहुंच चुकी है।
चुनाव आयोग के विभिन्न प्रमुखों का कार्यकाल भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। शुरुआती दौर में सुकुमार सेन और के. सुंदरम जैसे अधिकारियों की कार्यकुशलता की चर्चा हुई। बाद के वर्षों में मतदान की आयु 18 वर्ष किए जाने, ईवीएम की शुरुआत और चुनाव आयोग के बहुसदस्यीय स्वरूप जैसे महत्वपूर्ण बदलाव हुए। टी. एन. शेषन के कार्यकाल को भी चुनाव प्रशासन में कड़ाई और सुधारों के संदर्भ में याद किया जाता है।
हालांकि कुछ चुनाव आयुक्तों के सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक दलों से जुड़ने या सार्वजनिक पद ग्रहण करने को लेकर समय-समय पर सवाल उठे। चुनावी व्यवस्था ने एक दौर में बूथ कब्जे, बाहुबल, मतपत्रों की हेराफेरी और हिंसा जैसी चुनौतियां भी देखीं। इसके बावजूद चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया में जनता का व्यापक विश्वास लंबे समय तक बना रहा।
आज चुनाव का पैमाना 1952 की तुलना में कई गुना बड़ा है। करोड़ों मतदाताओं वाला भारत अब लगभग 100 करोड़ मतदाताओं वाले लोकतंत्र में बदल चुका है। मतदान केंद्रों की संख्या भी लाखों में पहुंच गई है और ईवीएम-वीवीपैट मशीनों का व्यापक इस्तेमाल हो रहा है। चुनाव घोषित होने के बाद प्रशासनिक मशीनरी पर आयोग की निगरानी और जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
हाल के वर्षों में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अधिक मुखर हुए हैं। विभिन्न दल चुनाव परिणामों और चुनाव प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग दावे करते रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि चुनावी संस्थाओं पर उठने वाले सवालों का परीक्षण ठोस प्रमाण, पारदर्शी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही के आधार पर हो।
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि सत्ता परिवर्तन और चुनावी हार-जीत इसकी स्वाभाविक प्रक्रिया हैं।

