- सफाई कर्मचारी से लगाये पालिका अधिकारी, सभासद तक से शिकायत,फ़िर भी कूड़ा हफ्तों नहीं उठता
- डीएम साहब के आदेश के बावजूद विद्यालय में छात्र, प्राध्यापक ही लगा रहे हैं झाड़ू
- संजय दुबे
मऊ। शहर के पाश इलाके के रूप में शुमार है स्वदेशी कॉटन मिल के दक्षिणी दिशा का रिहायशी मोहल्ला। इसे शिक्षा नगर कॉलोनी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ स्थित प्राइमरी विद्यालय में प्रिंसिपल सहित छात्र – छात्राएं स्वयं झाड़ू लगाते हैं।ये ख़बर नहीं,सूचना भर है हमारी व्यवस्था करने वाली संस्थाओं में फैली अव्यवस्था को अपनी कार्य संस्कृति का हिस्सा बना लेने का। यहाँ से बेसिक शिक्षा अधिकारी का कार्यालय महज़ 100 मीटर की ही दूरी पर है ।
फ़िर भी ऐसी व्यवस्था चल रही है। क्या आप सोच सकते है कि एक प्राइमरी स्कूल के प्रिंसिपल को सफाई कर्मचारी तक डांट – डपट दें? जी हाँ! ऐसा संभव है ये कम से कम प्रिंसिपल सुशील कुमार पाण्डेय के साथ तो संभव है। इसकी पुष्टि वो स्वयं करते हैं।ऐसा इसलिए क्योंकि वो सरकारी स्कूल के प्राध्यापक हैं।
आज से तकरीबन साल भर पूर्व डीएम साहब ने सफाई कर्मचारियों को यहाँ रोज़ झाड़ू लगाने के लिए कहा, कुछ समय तक ये सुचारु रूप से चला फ़िर, अपने पुराने ढर्रे पर आ गया। यहाँ के प्रिंसिपल स्वयं दिव्यांग है पर चपलता किसी सम्पूर्ण देहधारी से ज्यादा है। व्यवहार कुशलता इतनी कि इन्होंने अपने विद्यालय को सुन्दर बनाने के लिए अपने पड़ोसियों, शुभेच्छुओं मनोज सिंह, सचिन्द्र सिंह और डॉ. संजय सिंह से कहा और उन महानुभावों ने विद्यालय के लिए ईंट, रेत और बाउंड्री वाल सहित उस पर फेसिंग तक करवा दी। किसी प्राइवेट स्कूल में क्या किसी का बच्चा झाड़ू लगाता है? नहीं ना!
क्योंकि वहां अभिभावक स्वयं ऐसा होने पर अपने बच्चों का नाम कटवा लेंगे। इन नौनिहालों का दोष बस इतना कि इनके घर वालों ने इन्हें सरकारी स्कूल में प्रवेश दिला दिया है। इसकी वज़ह चाहे जो हो पर उद्देश्य तो इन्हें शिक्षा दिलाना ही है न? फ़िर? इन्हें सरकार भी चाहती है कि ऐसे बच्चें पढ़ लिख काबिल बनें। आखिर और सहयोगी सरकारी संस्थान इनके साथ सहयोगात्मक रूख क्यों नहीं अपनाते?
प्रेमचंद ने कहा है -” अल्प वेतन पर शिक्षण कार्य करने वाला अध्यापक छात्रों को साक्षर तो बना सकता है पर शिक्षित नहीं। ” प्रदेश सरकार ने शिक्षकों की नियुक्ति की है। अभी और भी पद भरे जाने बाक़ी हैं। वेतन भी ठीक है। फ़िर भी जो पढ़ाई होनी चाहिए वो क्यों नहीं हो पा रही है? इसकी भी पुष्टि वीडियो में है।
आज,उत्तर प्रदेश के प्राइमरी विद्यालयों में नियुक्त शिक्षकों की गुणवत्ता पर कोई संदेह नहीं है बस, इनके छात्र कायदे से पढ़ भर लें। गणित, विज्ञान, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू सहित सभी विषयों के योग्य अध्यापक हैं। नये पाठ्यक्रम का जो स्तर है यदि वास्तव में बच्चें पढ़ लें तब उनमें विश्लेषण क्षमता और ज्ञान संधारण की वो क्षमता विकसित हो सकती है जो उन्हें उनके प्रिय विषय का निः संदेह विद्वान बना सकती है।
लेकिन इसके लिए अध्यापकों को पढ़ाना होगा। इसके लिए उनके पास समय बहुत कम बच पा रहा है।इनके पास पढ़ाने के अतिरिक्त अन्य कार्य इतने है कि इनका ध्यान पढ़ाने से ज्यादा उधर चला जा रहा है। साफ़ – सफाई, ड्रेस – क़िताब, भोजन – पानी इसी की गणित में ये उलझें पड़े हैं फ़िर छात्रों को जोड़, घटाना, गुणा, भाग कौन और कैसे समझा पायेगा?
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