टैरिफ की धमकी, तेल की राजनीति और भारत–अमेरिका रिश्तों की नई दिशा

टैरिफ की धमकी, तेल की राजनीति और भारत–अमेरिका रिश्तों की नई दिशा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की धमकी ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा राजनीति में एक नई बेचैनी पैदा कर दी थी। भारत, जो पिछले कुछ वर्षों में रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल रहा है, स्वाभाविक रूप से इस बयान से चिंतित हुआ। लेकिन अब जिस तरह नई दिल्ली ने मॉस्को से तेल आयात में उल्लेखनीय कटौती की है, उससे यह संकेत मिलता है कि भारत पर इस तरह के अत्यधिक टैरिफ लगाए जाने का खतरा फिलहाल लगभग टलता नजर आ रहा है। यह बदलाव केवल ऊर्जा नीति का नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक संतुलन का भी संकेत है।

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से लंबित व्यापार समझौते की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल का यह कहना कि दोनों देशों के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत लगातार जारी है और किसी न किसी रूप में समझौता संभव है, यह दर्शाता है कि कूटनीतिक स्तर पर बर्फ पिघलने लगी है। यह भी महत्वपूर्ण है कि ऊंचे टैरिफ के बावजूद अमेरिका को भारत का निर्यात बढ़ा है, जो यह बताता है कि दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर निर्भरता कम नहीं, बल्कि अधिक गहराई से जुड़ रही हैं।

भारत–अमेरिका व्यापार समझौता अब तक इसलिए अटका रहा, क्योंकि भारत अपने कृषि और डेयरी सेक्टर को विदेशी प्रतिस्पर्धा के लिए खोलने के पक्ष में नहीं रहा है। यह रुख केवल संरक्षणवाद नहीं, बल्कि करोड़ों छोटे किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। दूसरी ओर, अमेरिका लगातार बाजार पहुंच की मांग करता रहा है और इसी दबाव के तहत भारत पर कुल 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए गए, जिनमें रूस से तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त शुल्क भी शामिल था। ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ की अमेरिकी घोषणा ने इस दबाव को और बढ़ा दिया था।

हालांकि, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर के बीच हुई बातचीत यह दिखाती है कि दोनों पक्ष टकराव के बजाय समाधान की दिशा में बढ़ना चाहते हैं। मौजूदा वैश्विक हालात—चाहे वह रूस–यूक्रेन संघर्ष हो, पश्चिम एशिया की अस्थिरता हो या चीन के साथ बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा—भारत और अमेरिका को एक-दूसरे के और करीब ला रहे हैं। ऐसे में व्यापार समझौता केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का आधार बन सकता है।

भारत द्वारा रूसी तेल आयात में कटौती को केवल अमेरिकी दबाव के आगे झुकाव के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा। यह कदम इस बात का संकेत भी है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक संतुलन—तीनों के बीच नई गणना कर रहा है। सस्ते तेल से मिलने वाला तात्कालिक आर्थिक लाभ महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे कहीं अधिक अहम दीर्घकालिक व्यापार और रणनीतिक रिश्ते हैं, जिनमें अमेरिका की भूमिका निर्णायक बनती जा रही है।

ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति और भारत की सतर्क प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया है कि वैश्विक व्यापार अब केवल बाजार का खेल नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक दबावों का विस्तार बन चुका है। ऐसे माहौल में भारत का यह संकेत कि वह व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है, लेकिन अपने मूल हितों से समझौता नहीं करेगा, एक संतुलित और परिपक्व रुख को दर्शाता है।

अंततः, यदि भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर सहमति बनती है, तो यह न केवल टैरिफ के खतरे को टालेगी, बल्कि दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई मजबूती भी देगी। मौजूदा संकेत यही बताते हैं कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को रणनीतिक और आर्थिक साझेदार के रूप में खोना नहीं चाहते। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि लंबे समय से जमी बर्फ अब पिघलने लगी है और समझौते की मंजिल अब केवल समय की बात रह गई है।