
हिंदी दिवस के अवसर पर स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ के सरदार पटेल सुभारती विधि संस्थान में आयोजित जागरूकता अभियान ने भाषा और न्याय के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध को सामने रखा। ‘विधि शिक्षा एवं न्याय प्रणाली में भारतीय भाषाओं की भूमिका’ जैसे विषय पर विद्यार्थियों और विशेषज्ञों का संवाद इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि कानून की पहुंच केवल कानून की उपलब्धता से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उसे समझने योग्य भाषा में प्रस्तुत करना भी उतना ही आवश्यक है।
कानून की भाषा स्वभावतः तकनीकी और विशिष्ट होती है। विधिक शब्दावली में सटीकता का विशेष महत्व है, क्योंकि किसी शब्द या वाक्य की छोटी-सी भिन्नता भी कानूनी अर्थ बदल सकती है। लेकिन तकनीकी सटीकता और आम नागरिक के लिए बोधगम्यता के बीच संतुलन कायम करना भी उतना ही जरूरी है। यदि नागरिक अपने अधिकार, दायित्व या किसी कानूनी प्रक्रिया को ही न समझ सके, तो कानून की वास्तविक उपयोगिता सीमित हो जाती है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इसी पहलू पर जोर दिया कि विधि शिक्षा और न्यायिक प्रक्रिया में भाषा सरल, स्पष्ट और सहज होनी चाहिए। यह विचार केवल हिंदी तक सीमित नहीं है। भारत की भाषाई विविधता को देखते हुए तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी, गुजराती सहित अन्य भारतीय भाषाओं में भी विधिक ज्ञान और नागरिक अधिकारों की जानकारी को व्यापक रूप से उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।
वरिष्ठ अधिवक्ता चरण सिंह त्यागी द्वारा ज्ञान और बौद्धिक क्षमता को किसी एक भाषा से नहीं जोड़ने की बात भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भाषा व्यक्ति की क्षमता का पैमाना नहीं हो सकती। किसी विद्यार्थी की विधिक समझ उसकी अंग्रेजी या हिंदी पर पकड़ से अधिक उसके तर्क, कानून की अवधारणाओं की समझ और न्यायिक विवेक से निर्धारित होती है। इसलिए भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का उद्देश्य अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा के महत्व को कम करना नहीं, बल्कि ज्ञान के अवसरों को अधिक व्यापक बनाना होना चाहिए।
विधि शिक्षा में भारतीय भाषाओं की भूमिका का प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी आबादी कानून से जुड़े मामलों में सीधे विशेषज्ञ नहीं होती। पुलिस प्रक्रिया, प्राथमिकी, कानूनी नोटिस, अदालत की कार्यवाही, सरकारी योजनाओं और नागरिक अधिकारों से जुड़े दस्तावेज आम व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं। इनकी जानकारी यदि केवल अत्यधिक तकनीकी भाषा में उपलब्ध हो, तो सामान्य नागरिक को अपने अधिकारों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
इसके साथ एक सावधानी भी जरूरी है। कानून को सरल बनाने का अर्थ उसकी कानूनी सटीकता से समझौता करना नहीं होना चाहिए। विधिक भाषा में सरलीकरण करते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि मूल कानूनी अर्थ, अधिकार और दायित्व में कोई अनपेक्षित बदलाव न आए। इसके लिए अनुवाद, पारिभाषिक शब्दावली और विधिक प्रशिक्षण की गुणवत्तापूर्ण व्यवस्था आवश्यक होगी।
विद्यार्थियों के साथ हुए संवाद का महत्व इसी कारण बढ़ जाता है। आज के विधि विद्यार्थी ही भविष्य के अधिवक्ता, न्यायिक अधिकारी, विधि शिक्षक और नीति-निर्माण से जुड़े पेशेवर बनेंगे। यदि उनकी शिक्षा के दौरान ही उन्हें जनसुलभ विधिक संचार का महत्व समझाया जाए, तो वे कानून और समाज के बीच की दूरी कम करने में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।
हिंदी दिवस जैसे अवसर भाषा के सम्मान का प्रतीक जरूर हैं, लेकिन भारतीय भाषाओं की वास्तविक प्रतिष्ठा उनके नियमित और सार्थक प्रयोग से होगी। विधि, प्रशासन और न्याय जैसे क्षेत्रों में भाषाई पहुंच बढ़ाना तभी सार्थक होगा, जब नागरिक को कानून केवल सुनाई या पढ़ाई न दे, बल्कि वह उसे समझ भी सके।
न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता का एक आधार उसकी निष्पक्षता है, तो दूसरा आधार उसकी पहुंच। भाषा इस पहुंच की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसलिए विधि शिक्षा और न्याय प्रणाली में भारतीय भाषाओं का विस्तार केवल भाषायी आग्रह नहीं, बल्कि न्याय को अधिक जनसुलभ बनाने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम भी हो सकता है।
