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सूबे की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हैं ये चुनावी गारंटी

झारखंड चुनाव के लिए मंगलवार को रांची में इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और सीपीआईंएम ने संयुक्त रूप से ‘एक वोट सात गारंटी’ के नाम से घोषणा पत्र जारी करते हुए चुनावी वैतरिणी पार करने के लिए सात गारंटी देकर फिर पुराना हथकंडा अपनाया। इन सात गारंटियों में महिलाओं को हर महीने 2500 रुपए देने, अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को 14 प्रातिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने, राशन वितरण को 7 किलो प्रति व्यक्ति करने, 15 लाख का पारिवारिक बीमा, युवाओं के लिए दस लाख रोजगार, फसलों की एमएसपी बढ़ाने, हर जिले में मेडिकल और इंजीनियरिग कालेज खोलने सहित कईं बड़े वादे किए गए हैं। यदि देखा जाए तो इन सात वादों में मात्र 2500 रुपए प्रति माह देने और 7 किलो अनाज को ही रेवड़ी कहा जा सकता है। जहां तक ओबीसी के आरक्षण का सवाल है तो उनका आरक्षण केंद्र सरकार की नौकरियों में तो 27 प्रातिशत है ही कईं अन्य राज्यों में भी इतना ही है। उत्तर प्रदेश में तो 1977 में ही 27 प्रतिशत पिछड़ों को आरक्षण दे दिया गया था जबकि मंडल आयोग की सिफारिशें 1990 में लागू हुईं और उच्चतम न्यायालय के संविधान पीठ ने भी 27
प्रतिशत को वैध मानते हुए 1990 के दशक में लागू करने की अनुमति दे दी थी। इसलिए 14 से 27 प्रतिशत का आरक्षण वादा रेवड़ी नहीं वादा ही माना जा सकता है। इसी तरह मेडिकल कालेज और इंजीनियरिग कालेज खोलने की बात की जाए तो यह राजनीतिक दलों के लिए स्वस्थ परम्परा बन सकती है। रोजगार बढ़ाने और देने का वादा भी रेवड़ी की श्रेणी में नहीं आता किन्तु यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि 2019 से 2024 के रोजगार बढ़ाने के लिए क्या किसी विपक्षी पार्टी या नेता ने उन्हें रोका था? घोषणा पत्र में स्पष्ट होना चाहिए था कि अपने कार्यंकाल में उन्होंने कितना रोजगार पैदा किया और कितनी नौकरियां मुहैया कराईं। इस विवरण के बाद उनके रोजगार या नौकरी के वादे पर भरोसा किया जा सकता था। इसी तरह सरकार द्वारा 2500 रुपए का हर परिवार की महिला सदस्य को हर माह के भुगतान का वादा जरूर मुफ्त की रेवड़ी में आता है। इससे राज्य का राजकोष अत्यधिक प्रभावित होगा। कैश देने की लालच से वोटर बहुत जल्दी प्रभावित होते हैं, इसीलिए राजनीतिक पार्टियां यह हकंडा अपनाती हैं। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि कैश वितरण के वादे उन राज्यों को ठन-ठन गोपाल बना देती है जिनकी कोईं अतिरिक्त आमदनी नहीं है। झारखंड की हालत तो यह है कि वह अपने राज्य के कर्मचारियों का वेतन देने के लिए ही जुगाड़ में लगी रहती है। इसलिए कैश का वादा करना राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए खिलवाड़ साबित होता है। रही बात 7 किलो अनाज की तो यही काम केद्र सरकार भी करती है और उसकी इस रेवड़ी के लिए आलोचना भी होती है। अनाज देने का वादा उन्हें किया पर यह उन्हें दिया जाना चाहिए जो ग्रामीण भूमिहीन और शहरी गरीब व्यवसाय विहीन हों। समृद्ध लोगों को भी इस तरह अनाज वितरण का वादा वोट के लिए लालच माना जा सकता है।

बहरहाल मुफ्त रेवड़ी की चुनावी वैतरिणी पार होने के लिए सभी पार्टियां देती हैं। किन्तु सभी को यह विचार करना पड़ेगा कि यदि वह जनता को रिश्वत देकर उनका वोट चाहते हैं तो इसका भविष्य में चुनावी प्रक्रिया को दूषित करने में बहुत बड़ा योगदान साबित होगा। यही नहीं सरकार बनने के बाद ये गारंटियां पूरी हों या न हों राज्य की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा होने की गारंटी पक्की है।

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