जर्मन विचारक शापेनहार ने जब गीता पढ़ी तो वह नाचने लगा, जानें क्यूं?

ओशो ने इस विषय में बहुत ही रोचक बात बताई। उन्होंने कहा कि प्रगाढ़ विचारक विषाद की अवस्था में पहुंच ही जाते हैं। उसे कोई किरण न दिखाई पड़ती थी। अंधेरा ही अंधेरा था! अमावस की रात थी। कहीं सुबह होती भी है, इसका भी भरोसा खो गया था।

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जर्मन विचारक शापेनहार ने जब गीता पढ़ी तो वह नाचने लगा, जानें क्यूं?
जर्मन विचारक शापेनहार ने जब गीता पढ़ी तो वह नाचने लगा, जानें क्यूं?

प्रश्न: ओशो, जर्मन विचारक शापेनहार ने जब गीता पढ़ी, तो उसे सिर पर उठाकर नाचने लगा। फिर क्या वह कृष्ण—चेतना की ओर अग्रसर हुआ? और बर्ट्रेड रसेल ने भी गीता पढ़ी, परंतु वे कृष्ण से बहुत प्रभावित नहीं हुए। संभवत: वे बुद्ध से प्रभावित हुए हैं। फिर भी वे बुद्ध के भी शिष्य नहीं बने ! इन दोनों घटनाओं पर कछ प्रकाश डालें।

ओशो- शापेनहार और रसेल की चित्त—दशा बिलकुल अलग— अलग है। शापेनहार विषाद की दशा में है, वहीं जहां अर्जुन। शापेनहार पश्चिम का सबसे दुखवादी विचारक है, उदास। जीवन सिर्फ एक संताप है! वह विषाद—योग की दशा में था, जब उसके हाथ में गीता पड़ी। सब तरफ उसने खोजा था। लेकिन उसका विषाद मिटता नहीं था, घना होता था। वह अर्जुन की ही भाव—दशा में था।

बहुत प्रगाढ विचारक था शापेनहार। प्रगाढ़ विचारक विषाद की अवस्था में पहुंच ही जाते हैं। उसे कोई किरण न दिखाई पड़ती थी। अंधेरा ही अंधेरा था! अमावस की रात थी। कहीं सुबह होती भी है, इसका भी भरोसा खो गया था।

और तब उसके हाथ में गीता पड़ी, ऐसे जैसे प्यासे को मरुस्थल में अचानक झरना मिल गया! वह झरने का कलकल नाद अगर अचानक मरुस्थल में मिल जाए, तो तुम तानसेन के संगीत को सुनना पसंद न करोगे। सब संगीत फीके हो जाएंगे। वह नाद अदभुत होगा, क्योंकि तुम्हारी प्यास से मेल खाएगा।
संयोग की बात थी, शापेनहार ठीक अर्जुन की दशा में था, और गीता उसके हाथ पड़ गयी। गीता उसने पढ़ी और एक ही बैठक में पढ़ गया। वह आंख न झपक सका। श्वास अवरुद्ध हो गयी। उठायी गीता सिर पर और नाचने लगा।

घर के लोगों ने, परिवार के लोगों ने, मित्रों ने, शिष्यों ने समझा कि अब वह पूरा पागल हुआ। डर तो उन्हें पहले से था कि इतने विषाद में कोई रहेगा, तो पागल हो जाएगा। अब हो गया पागल! यह क्या पागलपन है?

लेकिन शापेनहार ने कहा, जिस किरण का मुझे भरोसा नहीं था, वह किरण का भरोसा मिला। यात्रा लंबी है; मंजिल मिले या न मिले; पर भरोसा मिल गया। गीता में मुझे किरण मिल गयी, झलक मिल गयी।

नहीं कि वह महात्मा हो गया; हो जाएगा किसी जन्म में। क्योंकि जहां आशा है, वहां सुबह ज्यादा दूर नहीं। देर—अबेर शापेनहार घर लौट गया होगा, या लौट जाएगा। लेकिन विषाद अकेला नहीं रहा; विषाद में अंधेरे भरे घर में एक सूरज की किरण उतर आई। अब उस किरण के सहारे को लेकर सूरज तक जाया जा सकता है। लंबी यात्रा है। लेकिन सूरज भी कहीं होगा, अन्यथा किरण नहीं हो सकती थी। कृष्ण की किरण उसे छू गयी।

रसेल विषाद में नहीं था, इसलिए चित्त—दशा राजी ही नहीं थी। रसेल साधारण प्रसन्नचित्त आदमी था। उदासी और दुख से उसका कोई तालमेल नहीं। और जब विषाद ही न हो, तो गीता शुरू ही नहीं होती। इसलिए तो गीता विषाद—योग से शुरू होती है। जो अभी जीवन में दुखी ही नहीं हुआ, उसे अभी जीवन की पीड़ा ही नहीं दिखायी पड़ी, उसने जीवन की रात ही नहीं पहचानी, काटे का ही अनुभव नहीं हुआ, अभी उससे गीता का मेल नहीं होगा।

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रसेल ने पढ़ ली होगी, ऐसे ही जैसे बिन प्यासे आदमी के पास से जल की धार बहती रहे। देख ली, आंख उठा ली; बाकी उस देखने से कोई नाचेगा नहीं। बिन प्यासे आदमी के पास से जल का कलकल नाद होता रहे, थोड़ी देर में उसे लगेगा कि बंद करो यह शोरगुल, कोई काम ही नहीं हो पाता। उसे उस कलकल नाद में जीवन का परम संगीत नहीं सुनायी पड़ेगा।ध्यान रखना, भीतर प्यास हो, तो ही बाहर जल में संगीत सुनायी पड़ सकता है।

रसेल ठीक अवसर में नहीं था। ठीक क्षण न था, जहां गीता से मेल हो जाए। चूक गया। बुद्ध से थोड़ा मेल रसेल का हुआ, क्योंकि बुद्ध प्रखर बुद्धिवादी हैं। यद्यपि बुद्धि के पार ले जाते हैं, लेकिन बुद्धि के ही माध्यम से ले जाते हैं।

कृष्ण का सूत्र तो समर्पण है। बुद्ध का सूत्र समर्पण नहीं है। बुद्ध का सूत्र तो ध्यान है। बुद्ध तो कहते हैं, बुद्धि से विचार करो जितना कर सकते हो, अंततः करो, आत्यंतिक रूप से विचार करो। और ऐसी घड़ी आ जाएगी कि विचार करते—करते ही तुम विचार के पार हो जाओगे, क्योंकि विचार की एक सीमा है, और तुम्हारी सीमा नहीं है। लेकिन विचार से ही तुम पाओगे।

बुद्ध का धर्म बुद्धि का धर्म है। रसेल को जमा। रसेल को जीसस भी इतने नहीं जमते हैं, यद्यपि वह ईसाई घर में पैदा हुआ है। क्योंकि जीसस का भी तालमेल कृष्ण से ज्यादा है—समर्पण, प्रार्थना, भक्ति— भाव! तर्क पर नहीं है जोर जीसस का। लेकिन बुद्ध बड़े तर्कनिष्ठ हैं। इसलिए दुनिया में जो आदमी भी तर्कनिष्ठ है, वह बुद्ध से निश्चित प्रभावित होगा।

लेकिन बुद्ध के साथ भी रसेल बहुत दूर तक न गया। वह वहीं तक गया, जहां तक बुद्ध रसेल के साथ गए। इस फर्क को समझ लेना।

जहां तक बुद्ध रसेल के साथ गए, वहां तक रसेल उनके साथ गया। उसके आगे रास्ते अलग हो गए। फिर वह बुद्ध के साथ नहीं गया, इसलिए बुद्ध का शिष्य नहीं बना।
जहां तक रसेल के साथ बुद्ध ने मेल खाया, रसेल ने कहा, बिलकुल ठीक। जहां मेल भिन्न हुआ, टूटा, रसेल ने बुद्ध से कहा, अपने रास्ते और तुम्हारे रास्ते अलग, अब हम अलग—अलग जाते हैं। यहां तक साथ रहा, ठीक; लेकिन यात्रा सदा हमारी साथ नहीं हो सकती। अब तुम गड़बड़ बात करते हो!

क्योंकि रसेल मानता है, बुद्धि के ऊपर कोई तत्व है ही नहीं। इस संबंध में वह बहुत मताग्रही है। वह कहता है, बुद्धि आखिरी तत्व है। इसके ऊपर तुमने बात की कि अंधविश्वास शुरू हुआ। इसके ऊपर तुमने बात की कि फिर तुमने उपद्रव शुरू किया। फिर दुनियाभर के उपद्रव आ जाएंगे; भूत—प्रेत, भगवान, सब पीछे से आ जाएंगे; मोक्ष, स्वर्ग—नर्क, पाप—पुण्य, पादरी, पुरोहित, पंडित, सब आ जाएंगे। जैसे ही तुमने तर्क का साथ छोड़ा कि ये सब अंधेरे के वासी एकदम प्रवेश कर जाएंगे। और रसेल कहता है, इनसे बचना है। रसेल कहता है, धर्म से बचना है।

रसेल की बात में थोड़ी सचाई है, क्योंकि धर्मों ने बहुत अहित किया है। अहित इसीलिए किया है कि धर्म धर्म नहीं रहे, संप्रदाय हो गए। लेकिन अहित तो हुआ है। मनुष्य को अंधेरे में डाल रखने में सहयोगी बन गए धर्म। ले जाना था प्रकाश की तरफ, ले नहीं गए। कारागृह बन गए; बनना थी मुक्ति, स्वतंत्रता। जंजीरें ढाली उन्होंने। प्राणों में पंख न लगाए कि तुम आकाश में उड़ जाते। चर्च और मंदिर और मस्जिद और गुरुद्वारे तुम्हें घेरकर खड़े हो गए, वे जेलखाने बन गए। उनमें तुमने स्वतंत्रता का संगीत न सुना; कारागृह की बास, दुर्गंध आयी।

रसेल भी ठीक कहता है कि इससे ऊपर जाने में खतरा है। इसलिए इससे आगे वह बुद्ध के साथ नहीं जाता। इसलिए उनका शिष्य भी नहीं बन पाता। उसकी जरूरत नहीं है अभी। अभी विचार उसको काफी मालूम पड़ता है।

जरूरत का सवाल है। जैसे एक सात साल का बच्चा है, कामवासना की उसे अभी जरूरत नहीं है; चौदह का होगा, तब जरूरत होगी। एक समय होता है हर चीज का।
अगर विचार में रसेल चलता ही चला जाए, तो एक दिन शापेनहार की स्थिति में आएगा। विचार विषाद में ले जाएगा। और जब विचार विषाद में ले जाएगा, तब संबंध जुड़ेगा। तब या तो वह बुद्ध के साथ जाने को राजी हो जाएगा विचार के पार, या कृष्ण के साथ राजी हो जाएगा समर्पण को।

जहां तुम्हारे विचार की समाप्ति होती है वहीं बुद्ध, कृष्ण, क्राइस्ट खड़े हैं। तुम्हारी विचार की सीमा के पार खड़े हैं। जब तक तुम विचार के खिलौनों से खेल रहे हो, तब तक तुम्हारा उनसे संबंध न होगा।

रसेल बहुत प्रगाढ़ विचारक नहीं है। अगर प्रगाढ़ विचारक हो, तो विषाद पैदा होगा। क्योंकि जिसने गौर से देखा, उसे दुख दिखायी पड़ेगा ही। दुख है। और जिसे दुख दिखायी पड़ेगा, वह आनंद की खोज में निकलेगा ही। क्योंकि दुख से प्राण राजी नहीं होते हैं।