नीमच के रानपुर गांव में आंगनबाड़ी सहायिका की बहादुरी ने लिखी मानवता की मिसाल
हाइलाइट्स
- घटना: 2 फरवरी, दोपहर करीब 3:30 बजे, रानपुर (नीमच, मध्य प्रदेश)
- परिसर में मौजूद थे 20–25 बच्चे
- मधुमक्खियों के भीषण हमले में बच्चों को बचाते हुए कंचन बाई शहीद
- अस्पताल पहुंचने से पहले ही हुई मृत्यु, डॉक्टरों ने बताया एनाफिलेक्टिक शॉक संभव कारण
- परिवार में लकवाग्रस्त पति, एक बेटा और पोता
अफरातफरी के बीच साहस की कहानी
नीमच ज़िले के रानपुर गांव की आंगनबाड़ी में सोमवार दोपहर अचानक मधुमक्खियों का झुंड टूट पड़ा। जहां कुछ देर पहले बच्चों की किलकारियां गूंज रही थीं, वहां चीख-पुकार मच गई। उस समय परिसर में लगभग 20 से 25 बच्चे मौजूद थे।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए 55 वर्षीय आंगनबाड़ी सहायिका कंचन बाई तुरंत बच्चों की ओर दौड़ीं। उन्होंने बिना समय गंवाए बच्चों को अंदर ले जाकर दरियों, चादरों और यहां तक कि अपनी साड़ी से भी ढककर सुरक्षित करने का प्रयास किया।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक,

“अगर कंचन बाई उस दिन वहां नहीं होतीं, तो कई बच्चों की जान जा सकती थी।”
खुद घायल हुईं, पर बच्चों को बचा लिया
मधुमक्खियों के हमले में कंचन बाई के शरीर पर कई डंक लगे। बच्चों को सुरक्षित करने के बाद वह जमीन पर गिर पड़ीं। ग्रामीणों ने उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
सरवानिया महाराज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉक्टर संदीप शर्मा के अनुसार,
“मधुमक्खियों के भीषण हमले से एनाफिलेक्टिक शॉक हो सकता है, जो जानलेवा साबित होता है।”
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
कंचन बाई के परिवार में उनके पति शिवलाल (जो पिछले 4-5 साल से लकवाग्रस्त हैं), बेटा रवि मेघवाल और एक पोता हैं। रवि बताते हैं कि पिता के इलाज में 5 से 6 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं और आज भी हर महीने ₹2,500 से ₹3,500 दवाइयों पर लगते हैं।
रवि भावुक होकर कहते हैं,
“मां बच्चों को भगवान का रूप मानती थीं। उन्होंने कभी अपने काम को नौकरी नहीं समझा।”
जिस पोते को उन्होंने बचाया, उसके शरीर से भी 5-6 मधुमक्खियों के डंक निकाले गए।
गांव में शोक और मांगें
कंचन बाई न केवल आंगनबाड़ी सहायिका थीं, बल्कि ‘जय माता दी स्व-सहायता समूह’ की अध्यक्ष भी थीं। गांव में उन्हें भरोसे और स्नेह की प्रतीक के रूप में याद किया जा रहा है।
सरपंच लालाराम रावत ने सरकार से परिवार को आर्थिक सहायता और बेटे के लिए रोजगार की मांग की है।
घटना के बाद गांव में डर का माहौल है। आंगनबाड़ी के पास लगे हैंडपंप पर ही मधुमक्खियों का छत्ता होने से लोग वहां जाने से डर रहे हैं।

अधूरी व्यवस्थाएं बनीं कारण?
रवि का कहना है कि प्राथमिक स्कूल की इमारत जर्जर होने के कारण बच्चों को आंगनबाड़ी में पढ़ाया जाता है।
“अगर स्कूल की हालत ठीक होती, तो मां उस समय वहां होती ही नहीं।”
उन्होंने सरकार से स्कूल भवन, बाउंड्री और पानी की बेहतर व्यवस्था की अपील की है।
एक मां, एक रक्षक, एक मिसाल
कंचन बाई की कहानी सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि साहस, कर्तव्य और निस्वार्थ सेवा की मिसाल है। उन्होंने अपने प्राण देकर करीब 25 मासूम बच्चों की जान बचाई — जिनमें उनका अपना पोता भी शामिल था।
रानपुर गांव आज शोक में है, लेकिन कंचन बाई का नाम हमेशा सम्मान और गर्व के साथ लिया जाएगा।
