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  • विदेशी फंडिंग पर सख्त निगरानी की तैयारी और उभरते सवाल

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    देश में सशस्त्र नक्सलवाद खत्म होने के साथ ही अब एक बहस नए मोड़ पर पहुंच गई है। हाल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में कहा कि नक्सलवाद अब अंतिम दौर में है और आगे की चुनौती उन लोगों से है, जो शहरों में बैठकर इस विचारधारा को समर्थन देते हैं। उन्होंने इसे ‘अर्बन नक्सल’ का नाम दिया। यह बयान देश की आंतरिक सुरक्षा के मामले में सरकार की बदलती रणनीति का संकेत भी है। अर्बन नक्सल कोई आधिकारिक कानूनी शब्द नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक-सामाजिक विमर्श में इस्तेमाल होने वाला शब्द है।यह शब्द अक्सर उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है, जो शहरों में रहते हैं और कथित रूप से नक्सलवादी या माओवादी विचारधारा का समर्थन करते हैं या विकास के मामलों में अवरोध पैदा करते हैं। माना जाता है कि ऐसे लोग अपनी गैर सरकारी संस्थाओं के माध्यम से विदेशी फंड लेते है और उसका प्रयोग व्यवस्था के खिलाफ माहौल बनाते हैं। जिससे देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा पहुँचता है। यही नहीं, पिछले दिनों ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं जिससे ऐसी धनराशि को धर्मांतरण के लिए भी खर्च किया गया।

    इसी पृष्ठभूमि में प्रस्तुत ‘विदेशी अंशदान (विनियम) संशोधन बिल 2026’ (Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026) को देखना जरूरी हो जाता है, जिसे एफसीआरए (FCRA) भी संक्षिप्त में कहा जाता है। यह बिल 25 मार्च को सरकार द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था और बुधवार पहली अप्रैल को इसे चर्चा और मंजूरी के लिए सदन की कार्यवाही के लिए शामिल किया गया था,लेकिन विपक्षी दलों के विरोध को देखते हुए इस पर चर्चा नहीं हो सकी थी। फिलहाल इस विधेयक को अभी लंबित रखा गया है।

    प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन बिल का उद्देश्य विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 के तहत स्थापित ढांचे को सुदृढ़ करना है। यह विदेशी निधियों के उपयोग के लिए सख्त नियम, उन्नत निगरानी प्रणाली और ऐसे अंशदानों के माध्यम से अर्जित संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक तंत्र प्रस्तुत करता है। सामान्यतया यह विधेयक विदेशी चंदे के प्रवाह और उपयोग पर सख्त निगरानी स्थापित करने की कोशिश है। ऐसे में इस संशोधन विधेयक के प्रावधानों पर दृष्टि डालना जरूरी है।

    सरकार का तर्क है कि कुछ गैर-सरकारी संगठन विदेशी धन का उपयोग केवल सामाजिक कार्यों के लिए नहीं, बल्कि ऐसी गतिविधियों के लिए भी करते हैं जो देशहित, आंतरिक सुरक्षा और व्यवस्था के खिलाफ होती हैं। इसलिए इस धन के उपयोग को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना आवश्यक है। यह तर्क पहले भी दिया जाता रहा है, लेकिन इस बार इसे लागू करने के उपाय अधिक प्रभावी और व्यापक बनाए गए हैं।

    इस संशोधन विधेयक के प्रमुख प्रावधानों पर यदि नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि यह सरकारी नियंत्रण का दायरा बढ़ाता है। यदि किसी संस्था का पंजीकरण रद्द हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो उसकी विदेशी धन से बनी संपत्ति सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण के नियंत्रण में जा सकती है। यह प्रावधान सबसे अधिक विवाद का कारण बना है, क्योंकि इसे संस्थाओं की स्वायत्तता में सीधा हस्तक्षेप माना जा रहा है।

    इसके अलावा, विदेशी धन को एक ही बैंक खाते, नई दिल्ली स्थित भारतीय स्टेट बैंक में प्राप्त करने की अनिवार्यता, तथा उसे किसी अन्य संस्था को हस्तांतरित करने पर रोक की व्यवस्था दी गयी है। सस्पेंशन की स्थिति में संस्था अपने संसाधनों का उपयोग नहीं कर पाएगी, जिससे उसके कार्यक्रम पूरी तरह ठप हो सकते हैं। वैसे यह संशोधन मूलरूप से उचित भी हैं लेकिन यह स्थिति छोटे संगठनों के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

    सरकार इन प्रावधानों को आवश्यक मानती है। उसका कहना है कि इससे जबरन धर्मांतरण, राजनीतिक गतिविधियों में विदेशी हस्तक्षेप और विकास परियोजनाओं में व्यवधान जैसे मामलों पर रोक लगेगी। यह भी तर्क दिया जाता है कि कुछ संगठनों ने विदेशी धन का उपयोग स्थानीय असंतोष को बढ़ाने या सरकारी नीतियों के खिलाफ माहौल बनाने में किया है। सरकार की यह चिंता व्यापक हित में है।

    हालांकि, इस दृष्टिकोण से सभी सहमत नहीं हैं। विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह विधेयक जरूरत से ज्यादा कठोर है और इससे गैर-सरकारी संगठनों की स्वतंत्रता प्रभावित होगी। उनका मानना है कि कुछ अपवादों के आधार पर पूरे क्षेत्र को संदेह की दृष्टि से देखना उचित नहीं है। छोटे और जमीनी स्तर पर काम करने वाले संगठनों के लिए इन नियमों का पालन करना कठिन हो सकता है, जिससे उनके काम पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। विपक्ष ने संसद के भीतर और बाहर इस बिल के विरोध में हंगामा और प्रदर्शन किया।

    इस बहस का एक महत्वपूर्ण आयाम माओवाद के महिमामंडन से भी जुड़ा है। पिछले कुछ समय में यह देखा गया है कि कुछ बौद्धिक और शैक्षणिक मंचों पर माओवाद को एक वैचारिक प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसे सामाजिक असमानता के खिलाफ संघर्ष की भाषा में रखा जाता है।नक्सल या माओवाद का इतिहास हिंसा, भय और विकास विरोधी रहा है। स्कूलों, सड़कों और सार्वजनिक ढांचे को नुकसान पहुंचाना, निर्दोष लोगों और सुरक्षाबलों की हत्या करना जैसी घटनाएं किसी भी वैचारिक वैधता को कमजोर करती हैं। सशस्त्र गैरकानूनी फोर्स तैयार करना भी कतई उचित नहीं है। ऐसे में इस विचारधारा को महिमामंडित करना सामाजिक रूप से खतरनाक भी है। साथ ही व्यवस्था के विरोध में भी है। यहीं से विदेशी चंदे का प्रश्न और अधिक संवेदनशील हो जाता है। सरकार को आशंका है कि कुछ संगठन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे विचारों को समर्थन देने में भूमिका निभाते हैं। यह समर्थन हमेशा खुला नहीं होता, बल्कि कई बार बौद्धिक विमर्श और सार्वजनिक बहस के माध्यम से भी सामने आता है। इसलिए नियंत्रण को आवश्यक बताया जा रहा है।

    दूसरी ओर, आलोचक कहते हैं कि विदेशी एजेंसियों से चंदा या सहायता पाने वाली गैर सरकारी संस्थाओं पर इस तरह का नियंत्रण लोकतांत्रिक ढांचे के लिए उचित नहीं है। उनका कहना है कि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक समाज की भूमिका सीमित हो सकती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, मानवाधिकार और शोध के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों पर इसका असर पड़ना तय माना जा रहा है। मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका इस संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी भी विचारधारा को बिना आलोचनात्मक दृष्टि के प्रस्तुत किया जाता है, तो वह समाज में भ्रम पैदा कर सकता है। इसलिए आवश्यक है कि विमर्श तथ्यों और परिणामों के आधार पर हो।

    विपक्ष ने इस विधेयक को लेकर संवैधानिक सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि यह समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मूल अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, यह आशंका भी जताई जा रही है कि कानून का उपयोग चयनात्मक तरीके से किया जा सकता है। यह बहस अभी जारी है और इसका अंतिम रूप क्या होगा, यह देखना बाकी है। लेकिन विपक्ष का इस संशोधन विधेयक के विरोध में सदन में हंगामा करने का उद्देश्य भी समझ से परे है।

    यदि व्यापक प्रभाव की बात करें तो यह संशोधन विधेयक देश हित में है। एक ओर यह बिल विदेशी धन के दुरुपयोग को रोक सकता है और पारदर्शिता बढ़ा सकता है, वहीं दूसरी ओर यह संस्थाओं की स्वतंत्रता को सीमित भी कर सकता है। यही कारण है कि इसे केवल एक वित्तीय कानून नहीं, बल्कि राज्य और सिविल सोसाइटी के संबंधों को पुनर्परिभाषित करने वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है। यहाँ पर सवाल संतुलन का भी आता है। किसी भी लोकतंत्र में सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों आवश्यक हैं। यदि नियंत्रण अत्यधिक हो जाए तो स्वतंत्रता प्रभावित होती है और यदि नियंत्रण न हो तो व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इसलिए आवश्यक है कि दोनों के बीच एक संतुलित और न्यायसंगत रास्ता निकाला जाए। सरकार की जिम्मेदारी है कि कानून का उपयोग पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से हो, जबकि गैर-सरकारी संगठनों को भी अपनी कार्यप्रणाली में जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। माओवाद के महिमामंडन, धर्मांतरण और देश की संप्रभुता के खिलाफ जैसी प्रवृत्तियों पर रोक लगाना देश और समाज हित में जरूरी है।

    अंततः यही कहा जा सकता है कि यह बहस केवल विदेशी चंदे की नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को भी सुरक्षित रखने की है। यदि यह सशोधन बिल संसद में पारित कर दिया जाता है तो आने वाले समय में इसके परिणामों को देखा जा सकेगा। इससे अवश्य ही ऐसी गतिविधियों पर रोक लगेगी जो विदेशी फंड की मदद से अपने देश की व्यवस्थाएं ध्वस्त करने का कुविचार पालते हैं और अव्यवस्था को प्रसारित करते हैं।

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    प्रो. (डा.) सुभाष चंद्र थलेडी

    (लेखक सामयिक विषयों के स्वतंत्र टिप्पणीकार तथा वरिष्ठ मीडियाकर्मी हैं।)

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