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  • श्वास को क्यों देखते है? और कैसे देखते हैं?

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    प्रश्न – आप श्वास-प्रश्वास के दर्शन को क्यों कहते हैं?
    इसलिए कहता हूं कि श्वास-प्रश्वास, प्राण ही शरीर और आत्मा के बीच सेतु है। उसी माध्यम से आत्मा शरीर में है। उसके प्रति जागने से, श्वास-प्रश्वास के प्रत्यक्ष से धीरे-धीरे यह अनुभव होगा कि मैं शरीर नहीं हूं-शरीर में हूं पर शरीर ही नहीं हूं। वह मेरा आवास है, मेरा आधार नहीं। श्वास-प्रश्वास का प्रत्यक्ष जैसे- जैसे गहराएगा, वैसे-वैसे ही उसकी निकटता अनुभव होगी जो कि देह नहीं है। एक क्षण स्पष्ट दर्शन होगा-शरीर का और स्वयं की पृथकता का। तब तीन पर्तें व्यक्तित्व की ज्ञात होंगी- शरीर की, प्राण की व आत्मा की। शरीर आवरण है, प्राण जोड़ है,आत्मा आधार है।

    साधना में प्राण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है,क्योंकि वह मध्य-बिंदु है। उसके इस पार शरीर है,उस पार आत्मा है। शरीर पर तो हम हैं ही। आत्मा में होना है। पर उसके पूर्व प्राण पर होना जरूरी है। इसी में संक्रमण हो सकता है।

    प्राण पर जाग्रत होकर दोनों ओर देखा जा सकता है। रास्ता वहां पहुंच कर दोनों ओर का स्पष्ट हो जाता है। एक ही मार्ग है, पर दोनों दिशाएं स्पष्ट हो जाती हैं। फिर प्राण के पीछे जाना सुगम हो जाता है। मैं समझता हूं कि आप समझें होंगे कि मैं श्वास-प्रश्वास पर जोर क्यों देता हूं?

    ध्यान में श्वास-प्रश्वास को हम किस भांति देखें?

    रीढ़ को सीधी रखें। रीढ़ झुकी हुई न हो। रीढ़ की सीधी स्थिति में शरीर सहज साम्यावस्था में होता है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण, ग्रेविटेशन उस पर सम प्रभाव डालता है और उसके भार से मुक्त होने में आसानी होती है। गुरुत्वाकर्षण का भार कम से कम हो तो शरीर शून्य होने में बाधा नहीं देता है।

    रीढ़ को सीधी रखें पर शरीर पर कोई तनाव याअकड़ाव नहीं। शरीर सहज शिथिल हो, जैसे किसी खूंटी पर कोई वस्त्र टंगा हो, ऐसा ही वह भी रीढ़ पर टंगा हो। शरीर को ढीला छोड़ दें। फिर गहरी और धीमी श्वास लें। श्वास का आना नाभि-केंद्र को ऊपर-नीचे आंदोलिन करेगा। उस आंदोलन को देखते रहें। उस पर एकाग्रता नहीं करनी है। उसे केवल देखते रहना है। उसका मात्र साक्षी होना है। स्मरण रखें, मैं एकाग्रता को नहीं कह रहा हूं। मैं केवल होश, वॉचफुलनेस, सजगता के लिए कह रहा हूं।

    श्वास भी ऐसे लें, जैसे छोटे बच्चे लेते हैं। उनका वक्षस्थल तो नहीं कंपता, पर पेट कंपता है। यही विधि नैसर्गिक श्वास-प्रश्वास की है। इसके परिणाम में शांति अपने आप सघन होती जाती है। चित्त-अशांति और तनावों के कारण हम श्वास पूरी लेना धीरे- धीरे भूल ही जाते हैं। युवा होते-होते कृत्रिम श्वास-प्रश्वास हमें पकड़ लेता है। यह तो आपने अनुभव किया ही होगा कि आपका मन जितना अशांत होता है, उतनी ही श्वास-प्रक्रिया अपनी सहजता और गतिबद्धता को खो देती है।

    श्वास को नैसर्गिक रूप से लें- लयबद्ध और सहज। उसके संगीत से चित्त-अशांति विलीन होने में सहायता मिलती है।

    ओशो
    साधना पथ, प्रवचन – 3

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    editor

    पत्रकारिता में बेदाग 11 वर्षों का सफर करने वाले युवा पत्रकार त्रिनाथ मिश्र ई-रेडियो इंडिया के एडिटर हैं। उन्होंने समाज व शासन-प्रशासन के बीच मधुर संबंध स्थापित करने व मजबूती के साथ आवाज बुलंद करने के लिये ई-रेडियो इंडिया का गठन किया है।
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