हर क़दम पर रास्ते में डर खड़े मुस्तैद हैं।
हार मानूँ क्यूँ भला जब हौसले मुस्तैद हैं।।
जीत का झंडा मुझे है इक न इक दिन गाड़ना।
पास संसाधन नहीं पर तजरबे मुस्तैद हैं।।
एक सुलझाये अगर तो दूसरा पैदा हुआ।
ज़िंदगी भर रहते कितने मसअले मुस्तैद हैं।।
ज़िंदगी है वो हमारा, दूर हमसे है मग़र।
पास जाये कैसे जब अब फ़ासले मुस्तैद हैं।।
डर समाया दिल में मेरे क्या मिलेगी मंज़िलें।
पाँव से चिपके हुए जब आबले मुस्तैद हैं।।
दौड़कर वो पास आये मैं ख़ुशी से जब घिरा।
दर्द के रहते हमेशा कैमरे मुस्तैद हैं।।
जाम नज़रों से मुझे तो वो पिलाते क्यूँ नहीं।
मुझको लगता कि तेरे मयकदे मुस्तैद हैं।।
‘अब्र’ साथी और कोई मैं बना सकता नहीं।
जो किए थे उससे मैंने वायदे मुस्तैद हैं।।

अब्र लखनवी
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