
राजनीति, चुनाव और शासन व्यवस्था अपनी जगह हैं, लेकिन हम राष्ट्र निर्माण और विकसित भारत के संकल्प को लेकर निकले हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘सेवा’ को शासन और सार्वजनिक जीवन का मूल भाव बताना भारतीय राजनीति में सत्ता की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण विमर्श सामने रखता है। गुजरात से दिल्ली तक के अपने राजनीतिक सफर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, मूल मार्ग सेवा का ही रहना चाहिए। यह कथन केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए संदेश नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं को परिभाषित करने वाली अवधारणा के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है।
‘सेवा संकल्प यात्रा’ के प्रतिभागियों से संवाद में प्रधानमंत्री ने राजनीति, चुनाव और शासन को राष्ट्र निर्माण के व्यापक लक्ष्य से जोड़ने की बात कही। उनका जोर इस बात पर रहा कि सरकारी नीतियों के केंद्र में नागरिक होना चाहिए। लोकतांत्रिक शासन की वास्तविक कसौटी भी यही है कि सत्ता और प्रशासन आम नागरिक के जीवन में कितनी सकारात्मक भूमिका निभाते हैं।
प्रधानमंत्री ने गरीबों, महिलाओं, लड़कियों, मरीजों और आदिवासियों सहित विभिन्न वर्गों के लिए संचालित योजनाओं को सेवा भाव से जोड़ते हुए ‘जन सेवा से देश सेवा’ को अपने जीवन का मूलमंत्र बताया। हालांकि किसी भी सरकार की नीतियों का मूल्यांकन केवल उनके घोषित उद्देश्य से नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन, पहुंच और वास्तविक परिणामों से होता है। सेवा का भाव तभी सार्थक माना जाएगा जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी और पारदर्शी तरीके से पहुंचे।
इस संदर्भ में युवाओं की भूमिका पर दिया गया प्रधानमंत्री का जोर भी महत्वपूर्ण है। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल सरकारी कार्यक्रमों से पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए शिक्षा, कौशल, रोजगार, नवाचार, उद्यमिता और सामाजिक भागीदारी जैसे क्षेत्रों में युवाओं की सक्रिय भूमिका आवश्यक होगी। युवा पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का आह्वान तभी प्रभावी होगा जब उसे अवसरों और जिम्मेदारियों, दोनों से जोड़ा जाए।
‘सेवा संकल्प यात्रा’ को भी इसी व्यापक दृष्टि से देखा जा सकता है। गुजरात के वडनगर से वाराणसी तक की यात्रा में विभिन्न राज्यों के युवाओं की भागीदारी है। प्रधानमंत्री ने उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों के पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय समाधानों और भारत की विविधता में एकता की भावना को समझने का संदेश दिया। यह दृष्टिकोण विकास को केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित न रखकर सामाजिक अनुभवों और स्थानीय ज्ञान से जोड़ने की कोशिश है।
उन्होंने ‘शक्ति की सप्त धाराओं’ का उल्लेख करते हुए युवाओं से इसके विचार को लोगों तक पहुंचाने का आह्वान किया। यदि विकसित भारत का लक्ष्य व्यापक राष्ट्रीय अभियान है, तो ऐसे विचारों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे आम नागरिक के जीवन से कितनी मजबूती से जुड़ते हैं।
सत्ता लोकतंत्र में साध्य नहीं, नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है। इसलिए ‘सेवा’ की अवधारणा का महत्व केवल भाषणों या राजनीतिक नारों में नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता, जवाबदेही और नीतियों के परिणामों में दिखाई देना चाहिए। सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी सेवा को मूल मार्ग बनाए रखना तभी सार्थक होगा, जब शासन की कार्यशैली में उसका ठोस प्रतिबिंब दिखाई दे।











