- सुप्रीम कोर्ट ने गोवा सरकार से जवाब मांगा
- तेजपाल ने दोषसिद्धि और दस साल की सजा को दी चुनौती
पूर्व तहलका संपादक तरुण तेजपाल से जुड़े 2013 के यौन अपराध मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 25 सितंबर 2026 को गोवा सरकार को नोटिस जारी किया। तेजपाल ने बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें 2021 की निचली अदालत की बरी करने की व्यवस्था पलटते हुए उन्हें दोषी ठहराया गया और 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
कोटेशन बॉक्स: “सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केवल नोटिस जारी किया है। दोषसिद्धि या दस साल की सजा पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।”
इस मामले की मौजूदा स्थिति को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि इसमें दो अलग-अलग अपीलें सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं। एक ओर तेजपाल ने अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी है, वहीं गोवा सरकार ने 10 साल की सजा को बढ़ाकर उम्रकैद करने की मांग की है।
मामले की शुरुआत नवंबर 2013 में गोवा के एक होटल में एक महिला सहकर्मी द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों से हुई थी। गोवा की सत्र अदालत ने 2021 में तेजपाल को बरी कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 6 अगस्त 2026 को निचली अदालत का फैसला पलटते हुए तेजपाल को दोषी ठहराया और 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में उन्हें आत्मसमर्पण से छूट देने की मांग स्वीकार नहीं की और निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण करने को कहा था। इसके बाद उन्होंने गोवा की अदालत में आत्मसमर्पण किया और जेल भेजे गए।
अब सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने तेजपाल की याचिका पर गोवा सरकार से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान तेजपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अपील पर जल्द सुनवाई के साथ सजा निलंबित करने की मांग पर विचार करने का अनुरोध किया। पीठ ने इस अनुरोध पर तारीख देने की बात कही है।
दूसरी ओर, गोवा सरकार की अपील का उद्देश्य सजा बढ़वाना है। राज्य ने हाईकोर्ट द्वारा दी गई 10 वर्ष की सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग की है। यानी सुप्रीम कोर्ट के सामने एक तरफ दोषसिद्धि और सजा को चुनौती है, जबकि दूसरी तरफ राज्य सजा बढ़ाने की मांग कर रहा है।
इस स्तर पर यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। नोटिस जारी होना अपील स्वीकार किए जाने या दोषसिद्धि में बदलाव का निर्णय नहीं है। फिलहाल हाईकोर्ट की दोषसिद्धि और 10 वर्ष की सजा प्रभावी है तथा आगे की सुनवाई में अदालत दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करेगी।
कानूनी प्रक्रिया का यह चरण इस बात की भी याद दिलाता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में निचली अदालत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक अलग-अलग स्तरों पर साक्ष्यों और कानूनी निष्कर्षों की समीक्षा संभव होती है। ऐसे मामलों में अंतिम स्थिति न्यायालय के अंतिम निर्णय से ही निर्धारित होती है।
