
चीन के साथ भारत का बढ़ता व्यापार घाटा देश की आर्थिक नीतियों और विनिर्माण क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत-चीन व्यापार असंतुलन में तेजी से वृद्धि की बात स्वीकार की है। यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है, क्योंकि आर्थिक रिश्तों में वास्तविक स्थिति को समझे बिना उसका समाधान तलाशना संभव नहीं है। चीन के साथ व्यापार में असंतुलन केवल आयात और निर्यात के आंकड़ों का मामला नहीं, बल्कि देश के उद्योग, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता से भी जुड़ा है।
गलवान में भारतीय सैनिकों और चीनी सेना के बीच हिंसक संघर्ष के बाद देश में चीन के प्रति नाराजगी बढ़ी थी। चीनी सामान के बहिष्कार की अपीलें भी हुईं। उस समय यह उम्मीद की गई थी कि लोग चीनी उत्पादों से दूरी बनाकर भारतीय उद्योगों को मजबूत करेंगे। लेकिन भावनात्मक विरोध और बाजार की वास्तविकता में बड़ा अंतर दिखाई देता है। रोजमर्रा के इस्तेमाल की अनेक वस्तुओं से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और औद्योगिक मशीनों तक, भारतीय बाजार में चीनी उत्पादों की मौजूदगी बनी हुई है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव की 2024 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए लेख में दावा किया गया है कि भारतीय उपभोक्ताओं के दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाली बड़ी संख्या में वस्तुएं चीन में निर्मित हैं। इनमें छाते, खिलौने, टॉर्च, लैंप, घरेलू सामान और छोटे उपकरण जैसी चीजें शामिल हैं। इसके अलावा मोबाइल फोन, टेलीविजन और बड़े औद्योगिक उपकरणों के क्षेत्र में भी चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल उपभोक्ताओं से बहिष्कार की अपील करने से बाजार की निर्भरता समाप्त नहीं हो सकती। इसके लिए देश में उत्पादन की मजबूत व्यवस्था खड़ी करनी होगी।
चिंता का विषय यह भी है कि तैयार उत्पादों का आयात घरेलू उद्योग के विकास और रोजगार सृजन की संभावनाओं को सीमित कर सकता है। यदि कोई वस्तु भारत में बनती है या उसके पुर्जों को जोड़ने का काम देश में होता है, तो उत्पादन, परिवहन, पैकेजिंग और बिक्री जैसे क्षेत्रों में रोजगार पैदा होता है। लेकिन जब तैयार माल सीधे विदेश से आता है, तो इन गतिविधियों का बड़ा हिस्सा उसी देश में रहता है। इसलिए आयात पर निर्भरता घटाने का उद्देश्य केवल व्यापार घाटा कम करना नहीं, बल्कि देश में रोजगार और औद्योगिक क्षमता बढ़ाना भी होना चाहिए।
भारत और चीन के बीच व्यापार का असंतुलन इस समस्या को और गंभीर बनाता है। लेख में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के शुरुआती छह महीनों में व्यापार घाटा 69 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक बताया गया है। ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि भारत चीन से जितना सामान खरीद रहा है, उसके मुकाबले वहां अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पा रहा है। हालांकि, व्यापार के अलग-अलग आंकड़ों की अवधि और गणना का आधार स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि स्थिति का सही आकलन किया जा सके।
वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि भारत बातचीत के जरिए व्यापार संबंधी बाधाओं को दूर करने में विश्वास करता है और उसने एकतरफा दंडात्मक कार्रवाई का रास्ता नहीं चुना है। चीन के साथ संवाद बनाए रखना जरूरी है, लेकिन बातचीत तभी अधिक प्रभावी होगी जब भारत के पास अपने उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी हो। यदि भारतीय कंपनियां गुणवत्ता, कीमत, तकनीक और उत्पादन की मात्रा के मामले में मजबूत होंगी, तो वे चीन सहित दूसरे देशों के बाजारों में बेहतर अवसर हासिल कर सकेंगी।
यह मानना भी उचित नहीं होगा कि आर्थिक प्रगति केवल किसी एक शासन व्यवस्था की वजह से होती है। लोकतंत्र और तानाशाही की तुलना करने के बजाय यह देखना अधिक उपयोगी है कि सरकारें उद्योगों के लिए कैसा वातावरण बनाती हैं, कारोबार करना कितना आसान है, नीतियों में कितनी स्थिरता है और शिक्षा तथा तकनीक में कितना निवेश किया जाता है। दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों की औद्योगिक सफलता भी बताती है कि दूरदर्शी नीतियां, कुशल श्रम और मजबूत संस्थाएं आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
भारत के सामने चुनौती इसलिए भी बड़ी है कि कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है और सेवा क्षेत्र अकेले सभी लोगों को पर्याप्त रोजगार नहीं दे सकता। विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत किए बिना बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करना कठिन होगा। इसके लिए छोटे और मध्यम उद्योगों को सस्ता ऋण, आधुनिक तकनीक, बेहतर बुनियादी ढांचा और बाजार तक आसान पहुंच उपलब्ध करानी होगी। साथ ही, शोध, कौशल विकास और गुणवत्ता सुधार पर भी ध्यान देना होगा, ताकि भारतीय उत्पाद केवल घरेलू बाजार तक सीमित न रहें।भारतीय बाजार से चीनी सामान की निर्भरता घटाने के लिए केवल बहिष्कार के नारे पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए देश में उद्यमशीलता, विनिर्माण क्षमता और प्रतिस्पर्धा बढ़ानी होगी, ताकि भारतीय उत्पाद घरेलू और वैश्विक बाजारों में अपनी जगह बना सकें।
चीन के साथ व्यापारिक संबंध समाप्त करना न व्यावहारिक है और न ही अपने आप में आर्थिक समाधान। जरूरी यह है कि भारत आयात पर अत्यधिक निर्भरता कम करे, निर्यात बढ़ाए और घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाए। इसके लिए सरकार, उद्योग जगत और उपभोक्ताओं—तीनों की भूमिका है। सरकार को अनुकूल नीतियां बनानी होंगी, उद्योगों को गुणवत्ता और नवाचार पर काम करना होगा और उपभोक्ताओं को भारतीय उत्पादों के प्रति भरोसा तभी मिलेगा, जब वे कीमत और गुणवत्ता की कसौटी पर खरे उतरेंगे।
गलवान के बाद पैदा हुई भावनात्मक लहर ने चीन पर निर्भरता के सवाल को सामने जरूर रखा, लेकिन उसका स्थायी समाधान नारों से नहीं निकलेगा। भारत को ऐसी आर्थिक क्षमता विकसित करनी होगी कि वह अपनी जरूरतों का अधिक हिस्सा देश में पूरा कर सके और दुनिया के बाजारों में भी मजबूत स्थान बना सके। चीन से व्यापार घाटा कम करने का वास्तविक रास्ता यही है—घरेलू उत्पादन बढ़ाना, उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करना और भारतीय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना।
