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  • इमिग्रेशन नीति पर मैक्रों को घेरा, फ्रांस की हिंसा के पीछे आर्थिक और सामाजिक कारण भी जिम्मेदार

फ्रांस में हिंसा को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की इमिग्रेशन नीति पर सवाल उठाए हैं। ट्रम्प ने दावा किया कि पेरिस जल्द मुस्लिम शहर बन जाएगा। उन्होंने कहा कि करीब आठ साल पहले ही उन्होंने मैक्रों को दूसरे देशों से बड़ी संख्या में लोगों को फ्रांस में प्रवेश देने के खिलाफ चेतावनी दी थी। ट्रम्प लंबे समय से इमिग्रेशन पर सख्त नीति अपनाने की वकालत करते रहे हैं।

प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़ों के अनुसार, फ्रांस में धार्मिक आबादी को लेकर अलग-अलग सर्वेक्षणों में अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं। एक अनुमान में करीब 46 प्रतिशत लोग ईसाई, 43 प्रतिशत किसी धर्म को न मानने वाले और लगभग 9 प्रतिशत मुस्लिम बताए गए हैं। हालांकि, फ्रांस में जनगणना के दौरान नियमित रूप से धर्म संबंधी जानकारी नहीं जुटाई जाती, इसलिए इन आंकड़ों में अंतर हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि फ्रांस में हिंसा के लिए केवल इमिग्रेशन को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। महंगाई, रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतें, आर्थिक परेशानियां, सरकारी सुविधाओं पर दबाव और युवाओं में असंतोष भी तनाव के संभावित कारण हो सकते हैं। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिणपंथी नेता और कुछ टिप्पणीकार इमिग्रेशन नीति को और सख्त बनाने की मांग कर रहे हैं।

प्रदर्शन के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाओं के बाद फ्रांस में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई। उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक, 17 अक्टूबर को कई शहरों में हिंसक झड़पें हुईं। सरकारी इमारतों में आगजनी, दुकानों में लूटपाट और ऐतिहासिक इमारतों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आईं। पुलिस ने 2,400 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया, जबकि हिंसा रोकने के प्रयास में करीब 1,000 पुलिसकर्मियों और सैन्य जवानों के घायल होने का दावा किया गया।

इन घटनाओं के बाद प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने सरकार की आपात बैठक बुलाई। जानकारी के अनुसार, पेरिस, लिली और नीस समेत कई शहरों में कर्फ्यू लगाने तथा जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय आपातकाल लागू करने की संभावना पर भी चर्चा की गई।

इमिग्रेशन पर बहस तेज, दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी

फ्रांस में हिंसा और इमिग्रेशन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हालांकि, ट्रम्प के पेरिस के भविष्य को लेकर किए गए दावे को तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। धार्मिक आबादी के आंकड़े भी सर्वेक्षणों पर आधारित अनुमान हैं। घटनाओं, हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या और प्रस्तावित सरकारी कदमों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।

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