
सपा-भाजपा ने भी चखा जीत का स्वाद
सिवाल क्षेत्र में बदलते रहे ‘सियासी सूरमा’
मेरठ। परिसीमन और आरक्षण के फेरबदल से किसी क्षेत्र का राजनीतिक भूगोल और जन-मिज़ाज कैसे बदलता है, इसका जीवंत उदाहरण है मेरठ की सिवालखास विधानसभा सीट। वर्ष 2007 तक अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित रही यह सीट 2012 में जैसे ही ‘सामान्य’ घोषित हुई, यहाँ के सियासी समीकरण पूरी तरह ध्वस्त हो गए। बदलाव के बाद से अब तक हुए हर चुनाव में जनता ने किसी एक दल पर भरोसा जताने के बजाय हर बार नया सरताज चुनकर अपनी अनूठी राजनीतिक शैली का परिचय दिया है।
…चरण सिंह के नाम है सिवाल सीट पर जीत की हैट्रिक…
1974 में अस्तित्व में आई इस सीट पर पहला चुनाव कांग्रेस के रामजीलाल सहायक ने जीता था। इसके बाद 1977 में जनता पार्टी के हरि सिंह, 1980 में कांग्रेस के हेमचंद निमेष और 1985 में कांग्रेस के नानकचंद यहाँ से विधायक चुने गए। इस सीट का सबसे रोचक पहलू यह रहा कि यहाँ से लगातार तीन बार 1989, 1991 और 1993 में विधायक बनने का रिकॉर्ड केवल कस्बा सिवालखास के निवासी चरण सिंह (जनता दल) के नाम दर्ज है।
…उपचुनाव में बसपा के सुंदर लाल वर्मा जीते…
1996 में भारतीय किसान कामगार पार्टी के बनारसी दास चांदना ने जीत दर्ज की। बनारसी दास के निधन के बाद हुए उपचुनाव में बसपा के सुंदरलाल वर्मा ने जीत हासिल कर यहाँ पहली बार हाथी का खाता खोला। 2002 में राष्ट्रीय लोकदल के रणवीर राणा ने बसपा के सुंदरलाल वर्मा को मात देकर नल का परचम लहराया। 2007 में आरक्षित सीट के आखिरी चुनाव में बसपा के विनोद हरित ने रालोद के नरेंद्र खजूरी को हराकर यह सीट वापस बसपा के खाते में डाल दी।
…सियासी मिज़ाज बदलते ही दौड़ी साइकिल…
वर्ष 2012 के चुनाव से ठीक पहले परिसीमन हुआ और आरक्षण समाप्त होकर सीट सामान्य श्रेणी में आ गई। इसके बाद यहाँ की राजनीति ने ऐसी करवट ली कि पुराने सारे गणित ध्वस्त हो गए।
सामान्य सीट पर हुए पहले चुनाव में समाजवादी पार्टी के गुलाम मोहम्मद ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर क्षेत्र में पहली बार ‘साइकिल’ दौड़ाई।
…पहली बार खिला क्षेत्र में भाजपा का कमल…
2017 में प्रदेशव्यापी भगवा लहर के बीच भारतीय जनता पार्टी के जितेंद्र सतवाई ने जीत हासिल कर पहली बार सिवालखास में ‘कमल’ खिलाया। भाजपा के जितेंद्र सतवाई ने सपा के प्रत्याशी गुलाम मोहम्मद को हराकर क्षेत्र में भगवा झंडा फहराया।
…दो दशक के बाद मिली राष्ट्रीय लोकदल को जीत…
2022 में सपा-रालोद गठबंधन के तहत यह सीट रालोद के पाले में गई। चुनाव मैदान में उतरे गुलाम मोहम्मद ने रालोद के चुनाव चिह्न नल पर जीत दर्ज की। वर्ष 2002 में रणवीर राणा की जीत के बाद रालोद को सिवालखास में अपनी बारी के लिए पूरे 20 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा।
… सियासी हवा बदली तो जनता ने दिया संदेश…
आरक्षण हटने के बाद वर्ष 2012 से 2022 तक के आँकड़े गवाही देते हैं कि सिवालखास की जनता ने किसी भी दल को लगातार सिर-आंखों पर नहीं बिठाया। यहाँ हर चुनाव में नए मुद्दे, नए समीकरण बने और क्षेत्र की सियासत की दिशा बदलती रही।
