CM of UP Conflicts: भाजपा के लिए कितने योग्य हैं योगी?

CM of UP Conflicts: भाजपा के लिए कितने योग्य हैं योगी?
CM of UP Conflicts: भाजपा के लिए कितने योग्य हैं योगी?
  • अमर आनंद

CM of UP Conflicts: कोरोना से निपटने के लिए योगी फुल फार्म में हैं और वो भी जो योगी से निपटना चाहते हैं बल्कि यूं कहिए कि उनसे उनकी कुर्सी झपटना चाहते हैं। नागपुर से दिल्ली होकर चली ये हवा लखनऊ में तूफान का रूप लेती जा रही है और इस तूफान के बाद की खामोशी में राज्य में लड़खड़ाती हुई बीजेपी अपनी संभावनाएं देख पाएगी ऐसी उम्मीद की जा रही है।

गंगा में बहती और उसके किनारे रखी गई हजारों लाशों और उसकी वजह से लाखों आंखों में निकले आंसुओं को पार्टी ज्यादा असरदार मान रही है इतना ज्यादा कि उसके आगे महात्मा जैसे दिखने की कोशिश करने वाले मोदी की आंखों के आंसुओं की रत्ती भर भी अहमियत नहीं है अगर अहमियत होती तो 2024 से पहले 2022 के लिए इसे ही पर्याप्त मान लिया जाता।

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संघ सक्रिय है, पार्टी दंडवत है और मुलाकातों के सिलसिले जारी हैं।

2017  में पहले राजनाथ सिंह का नाम चलाया गया लेकिन बाद में संघ की जिद पर ही दिल्ली की मर्जी के बगैर मनोज सिन्हा के बदले योगी को 2017 में कुर्सी पर बिठाया गया था और अब संघ और दिल्ली दोनो ही योगी के खिलाफ नजर आ रहे हैं। कुप्रबंधन के लिये शुरुआती आलोचना झेलने के बाद मजबूत इच्छाशक्ति वाले मेहनती योगी जिस तरीके से कोरोना के असर को कम करने में जुटे हैं वो काबिल ए तारीफ है लेकिन पार्टी के मुताबिक 2022 के लिए ये पर्याप्त नहीं है।

पार्टी की आशंका है कि पंचायत चुनाव की तरह ही साइकिल तेज चल गई तो कमल को मुरझाने से कोई नहीं रोक पाएगा और 2022 के बाद 2024 में भी इसका असर दिखेगा। यूपी की कमान के लिए राजनाथ सिंह का नाम फिर से चर्चा में है। इसके पीछे ठाकुर के बदले ठाकुर का विकल्प भी हो सकता है राष्ट्रीय राजनीति से उन्हें  स्नेटकर दिल्ली में एक प्रतिद्वंद्वी कम करने का भी। 

CM of UP Conflicts: कमल की मुसीबत से सब घराये

पार्टी की आशंका है कि पंचायत चुनाव की तरह ही साइकिल तेज चल गई तो कमल को मुरझाने से कोई नहीं रोक पाएगा और 2022 के बाद 2024 में भी इसका असर दिखेगा। यूपी की कमान के लिए राजनाथ सिंह का नाम फिर से चर्चा में है। इसके पीछे ठाकुर के बदले ठाकुर का विकल्प भी हो सकता है राष्ट्रीय राजनीति से उन्हें  स्नेटकर दिल्ली में एक प्रतिद्वंद्वी कम करने का भी। 

हालांकि सबसे ज्यादा चर्चा मोदी जी के करीबी 1988 बैच के गुजरात कैडर के आईएएस ए के शर्मा की है जिन्हें हाल में पीएमओ से वीआरएस दिलाकर यूपी भेजा गया है और विधान परिषद का सदस्य बनाया गया । प्रशासनिक कौशल और सूझबुझ के धनी ए के शर्मा में समस्याओं  का समाधान निकलने की गजब की प्रतिभा हैं और उनकी इस प्रतिभा का उपयोग वाराणसी  और पूर्वांचल के दूसरे जिलों में कोरोना से निपटने में किया जा रहा है। 2001 से लेकर पीएमओ के अपने कार्यकाल तक गुजरात और दिल्ली में रहते हुए मोदी की कई ऐसी सरकारी,  गैर सरकारी और रणनीतिक मुश्किलें शर्मा जी ने सुलझाई हैं कि मोदी क्या, उनका कोई भी मुरीद हो जाए।

CM of UP Conflicts: शर्मा जी की स्थिति

मऊ वाले शर्मा जी योगी की तरह ही जमीनी और खांटी भी है और पूर्वांचल से भी लेकिन दोनों में फर्क ये है कि योगी की तरह न तो वह धार्मिक नेता है और न ही राजनीतिक। फिर भी भूमिहार शर्मा ठाकुर योगी के विकल्प के रूप में देखे और समझे जा रहे हैं। गौरतलब है कि गाजीपुर से ताल्लुक रखने वाले जिन मनोज सिन्हा के बदले योगी  को 2017 में यूपी की कमान मिली थी, मऊ एके शर्मा उन्हीं की भूमिहार जाति के हैं जो इस समय योगी के विकल्प के रूप में देखे जा रहे हैं। 

दरअसल दिल्ली लखनऊ में बदलाव पहले से चाहती थी उसे अवसर अब मिल रहा है। वह भी ऐसे समय में जब नागपुर से चुनौती झेल रही दिल्ली को भी बहुत ताकतवर नहीं माना जा रहा है और दिल्ली को एक खतरा लखनऊ यानी योगी से भी रहा है। जहिर तौर पार 2022 की लड़ाई जीत जाने पर बिना दाढ़ी वाले असली साधु योगी दाढ़ी बढ़ाकर साधू दिखने की कोशिश करने वाले मोदी पर भारी पड़ते नजर आते इसलिए भी योगी के तेज को कम या खत्म करने की मंशा देखी और समझी जा सकती है।

ज्यादा संभव है कि योगी को पद पर बने रहने दिया जाए और शर्मा को ताकतवर बनाकर उनके साथ बिठा दिया जाए लेकिन इस बात से सरकार कम और तकरार ज्यादा चलेगी। साथ ही योगी समर्थकों और खुद पार्टी का भी मनोबल  उस दौर ने कमज़ोर पड़ता नजर आएगा जब पार्टी के डेढ़ दर्जन विधायक इस्तीफा देकर साइकिल  पर चढ़ने की रणनीति बनाने में जुटे हैं।

दिल्ली तक प्रभावित होगी राजनीति

लखनऊ का ये बदलाव दिल्ली तक असर करेगा और दिल्ली की सूरत बदलने पर भी नागपुर का जोर होगा और उसका जवाब भी नागपुर से ही तलाशा जाएगा। लखनऊ के नए सियासी हालात के बाद दूर और पास के दुश्मन एक साथ सक्रिय होकर 2024 से पहले दिल्ली के निजाम को बदलने पर जोर डालेंगे जो बिल्कुल स्वाभाविक नजर आता है लेकिन उस समय संघ और बीजेपी के सामने उस मोदी से बड़ा चेहरा विकल्प के रूप में देने की चुनौती होगी, जो राम मंदिर और धारा 370 जैसे फैसलों के बाद अपराजेय सा दिखने लगा था।

लेकिन आर्थिक मसलों पर उसकी योजनाओं और विकास को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे। जहां तक कोरोना काल की बात है तो मोदी ने इसके लिए तालियां और आलोचनाएं दोनों बटोरी हैं ठीक योगी की तरह, जिन्हे कमज़ोर करने की पूरी तैयारी है।

गंगा के स्वघोषित बेटे मोदी और गंगा लिए भरपूर मेहनत करने वाले योगी दोनो पर ही सबसे ज्यादा सवाल गंगा की धारा और उसके किनारे से ही आए हैं। देखना ये है कि ये वक्त इन सवालों को किनारे लगाता है या इन दोनो नेताओं को किनारे लगाए जाने की कोशिशों को परवान चढ़ाता है।

भय, भूख और भ्रष्टाचार पर वार करने की बात करने वाली बीजेपी के चाल, चरित्र और चेहरे से रोटी, कपड़ा मकान, तालीम और सेहत की उम्मीद करने वाली जनता खुश नहीं है यही वजह है कि पार्टी को अपने लिए नाउम्मीदी का अंधेरा दिखाई पड़ रहा है और बिना इस अंधेरे के छंटे उम्मीदों का सूरज नहीं निकलेगा जो कमल के खिलने के लिए बेहद जरूरी है।

(लेखक अखबार और टीवी के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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