प्रभु की पुकार हमें कैसे सुनाई देगी?

प्रभु की पुकार हमें कैसे सुनाई देगी?
प्रभु की पुकार हमें कैसे सुनाई देगी?

प्रभु को पुकारें कैसे, यह तो बहुत लोग पूछते हैं, प्रभु की पुकार कैसे सुनाई दे, यह कभी-कभी कोई पूछता है। इसलिए प्रश्न महत्वपूर्ण है, विरल है, थोड़ा बेजोड़ है। और सत्य के ज्यादा करीब है।

असली सवाल प्रभु को पुकारने का नहीं है। हमारे पास जबान कहां जिससे हम प्रभु को पुकारें! और हमारी वाणी की सामर्थ्य कितनी? जाएगी थोड़ी दूर और खो जाएगी शून्य में। कितनी यात्रा करेगी हमारी वाणी? और हम जो भी कहेंगे, उसमें कहीं न कहीं हमारी वासना की छाप होगी। हमारी प्रार्थनाएं हमारी वासनाएं ही हैं। और वासनाएं उस तक कैसे पहुंचेगी?

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प्रार्थना में वासना छिपी हो तो जैसे पक्षी के कंठ में किसी ने पत्थर बांध दिया। अब उड़ान संभव न हो सकेगी। और हमारी सारी प्रार्थनाएं वासनाओं से भरी होती हैं। प्रार्थना शब्द का अर्थ ही मांगना हो गया। प्रार्थी का अर्थ हो गया मांगने वाला, क्योंकि प्रार्थना के नाम से हम सदा ही मांगते रहे हैं।

इसलिए हम कैसे प्रार्थना करें, इससे झूठा धर्म पैदा होता है। यह सवाल ज्यादा गहरा हैः प्रभु की कैसे पुकार सुनाई दे? प्रभु पुकार ही रहा है, सिर्फ हमारे मस्तिष्क इतने शोरगुल से भरे हैं कि उसकी धीमी सी पुकार, उसकी सूक्ष्म पुकार, उसकी अति सूक्ष्म पुकार हमें सुनाई नहीं पड़ती। नक्कारखाने में उसकी वीणा के स्वर खो जाते हैं। वह वीणावादक है। उसके स्वर बारीक हैं, नाजुक हैं। उसके स्वरों को सुनने के लिए शून्य चित्त चाहिए। जितना शांत चित्त होगा, जितना निर्विचार चित्त होगा, उतनी ही संभावना बढ़ जाएगी, उसके स्वर सुनाई पड़ने लगेंगे।

निर्विचार चित्त में परमात्मा तत्क्षण उतर आता है। जैसे द्वार पर ही खड़ा था, प्रतीक्षा करता था कि कब हम निर्विचार हो जाएं और कब भीतर आ जाए। निर्विचार होते ही हमारा घूंघट उठा देता है; आमना-सामना हो जाता है, दरस-परस हो जाता है। चित्त को निर्विचार करो तो उसकी आवाज सुनाई पड़ेगी। और तब ऐसा नहीं है कि उसकी आवाज कृष्ण की आवाज में ही सुनाई पड़ेगी और राम की आवाज में, बुद्ध की आवाज में ही सुनाई पड़ेगी, इन कौओं की कांव-कांव में भी उसकी ही आवाज है। एक बार उसकी आवाज सुन ली, तो तुम सब जगह उसे पहचान सकोगे।

एक बार उसकी छवि आंख में आ गई, तो फिर तुम कहीं भी चूक न सकोगे। फिर कोयल में ही नहीं, कौए की कांव-कांव में भी, सुंदर फूल में ही नहीं, कांटे में भी उसकी ही छवि है। जीवन में ही नहीं, मृत्यु में भी उसका ही नृत्य है। और सुख में ही नहीं, दुख में भी उसकी ही छाया है, उसका ही साथ है। मन चाहिए शांत, शून्य। उसकी आवाज सुननी है तो ध्यान की अवस्था साधनी होगी।

ध्यान का इतना ही अर्थ होता हैः अपने को खाली करना। ध्यान प्रार्थना की तैयारी है। ध्यान पूजा का आयोजन है। ध्यान का अर्थ हैः निर्मल चित्त। ध्यान का अर्थ हैः शांत, सद्यस्नात, अभी-अभी नहाया हुआ, ताजा जैसे सुबह की ओस; एक स्वर नहीं, एक तरंग नहीं, अपना एक भी शब्द नहीं–निःशब्द– तत्क्षण उसकी आवाज सुनाई पड़ने लगेगी।

-ओशो