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    डर के आगे बस डर ही रखो भाई, जीत का राग न अलापो...
    • डॉ प्रदीप उपाध्याय, देवास (मप्र)

    हर कोई चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि डर के आगे जीत है। बड़ी-बड़ी कम्पनी वाले बड़े बड़े सेलिब्रिटीज चाहे वो खेल के मैदान से हो, चाहे फिल्म संसार से ,अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए उलजुलूल स्टंट बताकर कहते हैं कि डर के आगे जीत है।लेकिन भाई मेरे, आज दुनिया के सामने एक ऐसा चैलेंज आ खड़ा हुआ है कि कोई उसके सामने आकर सीना तानकर, खम ठोंककर नहीं कह सकता कि डर के आगे जीत है।आखिर कौन कह सकता है कि डर के आगे जीत है। वैसे भी गलतफहमी में नहीं रहना है।लाख जमाना कहे कि डरना मना है लेकिन अभी तो गांठ बांधकर रख लो कि हमें तो डरना है। हम तो डरकर ही जीत हांसिल करेंगे।

    किसी फिल्म में देखा था कि एक बच्चे के हाथ पर कुछ लोग लिख देते हैं कि ‘मेरा बाप चोर है ‘और ठीक इसी तरह आज के हालात में भले ही लोग आपको डरपोक का तमगा दे दें या फिर माथे पर या हाथ पर यह ठप्पा लगा दें कि यह आदमी डरपोक है तब भी चलेगा लेकिन बहादुरी नहीं दिखाना है।बहादुरी दिखाना ही है तो दिखाने के बहुतेरे अवसर मिलेंगे, उस समय पीठ मत दिखा देना। हाँ, अभी पीठ भी दिखाओगे तो मैं तुम्हारी तारीफ़ ही करूंगा।

    हो सकता है कि कहने वाले कह दें कि क्या यार,तुम तो निरे डरपोक निकले,तुममें जरा भी साहस नहीं है।कुछ तो हिम्मत रखा करो। ऐसे क्या मुँह छुपाना।ऐसे डरने से काम नहीं चलेगा। घर से बाहर तो निकला करो। तब भी ऐसे लोगों की बातों की परवाह न करते हुए उनकी बातों को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देना ही समझदारी है। वे बहकावेंगे,बहलाएंगे लेकिन उनकी बात सुनकर दुस्साहसी बनने की कोशिश नहीं करना है।

    यूं तो गब्बर भी बड़ी बड़ी बात करता था।वह कहता भी था कि पचास-पचास कोस दूर तक ,जब बच्चा रोता है तो माँ कहती है कि सो जा , सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा। अब वह जमाना नहीं रहा और गब्बर जैसे लोग खुद सड़क पर आ गए हैं।वे खुद भी डरने लगे हैं। सांभा-वांभा,कालिया-वालिया खुद सड़को पर नहीं दिखाई दे रहे हैं।वैसे अब गब्बर-वब्बर आज के हालात में आने से रहे और आ भी गए तो उनकी खुद की ही हालत पतली होती चली जाएगी, ऐसे में वे तुम्हारा क्या बिगाड़ लेंगे।

    इसीलिए कह रहा हूँ कि इन लोगों से डरने की जरुरत नहीं है और फिर तुम्हें बहादुरी ही दिखाना थी तो उन जैसे लोगों के खिलाफ़ बहादुरी दिखा सकते थे लेकिन तब तो डर के मारे तुम्हारी सिट्टीपिट्टी गुम हो जाया करती थी और आज जब तुमसे डरने को कहा जा रहा है तो सीना तानकर बाहर निकल रहे हो। संभल जाओ! सुधर जाओ!

    माना कि जिनके सिर इस डर को बताने की जिम्मेदारी है वे खुद तुम्हें सड़क पर आने को ललचा रहे हैं लेकिन समझ लो कि जान है तो जहान है।मन के भीतर छुपे डर के मामले में ही कहा गया है कि डर के आगे जीत है लेकिन यहाँ तो खौफ सामने दिखाई दे रहा है कोरोना का खौफ़ और एक तुम हो कि भीड़ में इकट्ठा हो रहे हो! खुले मुँह घर से बाहर निकल रहे हो,मुँह पर मॉस्क नहीं लगा रहे हो। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं कर रहे हो और जब वाइरस जकड़ लेता है तो दूसरों को कोसने बैठ जाते हो।

    इसीलिये समझा रहा हूँ।कोई रैली में बुलाए तो जाना नहीं है।घर बैठकर ही इबादत, पूजा,तीर्थ हो जाएंगे।खबरदार हो जाओ। मॉस्क नहीं लगाओगे ,दूरी नहीं रखोगे, अनावश्यक रूप से घर से बाहर असावधानी के साथ निकलोगे तो बाद में ऑक्सीजन मॉस्क ही चढ़वाना पड़ेगा। और जरूरी नहीं कि इस ऑक्सीजन मॉस्क में तुम्हें ऑक्सीजन भी मिल जाए! अभी भी समय है,मान जाओ !डर जाओगे तो ही जीत है।इसीलिए भाई,डर के आगे डर ही रखो।तभी जीत तुम्हारी होगी।क्या समझे!

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    News Desk

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