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मेरठ में एक ऐसा मार्केट है जहां से सात लाख से भी अधिक परिवार सीधे खरीदारी करते हैं…
मगर अफसोस कि अब उस मार्केट पर बुल्डोजर चलाने की तैयारी है….
इस मार्केट में काम करने वाले पचास हजार से भी अधिक लोगों के रोजी-रोटी पर लगने वाला है ग्रहण…
आखिर इस मार्केट में ऐसा क्या हो गया कि सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने ‘बेदर्दी बालमा’ की तर्ज पर कहर बरपाना शुरू कर दिया….
बतायेंगे पूरी कहानी, सुनायेंगे व्यापारियों की जुबानी….
मगर-मगर-मगर…. अंगूठा उठाइये और चैनल पर दे मारिये… इससे हम आपके मुरीद हो जायेंगे और फेसबुक व यूट्यूब पर कोई भी वीडियो डालेंगे तो सबसे पहले आपको बतायेंगे…
… तो बात यह है कि मेरठ का दिल कहे जाने वाले सेंट्रल मार्केट को लेकर हाल ही में देश की सबसे बड़ी अदालत से एक आदेश आया, जिसके बाद से व्यापारियों से लेकर यहां काम करने वाले हजारों लोगों में बेचैनी बढ़ गई…
मामला मीडिया में सुर्खियां पकड़ रहा है तो दूसरी ओर इस मुद्दे पर व्यापारी संगठनों में भी कोई जोर आजमाइश का माहौल नहीं दिख रहा है…. सेंट्रल मार्केट में व्यापारी नेताओं की बाढ़ है मगर सब एक दूसरे पर खींचतान करने के साथ स्वयं को “भूखंड विजेता” घोषित करने में लगे हैं…
पहले मामला समझते हैं…
10 साल पूर्व 2013 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेंट्रल मार्केट के आवासीय प्लॉटों पर व्यवसायिक निर्माण को अवैध निर्माण मानते हुये ध्वस्तीकरण आदेश पर मुहर लगा दी… इससे व्यापारी वर्ग में निराशा और नाउम्मीदी दिखी… सबने मिलकर ‘जोर लगाके हइशा’ की तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी…. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को उचित माना और सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने सेंट्रल मार्केट स्थित भूखंड संख्या-661/6 समेत अन्य अवैध निर्माण को गिराने के लिए कहा।
बस यही आदेश व्यापारियों के गले की फांस बन गया है और फालतू के मुद्दों पर अपनी मूंछे ऐठने वाले भूखंड विजेता अपनी ही दुकानों को बचाने में फ्लॉप साबित हो रहे हैं।
अब आवास विकास परिषद मेरठ का रोल क्या है इसे भी जानते हैं…
शास्त्रीनगर क्षेत्र में आवास विकास ने 1974 में कालोनी बसाई… 1976 में आवंटन किया गया… यहां पर 6500 आवासीय प्लॉटों की कॉलोनी विकसित की गयी थी, जिसमें से 800 घरों में दुकानें, शोरूम, बेकरी, रेस्टोरेंट व अन्य व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो गई थी…
1995 में अफसरों की सांठगांठ से शुरू हुआ यह खेल ऐसा बढ़ा कि यहां घर-घर में दुकानें और शोरूम खुल गए। समय के साथ–साथ सेंट्रल मार्केट मेरठ के पॉश बाजारों में शामिल हो गया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब आवास विकास की तरफ से सर्वे किया गया तो इसका खुलासा हुआ. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने में मार्केट से अवैध निर्माण हटाने का निर्देश दिया है तथा इस निर्माण में दोषी अफसरों पर भी विभागीय कार्रवाई करने की बात कही।
आवास विकास के अफसरों कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अमल में लाते हुए कार्रवाई की जाएगी…. मगर वो अपने भ्रष्ट, बंईमान अफसरों पर क्या कार्रवाई करेगा इस बारे में कोई भी अधिकारी स्पष्ट रूप से कुछ कहने को तैयार नहीं है…
उधर व्यापारियाें में गुटबाजी और मत–भिन्नता देखी जा रही है…. व्यापारी नेता पंकज बजाज ने अपनी राय रखते हुये कहा कि जब पूरा सेंट्रल मार्केट आवासीय भूखंड पर व्यावसायिक गतिविधि कर रहा है तो केवल भूखंड संख्या-661/6 पर ही बुल्डोजर चलाना न्यायसंगत नहीं है। इस पोस्ट के बाद से व्यापारियों में जो एकता थी भी वह अब और बिखर गई है…
मेन सेंटर मार्केट व्यापार संघ के अध्यक्ष जितेंद्र अग्रवाल का कहना है कि पंकज बजाज की ओर से व्यापारियों की एकता को खंडित करने वाला मैसेज भेजा गया जो गलत है। व्यापारी नेता की शह पर वह ऐसा काम कर रहा है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
दूसरी ओर सेंट्रल मार्केट के व्यापारी नेता किशोर वाधवा का कहना है कि पंकज बजाज ने न्याय संगत अपना मत रखा था, लेकिन नकारात्मक सोच वाले लोगों ने इसे बेवजह तूल दे दिया। जिन व्यापारियों को नोटिस मिले हैं व्यापारियों के हित के लिए उन सभी को बुलाकर जल्द ही बैठक कर आंदोलन की रणनीति बनाई जाएगी।
… दूसरी तरफ कोई अन्या व्यापारी संगठन इस मुद्दे को पहचानने से इंकार रहे हैं… शायद उनकी दुकानें यहां नहीं है इसलिये कोई खास हो–हल्ला दिखाई नहीं दे रहा है…
अब बात करते हैं कि क्या इसका कोई उपाय है…
दोस्तों कहते हैं कि ‘होइहें सोई जो राम रुचि राखा’…. मतलब जो नियत है वह तो होगा ही…. मगर इसमें राज्य सरकार चाहे तो व्यापारियों को राहत मिल सकती है… मगर स्थानीय व्यापार प्रकोष्ठ के बड़े–बड़े नेताओं में इतनी समर्थता नहीं दिख रही है… बहरहाल समाधान यह है कि यहां की जमीनों का लैंड यूज चेंज कर दिया जाये तो सबकुछ बच जायेगा…
यह काम राज्य सरकार कर सकती है और कामर्शियल एक्टिविटी लिये भूखंड के नेचर में बदलाव कर सकती है…. इसके अलावा शायद कोई अन्य ठोस विकल्प नहीं बचा है…
बहरहाल आप क्या सोचते हैं इस मामले में… हमें अपनी राय कमेंट कर बताइये… मेरठ में विकास प्राधिकरण द्वारा भी ऐसी कई कालोनियां बसाई जा चुकी हैं जो अवैध व गलत तरीके से बनाई गई है…. अनुरोध है कि अपने पैसों का सही तरह से कानून के अनुसार इस्तेमाल करें वरना सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों की तरह ही आपको भी पछतावा होगा…










