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वाईएसआर कांग्रेस के मुखिया जगन मोहन रेड्डी की मुश्किलें बढ़ी

आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस के नेता वाईएस जगन मोहन रेड्डी की मुश्किलें बढ़ रही हैं। उनकी पार्टी के दो राज्यसभा सांसदों, बेदा मस्तान राव और मोपादेवी वेंकटरमण ने इस्तीफा दे दिया है। दोनों सत्तारूढ़ तेलुगू देशम पार्टी में शामिल होंगे। गौरतलब है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वाईएसआर कांग्रेस के बुरी तरह से हारने के बाद भी जगन मोहन रेड्डी ने केंद्र सरकार और भाजपा को चेतावनी देने के अंदाज में कहा था कि चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी के पास 16 लोकसभा सांसद हैं तो वाईएसआर कांग्रेस के पास भी 11 राज्यसभा और चार लोकसभा के यानी 15 सांसद हैं। उन्होंने बताया था कि संसद में उनकी ताकत चंद्रबाबू नायडू से कम नहीं है। अब उनकी ताकत में सेंध लग गई है। उनके दो राज्यसभा सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है, जिसके बाद राज्यसभा में उनकी संख्या 11 से घट कर नौ रह गई है।

कहा जा रहा है कि जगन मोहन रेड्डी की पार्टी के पांच और सांसद पार्टी छोड़ सकते हैं। वे टीडीपी के संपर्क में बताए जा रहे हैं। आमतौर पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ऐसा होता है। 2019 में जब नायडू की पार्टी हारी थी तब उनके चार राज्यसभा सांसद भाजपा में चले गए थे। सवाल है कि अगर जगन के पांच सांसद टीडीपी के संपर्क में हैं तो उन्हें रोकने के लिए उनके पास क्या रास्ता है? अगर सांसदों ने सोच लिया है कि उनको सत्तारूढ़ गठबंधन के साथ जाना है तो उन्हें रोकना मुश्किल होगा। जगन मोहन रेड्डी के पास एक रास्ता सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग वाला है, जिन्होंने 2019 में विधानसभा का चुनाव हारने के बाद टूट की आशंका को देखते हुए अपने विधायकों को भाजपा में शामिल करा दिया था। बिना एक भी सीट जीते भाजपा के करीब एक दर्जन विधायक हो गए थे।

इसी तरह जगन मोहन रेड्डी अपने राज्यसभा सांसदों के टूट कर अपनी चिर प्रतिद्वंद्वी टीडीपी में जाने से से रोकने के लिए उन्हें खुद ही भाजपा में शामिल करा सकते हैं। इससे भाजपा का उनके प्रति सद्भाव बनेगा। ध्यान रहे उनके ऊपर गिरफ्तारी का संकट भी मंडरा रहा है। नायडू की सरकार उनके पीछे पड़ी है और उससे भी बचने का रास्ता भाजपा का सद्भाव ही है । हालांकि, टीडीपीइस वक्त भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टी है । ऐसी स्थिति में जगन मोहन रेड्डी की यह रणनीति सफल होगी, कहना मुश्किल है ।

यह भी संभव है कि भाजपा और टीडीपी मिल कर किसी रणनीति पर काम कर रहे हों ।

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