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राजनीति

अचर्चित चेहरों के हाथ में कमान, क्या चाहते हैं पीएम मोदी और अमित शाह?

  • निशांत झा, वरिष्ठ पत्रकार

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में BJP आलाकमान अपने हिसाब से बदलाव कर सका क्योंकि उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं था। थोड़ा-बहुत डर राजस्थान में था, लेकिन वहां भी उसकी हनक और धमक के आगे किसी की नहीं चली। आलाकमान ने बदलाव इसलिए किया क्योंकि उसे लोकसभा चुनाव जीतना है और अगले दस सालों के लिए नई BJP गठित करनी है।

जातीय समीकरण

लोकसभा चुनावों को देखते हुए जातिगत समीकरण नए सिरे से तराशने की कोशिश की गई है। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय से हैं। दो उपमुख्यमंत्रियों में एक सवर्ण और एक OBC हैं। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री OBC के बनाए गए तो उप-मुख्यमंत्रियों में एक सवर्ण और एक दलित समुदाय के। इसी तरह राजस्थान में मुख्यमंत्री ब्राह्मण को बनाया गया तो दो उपमुख्यमंत्रियों में राजपूत और दलित चेहरा सामने रखा गया।

आम चुनाव पर नजर

तीनों राज्यों में सिर्फ राजस्थान है, जहां एक महिला को भी प्रमुख जिम्मेदारी दी गई। जिस राज्य में BJP की झोली में वोट डालने वाली जातियों की जितनी संख्या रही, उसे देखते हुए सत्ता में भागीदारी दी गई है। साफ है कि जातीय समीकरणों के लिहाज से देखा जाए तो ये नाम हैरान नहीं करते। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या BJP तीनों राज्यों की 65 में से पिछली बार की तरह 62 सीटें जीत पाएगी, जिसके लिए सारी कसरत की गई है।

संघ की पृष्ठभूमि

मुख्यमंत्री ऐसे बनाए गए हैं, जिनकी हिंदुत्व में पूरी आस्था है। वे संघ की शाखाओं से निकले हैं। ABVP में ट्रेनिंग हासिल कर चुके हैं। ऐसे मुख्यमंत्री कम से कम अपने पहले कार्यकाल में लो प्रोफाइल रहेंगे। वे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के हिसाब से काम करेंगे। वहीं, मुख्य चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने रहेंगे। पार्टी का सारा ध्यान इस बीच समर्पित वोट बैंक को बनाए रखने के साथ फ्लोटिंग युवा वोटर में सेंधमारी पर रहेगा।

कांग्रेस का हाल

ध्यान रहे, तीनों राज्यों में BJP जीती जरूर, लेकिन कांग्रेस का वोट बैंक कम नहीं हुआ। कुछ जगहों पर तो यह बढ़ा ही है। ऐसे में BJP आलाकमान समझ गया है कि वोट बैंक का विस्तार हिंदुत्व या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से नहीं हो सकता। लाभार्थी और युवा वोटरों के हाथों में सत्ता की चाबी है। पीढ़ी परिवर्तन करके नए चेहरों के जरिए लाभार्थी और युवा वोटरों से नया करार करने की यह कोशिश है।

यूपी-बिहार के यादव वोट

मध्य प्रदेश में OBC की जगह OBC को मुख्यमंत्री बनाया गया है। ऐसा यादव मुख्यमंत्री जो बिहार, यूपी, हरियाणा और राजस्थान के यादवों को भी अपील करे। BJP आलाकमान यादव वोट का तोड़ निकालने में पहले से ही लगा है। मोदी सरकार में इस समय भूपेंद्र यादव, राव इंद्रजीत सिंह, नित्यानंद राय और अन्नपूर्णा यादव चार मंत्री हैं। पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष हंसराज अहीर भी महाराष्ट्र के यादव हैं। क्या अखिलेश यादव और लालू-तेजस्वी यादव के वोट बैंक में BJP की यह यादव बिग्रेड सेंध लगा पाएगी? यह देखना दिलचस्प रहेगा।

ब्राह्मण CM

राजस्थान में 1990 के बाद पहली किसी ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाया गया है। BJP को हिंदुत्व के मुद्दे को उभारना है। यहां सवर्ण जाति का वोट तो उसे मिलता ही रहा है, लेकिन पावर शेयरिंग में हिस्सेदारी कम होने की शिकायत भी यह वर्ग करता रहा है। देखना होगा कि तीनों राज्यों में एक मुख्यमंत्री और दो उप-मुख्यमंत्री पद ब्राह्मण समुदाय को देकर BJP यूपी, बिहार के सवर्ण वोटरों को खुश करने में कामयाब होती है या नहीं।

पार्टी का केंद्रीकरण

आरोप है कि मोदी की BJP इंदिरा गांधी की कांग्रेस जैसी हो गई है। लेकिन अगर ऐसा करके इंदिरा गांधी की तरह लंबे समय तक सत्ता में रहा जा सकता है तो इसमें हर्ज ही क्या है? कांग्रेस ने स्थानीय क्षत्रपों पर भरोसा करते हुए कर्नाटक जरूर जीता, लेकिन राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में हार गई। BJP आलाकमान समझ गया है कि स्थानीय क्षत्रपों के बेकाबू होने पर उन्हें संभाल पाना मुश्किल हो जाता है।

कास्ट सेंसस की काट

I.N.D.I.A. मोर्चे की तरफ से जातीय जनगणना को चुनावी धार दी जा रही है। भले ही विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा बहुत ज्यादा नहीं चला। फिर भी लोकसभा चुनाव में विपक्ष इसे नजरंदाज नहीं करेगा। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने चरणबद्ध तरीके से इसकी काट तलाशनी शुरू की। पहले कहा कि गरीब ही सबसे बड़ी जाति है। फिर चार वर्ग को चार जातियों में तब्दील कर दिया- गरीब , महिला, युवा और किसान।

दस साल में बदलाव

कुल मिलाकर यह BJP की नई तरह की रणनीति है। युवा को सामने लाओ, जो पार्टी को आगे बढ़ाएं और दस साल बाद नए चेहरे को रिले रेस की तरह सत्ता का बैटन सौंप दें। यह एक ऐसा प्रयोग है, जो सफल रहा तो सत्ता विरोधी लहर की परिभाषा को बदल कर रख देगा।

क्या करेगी कांग्रेस

सवाल है कि BJP ने तो 2018 की गलती 2023 में मान ली, लेकिन क्या कांग्रेस 2023 की गलती 2023 में ही सुधारने का साहस दिखा पाएगी। कहने को तो कांग्रेस ने भी तेलंगाना में पीढ़ी परिवर्तन किया और रेवंत रेड्डी के रूप में एक ऐसा सीएम दिया जो कर्नाटक के डीके शिव कुमार के साथ मिलकर पूरे दक्षिण भारत में कांग्रेस की कायापलट की क्षमता रखता है। लेकिन जो काम दक्षिण में हो सकता है, वह उत्तर भारत में क्यों नहीं हो सकता जहां कांग्रेस तेजी से सिकुड़ रही है?

I.N.D.I.A. को तरजीह

क्या अशोक गहलोत, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जगह युवा चेहरों को अभी से बड़ी जिम्मेदारियां दी जाएंगी ताकि लोकसभा चुनाव और पांच साल बाद के विधानसभा चुनावों के लिए तैयारियां अभी से शुरू कर दी जाएं। ऐसा होता दिख नहीं रहा है। कहा जा रहा है कि अभी I.N.D.I.A. को मजबूत बनाना प्राथमिकता है और संगठन में बड़े बदलाव लोकसभा चुनाव बाद होंगे। लेकिन तीनों राज्यों में कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष के रूप में तो नए चेहरों में निवेश कर ही सकती है।

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