Report by : eradioIndia.com
Published at :
विज्ञापन
विज्ञापन
गाजीपुर. जिला मुख्यालय से बिहार जाने वाले हाईवे पर करीब 35 किमी की दूरी तय करने पर गहमर गांव है। इस गांवकी पहचान आबादी के लिहाज से एशिया के सबसे गांव के रूप में है। इसकी एक और पहचान है। 1.20 लाख आबादी के इस गांव में 25 हजार सैनिक या पूर्व सैनिकहैं। हर घर में सेना की वर्दी टंगी है। 1962 की जंग हो याफिर 1964, 1971 का युद्ध चाहेकारगिल की लड़ाई। सभी जंगों के गवाहइस गांव के सैनिक हैं।

यूं बढ़ा देशसेवा का जज्बा

इस गांव की बेटियाें को अब तक सेना में सेवाएं न दे पाने का मलाल है। भूतपूर्व सैनिक कल्याण समिति के अध्यक्ष मार्कंडेय सिंह बताते हैं। 37 साल पहले तक गांव में सेना भर्ती कैंप लगाती थी, लेकिन 1983 में अचानक इसे बंद कर दिया गया। गांव वाले कई बार सरकारों से कैंप लगवाने की मांग कर चुके हैं, जो पूरी नहीं हुई।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय गहमर के 226 सैनिक अंग्रेजी सेना में शामिल थे।21 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए थे। तब से भारतीय सेना में जाने का जज्बा गहमर वासियों के लिए परम्परा बन चुका है। गहमर की पीढ़ियां दर पीढ़ियां अपनी इस विरासत को लगातार संभाले हुए हैं। वर्तमान में गहमर के 15 हजार से अधिक जवान भारतीय सेना के तीनों अंगों में सैनिक से लेकर कर्नल तक के पदों पर कार्यरत हैं। 10 हजार से ज्यादा भूतपूर्व सैनिक गांव में रहते हैं।
1530 में बसाया गया था गांव
ग्राम प्रधान मीरा दुर्गा चौरसिया बताती हैं- गंगा किनारे बसा गहमर एशिया का सबसे बड़ा गांव माना जाता है। गांव की आबादी एक लाख बीस हजार है। गहमर 8 वर्ग मील में फैला हुआ है। गहमर 22 पट्टियों या टोले में बंटा है। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि साल 1530 में कुसुम देव राव ने सकरा डीह नामक स्थान पर गहमर गांव बसाया था। गहमर में ही प्रसिद्ध कामख्या देवी मंदिर भी है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत बिहार के लोगों के लिए आस्था का बड़ा केन्द्र है।

आजादी के बाद महज दो जवान हुए शहीद
गहमर गांव के लोग मां कामाख्या को अपनी कुलदेवी मानते हैं। आजादी के बाद 1961 की लड़ाई में जवान भानु प्रताप सिंह और 1971 की लड़ाई में शौकत अली ग्रेनेडियर शहीद हुए थे। उसके बाद आज तक कोई शहीद नहीं हुआ। मान्यता है कियह मां कामख्या के आशीर्वाद से है। हर सैनिक छुट्टी पर आने के बाद मां कामख्या का दर्शन करना नहीं भूलता है, वहीं सरहद पर जाने से पहले सैनिक मां कामाख्या धाम का रक्षा सूत्र अपनी कलाई पर बांध कर रवाना होता है।
कसरत करते दिखते हैं गांव के युवा, बेटियां भी हो रहीं सशक्त
यहां की लड़कियां पुलिस, टीचिंग एवं अन्य नौकरियों में कार्यरत हैं। उन्हें फक्र है कि उनके घर के लोग सरहद की सुरक्षा में जुटे हैं। गांव के बीच शहीदों के नाम का स्मारक है। पार्क भी बना है। जिसमें सुबह-शाम युवक सेना भर्ती की तैयारी करते दिखते हैं। गांव के अतुल सिंह बताते हैं “हम लोग भले ही सेना की तैयारी में जी-जान से जुटे हैं, किंतु लगभग 37 सालों से गांव में सेना भर्ती न होने से नाराजगी भी है। अगर सरकार ध्यान देती तो यहां से और भी ज्यादा संख्या में युवा देश की सेवा में खुद को समर्पित कर पाते।”

सैनिक सेवा समिति भवन में लगी सैनिकों की लगी फोटो।
यूपी का गांव गहमर: यहां हर घर में सैनिक पर सेना में बेटियां एक भी नहीं, 37 साल से यहां नहीं लगा भर्ती कैंप
विश्व युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में स्मारक।
यूपी का गांव गहमर: यहां हर घर में सैनिक पर सेना में बेटियां एक भी नहीं, 37 साल से यहां नहीं लगा भर्ती कैंप
गांव में पंचायत भवन।
यूपी का गांव गहमर: यहां हर घर में सैनिक पर सेना में बेटियां एक भी नहीं, 37 साल से यहां नहीं लगा भर्ती कैंप
गांव में लगा अशोक स्तंभ।
यूपी का गांव गहमर: यहां हर घर में सैनिक पर सेना में बेटियां एक भी नहीं, 37 साल से यहां नहीं लगा भर्ती कैंप
गांव में स्मारक।
यूपी का गांव गहमर: यहां हर घर में सैनिक पर सेना में बेटियां एक भी नहीं, 37 साल से यहां नहीं लगा भर्ती कैंप
गांव में पार्क बनाया गया है।
यूपी का गांव गहमर: यहां हर घर में सैनिक पर सेना में बेटियां एक भी नहीं, 37 साल से यहां नहीं लगा भर्ती कैंप
गांव के नाम से यहां थाना है।
यूपी का गांव गहमर: यहां हर घर में सैनिक पर सेना में बेटियां एक भी नहीं, 37 साल से यहां नहीं लगा भर्ती कैंप
गांव का एक दृश्य।
यूपी का गांव गहमर: यहां हर घर में सैनिक पर सेना में बेटियां एक भी नहीं, 37 साल से यहां नहीं लगा भर्ती कैंप
गांव में कामख्या मंदिर, लोग मां को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।
eradioindia.com
सैनिकों की समस्याओं के निवारण के लिए समिति बनी है।
Send Your News to +919458002343 email to eradioindia@gmail.com for news publication to eradioindia.com
Follow E RADIO INDIA on WhatsAppJoin ›