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    नेपाल की सत्ता में बालेन शाह: नई राजनीति, बड़े वादे और कठिन चुनौतियाँ

    भारत के सबसे करीबी पड़ोसी देश नेपाल की राजनीति में एक नए दौर का प्रवेश हुआ है। वहाँ 36 वर्षीय बालेंद्र शाह (बालेन) का प्रधानमंत्री पद तक पहुँचना किसी राजनीतिक करिश्मे से कम नहीं है। यह राजनीतिक संस्कृति में परिवर्तन कहा जा सकता है। शुक्रवार को रामनवमी के मौके पर काठमांडू के राष्ट्रपति भवन ‘शीतल निवास’ में आयोजित एक भव्य समारोह में बालेंद्र शाह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह शपथ हिंदू रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई, जहाँ सात शंख बजाकर कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इसे शुभ और मंगल का प्रतीक माना जाता है।

    भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बालेन को बधाई देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “नेपाल के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने पर बालेंद्र शाह को बहुत-बहुत बधाई। आपकी नियुक्ति नेपाल के लोगों द्वारा आपके नेतृत्व पर दिखाए गए भरोसे को दर्शाती है। मैं आपके साथ मिलकर काम करने के लिए उत्सुक हूँ, ताकि भारत-नेपाल की दोस्ती और सहयोग को हमारे दोनों देशों के लोगों के आपसी फायदे के लिए और भी ऊँचाइयों पर ले जाया जा सके।” इससे पहले बालेन की जीत के अवसर पर भी मोदी ने उन्हें बधाई देकर खुशी जताई थी।

    नेपाल में पिछले वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और शासन की विफलताओं ने जनता में गहरा असंतोष पैदा किया। विशेष रूप से वहाँ की सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंध लगाने के निर्णय ने युवाओं को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया। काठमांडू में हुए हिंसक प्रदर्शनों और सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। 19 युवाओं की मौत ने इस आंदोलन को जनविद्रोह का स्वरूप दे दिया। इस आंदोलन में 70 से भी अधिक नागरिकों की जान चली गई थी।
    ‘जनरेशन जी’ नाम से उभरे इस आंदोलन ने पूरे राजनीतिक तंत्र पर सवाल खड़े किए थे। सरकारी संपत्तियों को नुकसान और तत्कालीन प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली का इस्तीफा इस बात का संकेत था कि जनता अब पारंपरिक राजनीतिक ढाँचे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। यह वही क्षण था जब बालेन शाह जैसे गैर-पारंपरिक नेता एक विकल्प के रूप में उभरकर सामने आए। राजनीतिक संकट के बीच के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन नेपाल के संवैधानिक ढाँचे की लचीलेपन को दर्शाता है। छह महीने के भीतर मध्यावधि चुनाव कराने का निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास को बनाए रखने का प्रयास था। हालांकि, इस संक्रमण काल में यह भी स्पष्ट हुआ कि पारंपरिक दल जनता का विश्वास पुनः अर्जित करने में विफल रहे।

    टीवी कलाकार रबी लामिछाने द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) 2023 के चुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर चुकी थी। 20 से अधिक सीटें जीतकर उसने नेपाली राजनीति में एक तीसरी शक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। बालेन ने इसी पार्टी को चुनाव से पहले जॉइन कर प्रतिनिधि सभा (नेपाली संसद) में जोरदार बहुमत हासिल किया। उनकी पार्टी ने प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली की 165 सीटों में से 125 सीटें जीतीं। शेष 110 सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व (पीआर) प्रणाली के माध्यम से हुआ, जिसमें आरएसपी ने 57 सीटें जीतीं और संसद की 275 सीटों में से 182 सीटें प्राप्त कीं। यह नेपाल की राजनीति में एक रिकॉर्ड स्थापित हुआ, जबकि किसी एक पार्टी को इतना प्रचंड बहुमत पहली बार मिला। इस तरह बालेन की पार्टी आरएसपी ने विपक्षी पार्टियों को हाशिए पर खड़ा कर दिया है। आरएसपी ने चुनाव में पारंपरिक राजनीति से हटकर युवा, पेशेवर और गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों को आगे बढ़ाया है। बालेन शाह का नेतृत्व इसी प्रयोग का परिणाम है। दिलचस्प बात यह है कि रबी लामिछाने ने स्वयं सत्ता में कोई पद न लेकर बालेन को आगे बढ़ाया, जो रणनीतिक सोच का संकेत है।

    एक रैपर से काठमांडू के मेयर और फिर प्रधानमंत्री बनने तक बालेन की यात्रा युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वे उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पारदर्शिता और डिजिटल युग की राजनीति में विश्वास रखती है।
    हालांकि, बालेन के लिए सत्ता में आना जितना कठिन था, उससे कहीं अधिक कठिन उसे प्रभावी ढंग से संचालित करना भी होगा। उनकी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता की अपेक्षाओं को पूरा करना है। ‘जनरेशन जी’ आंदोलन ने जिस परिवर्तन की मांग की थी, उसे व्यवहार में लागू करना आसान नहीं होगा। उनकी पार्टी ने चुनाव में कई बड़े वादे किए। अब प्रधानमंत्री बनने के बाद इन पर खरा उतरने की चुनौती उन पर होगी। उनकी पार्टी ने लोगों की आय दोगुनी करके 3 हजार डॉलर करने का वादा किया। इसके अलावा 12 लाख नौकरियाँ देने का वादा किया, ताकि देश से पलायन को रोका जा सके। आर्थिक मोर्चे पर भी नेपाल को बेरोजगारी, महँगाई और सीमित औद्योगिक विकास जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, भारत और चीन के बीच संतुलन बनाना भी एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती है। नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है, लेकिन यही स्थिति उसे दबाव में भी रखती है।

    बालेन शाह ने मेयर बनने के बाद अपने दफ्तर में एक विवादित नक्शा लगाया था। इसमें उन्होंने भारत के हिस्सों को नेपाल में दिखाया था। पिछली के. पी. ओली सरकार ने भी यही रणनीति अपनाई थी। उन्होंने भारत के साथ कई स्थानों पर सीमा विवाद पैदा करने की कोशिश की। ऐसे में बालेन शाह के सामने भारत के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की भी कसौटी पर खरा उतरना होगा। बालेन शाह के सामने अवसर है कि वे प्रशासनिक सुधार के माध्यम से सरकार का एक नया मॉडल प्रस्तुत करें। काठमांडू के मेयर के रूप में उनके कार्यकाल में कुछ नवाचार देखने को मिले थे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इन प्रयोगों को लागू करना कहीं अधिक जटिल होगा।

    नेपाल की सत्ता का बालेन शाह के हाथों में आना एक ऐतिहासिक क्षण है। यह उस जनभावना का परिणाम है, जो बदलाव चाहती है और पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़ना चाहती है। नई पीढ़ी पारंपरिक विचारधाराओं से परे जाकर मुद्दा-आधारित राजनीति में विश्वास करती है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म इस परिवर्तन के प्रमुख माध्यम बन रहे हैं। अब देखना यह होगा कि नेपाल की राजनीति में यह परिवर्तन कितना स्थायी होगा। इतिहास गवाह है कि जनआंदोलनों से उत्पन्न सरकारें अक्सर अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाती हैं। यदि बालेन शाह अपनी सरकार को स्थिर और प्रभावी बना पाते हैं, तो यह न केवल नेपाल बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक मिसाल बन सकता है। लेकिन यदि वे असफल होते हैं, तो यह प्रयोग भी एक अस्थायी उभार बनकर रह जाएगा।

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    प्रो. (डा.) सुभाष चंद्र थलेडी

    (लेखक समसामयिक विषयों के स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं वरिष्ठ मीडियाकर्मी हैं।)

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