
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘विकसित भारत संकल्प सभा’ में दिया गया संदेश केवल राजनीतिक उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में कर्म, कर्तव्य और सेवा की अवधारणा को रेखांकित करने वाला वक्तव्य है। 2047 तक विकसित भारत, दुनिया की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में स्थान, आत्मनिर्भरता, विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनने और अंतरिक्ष क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल करने जैसे लक्ष्य निश्चित रूप से महत्वाकांक्षी हैं। लेकिन इन लक्ष्यों की सार्थकता तभी है, जब वे सत्ता के नारों से आगे बढ़कर सामूहिक राष्ट्रीय संकल्प बनें।
प्रधानमंत्री ने अपने राजनीतिक जीवन को ‘पद’ के बजाय ‘मिशन’ से जोड़ते हुए कर्म को धर्म बताया। भारतीय परंपरा में यह विचार नया नहीं है। भगवद्गीता का ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ कर्म करते रहने और परिणाम की चिंता से मुक्त रहने की प्रेरणा देता है। सार्वजनिक जीवन में इसका अर्थ यह होना चाहिए कि पद व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है। लोकतंत्र में सत्ता का मूल्य तभी है, जब उसका इस्तेमाल नागरिकों के जीवन में वास्तविक सुधार के लिए हो।
भारत के सामने आज विकास की अनेक संभावनाओं के साथ गंभीर चुनौतियां भी हैं। आर्थिक वृद्धि, रोजगार, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यावरण और सामाजिक असमानता जैसे प्रश्न केवल सरकारों से नहीं सुलझ सकते। ‘सबका प्रयास’ का भाव तभी प्रभावी होगा, जब शासन के साथ नागरिक, उद्योग, किसान, श्रमिक, वैज्ञानिक और युवा भी अपनी भूमिका को समझें। विकसित भारत का सपना केवल ऊंची जीडीपी या बड़े बुनियादी ढांचे से पूरा नहीं होगा; उसके लिए बेहतर मानव विकास और सामाजिक विश्वास भी जरूरी है।
इस संदर्भ में समाज को जाति, समुदाय और वोट के आधार पर बांटने की प्रवृत्ति पर प्रधानमंत्री की टिप्पणी महत्वपूर्ण है। पानी की कमी, बिजली का संकट, महंगाई, बेरोजगारी या प्रदूषण किसी एक जाति अथवा समुदाय की समस्या नहीं होते। इसलिए सार्वजनिक नीति का आधार भी व्यापक नागरिक हित होना चाहिए। लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन विकास की बुनियादी जरूरतों को विभाजन की राजनीति से ऊपर रखना आवश्यक है।
भारत की ऊर्जा और आत्मविश्वास निश्चित रूप से उसकी बड़ी पूंजी हैं। सौर ऊर्जा, कृषि और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में हुई प्रगति यह दिखाती है कि स्पष्ट लक्ष्य और निरंतर नीतिगत प्रयास परिणाम दे सकते हैं। लेकिन उपलब्धियों के साथ आत्ममंथन भी जरूरी है। विकसित राष्ट्र बनने की यात्रा में यह देखना होगा कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितनी समानता से पहुंच रहा है।
प्रधानमंत्री ने पद और प्रतिष्ठा से ऊपर देशसेवा को रखा है। यही विचार लोकतांत्रिक सार्वजनिक जीवन की कसौटी भी बनना चाहिए। राजनीति में आने का उद्देश्य व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नहीं, जनविश्वास की जिम्मेदारी होना चाहिए। इसी तरह नागरिकों के लिए भी राष्ट्रनिर्माण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है।
2047 का लक्ष्य दूर जरूर है, लेकिन उसकी नींव आज के निर्णयों से ही रखी जाएगी। इसलिए ‘हम करके रहेंगे’ का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ ईमानदार प्रयास, जवाबदेही, सामाजिक समरसता और निरंतर कर्म जुड़ा हो। भारत को विकसित बनाने की यात्रा अंततः किसी एक व्यक्ति, सरकार या दल की नहीं, बल्कि पूरे देश की साझा यात्रा है।
