
एआई के डेटा सेंटर पानी और ऊर्जा का अधिक उपयोग करते हैं।
एआई के विकास के साथ पर्यावरण संतुलन आवश्यक है।
कंपनियों को पानी की खपत में पारदर्शिता लानी चाहिए।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई आज आधुनिक दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती तकनीक में से एक है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, उद्योग, अंतरिक्ष, रक्षा और संचार से लेकर रोजमर्रा के जीवन तक इसका उपयोग बढ़ रहा है। चैटबाट, एआई सर्च, तस्वीर और वीडियो बनाने वाली तकनीक अब हमारी डिजिटल जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं, लेकिन एआई के विकास का एक पर्यावरणीय पक्ष भी है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। आम लोगों को लगता है कि एआई केवल मोबाइल या कंप्यूटर पर काम करता है, लेकिन इसके पीछे बड़े-बड़े डाटा सेंटरों में हजारों शक्तिशाली सर्वर लगातार चलते रहते हैं।
एआई माडल को प्रशिक्षित करने और उपयोगकर्ताओं के सवालों के जवाब देने के लिए बहुत अधिक कंप्यूटिंग शक्ति चाहिए। इससे सर्वर गर्म होते हैं और उन्हें ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा और कुछ मामलों में पानी की भी जरूरत पड़ती है। दुनिया पहले ही जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, बढ़ती आबादी और तेज शहरीकरण के कारण जल संकट का सामना कर रही है। ऐसे में डाटा सेंटरों की बढ़ती जल आवश्यकता नई चिंता पैदा कर रही है। इसलिए एआई के विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण का संतुलन जरूरी है।
भविष्य में ऐसी तकनीक और डाटा सेंटर विकसित करने होंगे, जो कम पानी और ऊर्जा का उपयोग करें। यह समझना जरूरी है कि एआई स्वयं पानी का इस्तेमाल नहीं करता। पानी की खपत मुख्य रूप से उन डाटा सेंटरों में होती है, जहां एआई सेवाओं को चलाने वाले हजारों सर्वर और शक्तिशाली ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट यानी जीपीयू लगातार काम करते हैं। एआई माडल की ट्रेनिंग और संचालन के दौरान ये मशीनें बहुत गर्म हो जाती हैं। उन्हें ठंडा रखने के लिए अलग-अलग कूलिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें कुछ प्रणालियां पानी पर आधारित होती हैं। वाष्पीकरणीय कूलिंग में पानी गर्मी को सोखकर भाप के रूप में वातावरण में चला जाता है। इस कारण इस्तेमाल किया गया पानी पूरी तरह वापस उपलब्ध नहीं हो पाता। जैसे-जैसे एआई का इस्तेमाल बढ़ेगा, वैसे-वैसे डाटा सेंटरों में कंप्यूटिंग और सर्वरों की संख्या भी बढ़ सकती है। इससे गर्मी को नियंत्रित करने के लिए अधिक ऊर्जा और कुछ परिस्थितियों में अधिक पानी की जरूरत होगी।
एआई का वाटर फुटप्रिंट केवल डाटा सेंटरों तक सीमित नहीं है।
इसके पीछे ऊर्जा उत्पादन की भी बड़ी भूमिका है। एआई माडल को प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है। दुनिया के कई हिस्सों में बिजली उत्पादन अभी भी कोयला और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर है। थर्मल पावर प्लांटों में बिजली उत्पादन और कूलिंग प्रक्रियाओं के लिए पानी की जरूरत होती है। इस प्रकार एआई के लिए इस्तेमाल की गई बिजली का एक हिस्सा अप्रत्यक्ष रूप से जल संसाधनों पर भी दबाव डाल सकता है।
यही कारण है कि एआई के पर्यावरणीय प्रभाव को समझते समय केवल डाटा सेंटर के भीतर इस्तेमाल होने वाले पानी को देखना पर्याप्त नहीं है। बिजली उत्पादन, चिप निर्माण, सर्वर निर्माण सहित पूरी आपूर्ति शृंखला में प्रयोग हुए वाटर फुटप्रिंट को भी ध्यान में रखना होगा। इस दृष्टि से एआई का एनवायरमेंटल फुटप्रिंट एक बहुस्तरीय समस्या है-जल, ऊर्जा, कार्बन उत्सर्जन और इलेक्ट्रानिक कचरे के रूप में इसके कई आयाम हैं और जैसे-जैसे जेनरेटिव एआई और लार्ज लैंग्वेज माडल का विस्तार हो रहा है, यह प्राकृतिक संसाधनों और जलवायु पर भारी दबाव डाल रहा है।
बड़ी टेक कंपनियां भी अब इस चुनौती को पहचानने लगी हैं। कई कंपनियां जल संरक्षण, जल पुनर्भरण की दिशा में काम करने का दावा कर रही हैं। वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण और अधिक कुशल कूलिंग तकनीकें इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती हैं। इसके अलावा ऐसे डाटा सेंटरों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो पुनर्चक्रित या गैर-पेयजल का इस्तेमाल कर सकें, लेकिन कंपनियों के वादे पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत पारदर्शिता की है। हर बड़े डाटा सेंटर को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि वह प्रतिदिन कितना पानी इस्तेमाल करता है, पानी का स्रोत क्या है, कितना पानी पुनर्चक्रित किया जाता है और स्थानीय जल संसाधनों पर उसका प्रभाव कितना है। सरकारों को भी डाटा सेंटरों की स्थापना के लिए स्पष्ट पर्यावरणीय मानक तय करने चाहिए।
नि:संदेह एआई मानव सभ्यता की सबसे शक्तिशाली तकनीक में से एक बन गई है,
लेकिन यह भी देखना जरूरी है कि इसके विकास का पर्यावरण पर कितना असर पड़ रहा है। चूंकि हर डिजिटल गतिविधि के पीछे ऊर्जा, पानी और अन्य संसाधनों की जरूरत होती है और एआई के बढ़ते इस्तेमाल के साथ डाटा सेंटरों की संख्या और उनकी ऊर्जा तथा पानी की मांग भी बढ़ रही है। इसलिए अब एआई को केवल तकनीकी चमत्कार के रूप में देखने के बजाय उसके पर्यावरणीय प्रभाव पर भी ध्यान देना जरूरी होगा। जरूरत ऐसी जिम्मेदार और टिकाऊ तकनीक की है, जो कम ऊर्जा और पानी में अधिक काम करे तथा अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाए। डिजिटल विकास तभी सार्थक होगा, जब वह मानव जीवन को बेहतर बनाने के साथ पृथ्वी और उसके सीमित संसाधनों की भी रक्षा करे।








