मेरठ। क्या अब अवैध निर्माण पर बुलडोज़र की सबसे बड़ी कार्रवाई होने जा रही है? क्या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के मकानों को भी अब कोई विशेष राहत नहीं मिलेगी? और क्या आवासीय भवनों में चल रहे स्कूल, अस्पताल और डायग्नोस्टिक सेंटर भी अब कार्रवाई की जद में आ सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट की आज की सुनवाई ने साफ संकेत दे दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा है—”जो अवैध है, वह हटेगा।” आइए जानते हैं इस महत्वपूर्ण सुनवाई की पूरी कहानी।
नई दिल्ली में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आवास विकास परिषद के क्षेत्रों में अवैध निर्माण और आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि कोई निर्माण स्वीकृत नक्शे और मास्टर प्लान के अनुरूप नहीं है, तो उसे किसी भी स्थिति में वैध नहीं बनाया जा सकता। अदालत के अनुसार ऐसे निर्माणों की कंपाउंडिंग का प्रश्न ही नहीं उठता।
सुनवाई के दौरान आवास विकास परिषद ने अदालत से अनुरोध किया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS श्रेणी के 328 मकानों में एक से तीन मीटर तक हुए छोटे निर्माण को वर्ष 1982 के नियमों के तहत कंपाउंड करने की अनुमति दी जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल EWS श्रेणी में होने के आधार पर किसी को कानून से छूट नहीं मिल सकती। न्यायालय ने कहा कि वह किसी विशेष वर्ग के लिए अलग नियम नहीं बनाएगा।
अदालत का संदेश बिल्कुल साफ था। यदि कोई निर्माण अनधिकृत है, तो उसे हटाना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून का पालन सभी पर समान रूप से लागू होगा और किसी भी अवैध निर्माण को बाद में नियमित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण मुद्दा सामने आया। अदालत ने कहा कि आवासीय क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर, बैंक या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां नियमों के विपरीत हैं। यदि किसी को व्यवसाय करना है तो उसके लिए निर्धारित व्यावसायिक या संस्थागत परिसर का उपयोग किया जाना चाहिए, न कि आवासीय भवनों का।
डायग्नोस्टिक सेंटर से जुड़े एक मामले में अदालत ने कड़ी नाराजगी भी जताई। जब संबंधित पक्ष के वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल के पास मुख्य चिकित्सा अधिकारी यानी CMO का प्रमाणपत्र है और वे अस्पताल नहीं बल्कि डायग्नोस्टिक सेंटर चला रहे हैं, तो सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि ऐसी अनुमति किस आधार पर दी गई। अदालत ने संबंधित CMO का नाम पूछते हुए संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर उन्हें भी तलब किया जा सकता है। न्यायालय ने सवाल उठाया कि क्या डायग्नोस्टिक सेंटर व्यावसायिक गतिविधि नहीं माना जाएगा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक और गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि एक शहर में अवैध निर्माण की स्थिति इतनी चिंताजनक है, तो राज्य के अन्य हिस्सों की स्थिति का भी गंभीरता से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि यदि पूरा भवन व्यावसायिक उपयोग में बदल चुका है तो पूरे भवन को ध्वस्त किया जा सकता है। वहीं यदि केवल अतिरिक्त हिस्सा अवैध है तो पहले 15 दिन का नोटिस दिया जाएगा। भवन स्वामी को स्वयं अवैध निर्माण हटाने का अवसर मिलेगा और यदि ऐसा नहीं किया गया तो संबंधित प्राधिकरण ध्वस्तीकरण करेगा। इतना ही नहीं, ध्वस्तीकरण पर होने वाला पूरा खर्च भी भवन स्वामी से भू-राजस्व की तरह वसूला जाएगा।
एक अन्य मामले में अदालत ने पाया कि जिस भवन की स्वीकृति आवासीय उपयोग के लिए दी गई थी, वहां बाद में स्कूल संचालित किया जाने लगा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ऐसा स्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि स्कूल चलाना है तो उसके लिए वैध संस्थागत परिसर होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान कुछ पक्षों ने नगर के बायलॉज़ और स्थानीय नियमों का हवाला देकर राहत देने की मांग भी की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि बायलॉज़ का सहारा लेकर लोगों की जान जोखिम में नहीं डाली जा सकती। न्यायालय के लिए मानव जीवन और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में आग की घटनाओं का भी उल्लेख किया और कहा कि अवैध निर्माण तथा संकरी जगहों पर किए गए अतिक्रमण लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। इसलिए ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की नरमी उचित नहीं होगी।
सबसे अहम निर्देश पूरे शहर में कार्रवाई को लेकर आया। अदालत ने आवास विकास परिषद से पूछा कि कार्रवाई केवल कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित क्यों रखी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरे शहर में व्यापक निरीक्षण किया जाए, सभी अवैध निर्माणों की पहचान की जाए, सेटबैक में हुए अतिक्रमण हटाए जाएं और अगली सुनवाई तक अनुपालन रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत की जाए। अदालत ने अधिकारियों से यह भी कहा कि चयनात्मक कार्रवाई से भेदभाव के आरोप लग सकते हैं, इसलिए कानून का पालन सभी मामलों में समान रूप से होना चाहिए।
कुल मिलाकर, आज की सुनवाई ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अवैध निर्माण के मामलों में सुप्रीम कोर्ट अब किसी भी प्रकार की रियायत देने के पक्ष में नहीं है। चाहे मामला EWS मकानों का हो, स्कूल, अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर या किसी अन्य व्यावसायिक गतिविधि का—यदि निर्माण स्वीकृत नक्शे और मास्टर प्लान के विपरीत है तो कार्रवाई तय मानी जाएगी। अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर होगी, जब आवास विकास परिषद को पूरे शहर में की गई कार्रवाई की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश करनी होगी।







