
- 1857 की महान क्रांति में तमाम राजाओं और क्रांतिनायकों के नाम प्रमुखता से आते हैं, पर पत्रकारों की बलिदानी भूमिका पर खास रोशनी नहीं पड़ती है।
लेकिन जनांति में जब सभी आहुति दे रहे थे तो भला उस समय के पत्रकार पीछे कैसे रहते। यह सही है कि 1857 की बुनियाद सिपाहियों ने डाली थी शुरू से अंत तक वही इसकी रीढ़ बने रहे, लेकिन इसमें भाग लेनेवालों में मजदूर किसान, जागीरदार पुलिस और सरकारी कर्मचारी और पेंशनर, पूर्व सैनिक तथा लेखक और पत्रकार भी रहे हैं। इस क्रांति में पत्रकारिता क्षेत्र के नायक बने थे मौलवी मोहम्मद बाकर ,जिनके नेतृत्व में प्रकाशित होनेवाले देहली उर्दू अखबार ने 1857 में सैकड़ों तोपों जितनी मार की। मौलवी वाकर की आग उगलती लेखनी से अंग्रेज बहुत कुपित थे। लेकिन वह किसी दबाव में नहीं आए और लगातार लेखनी से जंग जारी रखी। दिल्ली पर कब्जा कर लेने के बाद अंग्रेजों ने मौलवी बाकर कर कई तरह के झूठे आरोप लगाए और उनको फांसी पर लटका दिया गया।
देहली उर्दू अखबार के लेखों ,रिपोर्टों, अपीलों, काव्य रचनाओं तथा फतवों से अंग्रेज अधिकारी खासे नाराज थे।
इसी नाते अखबार और उसके संपादक पर बगावत को भडक़ाने का आरोप लगाया गया। महान सेनानी मौलवी बाकर को दिल्ली में 14 सितंबर 1858 को गिरफ्तार किया गया और मुकदमे का नाटक किए बिना ही 16 सितंबर 1858 को कुख्यात अधिकारी मेजर हडसन ने फांसी पर लटका दिया। लेकिन यह दुखऱ् की बात है कि पत्रकारिता क्षेत्र के इस पहले और महान बलिदानी की भूमिका से खुद मीडिया जगत के ही अधिकतर लोग अपरिचित हैं। 1857 को दौरान देश में 99 फीसदी लोग निरक्षर थे और साक्षरता महज एक फीसदी थी। इस नाते अखबारों का बहुत प्रचार सीमित था लेकिन एक एक अखबार बांच कर हजारों लोगों तक सुनाए जाते थे लिहाजा उनकी पहुंच लंबी थी। पत्रकारिता के क्षेत्र में तब केवल प्रिंट मीडिया ही था और वह भी दो खेमो में बंटा था। एक तो अंग्रेजों का प्रबल हिमायती थी,जबकि दूसरा जनांति का समर्थक था।
देहली उर्दू अखबार जैसी बागी पत्रकारिता को ही नियंत्रित करने के लिए 13 जून 1857 को प्रेस को नियंत्रित करने के लिए लार्ड कैनिंग एक गलाघोंटू कानून लेकर आए। राजद्रोह पर बहुत कड़ी सजा के साथ पूर्व अनुमति के बिना प्रेस खोलना व उसे चलाना गैरकानूनी बना दिया गया। पर उस समय पयामे आजादी , देहली उर्दू अखबार ,समाचार सुधावर्षण और हिंदू पैट्रियाट समेत दर्जनो अखबारों ने सच लिखना जारी रखा यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि 1857 के कुछ समय पहले ही भारत में रेल और तार का आगमन हुआ था पर वे बहुत सीमित इलाकों तक ही थे और डाक की गति भी बहुत धीमी थी। ऐसे में एक से दूसरे जगहों पर आवाजाही या संदेश भेजना कितना कठिन रहा होगा,इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। ऐसे माहौल में भी महान क्रांति का दायरा बहुत लंबे चौड़े इलाके तक रहा।
इससे यह समझा जा सकता है कि चिंगारी को फैलाने में कितने लोगों का श्रम और बलिदान निहित रहा होगा। जाहिर है कि उस समय के कई अखबारों ने भी इसे गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। अखबारों ने बागियों के भीतर नया जोश और जबा पैदा करने का काम किया। शायद इसी नाते सभी तथ्यों को परख कर लार्ड केनिंग ने 13 जून 1857 को काफी तीखी टिप्पणी की थी और कहा था कि – …पिछले कुछ हफ्तों में देसी अखबारों ने समाचार प्रकाशित करने की आड़ में भारतीय नागरिकों के दिलों में दिलेराना हद तक बगावत की भावना पैदा कर दी है। बगावत के विस्तार में निसंदेह अखबारों का भी काफी महत्वपूर्ण योगदान था। देहली उर्दू अखबार भारत का ऐसा विरला राजनीतिक अखबार था जिसने अन्य भाषाओं के भारतीय अखबारों को रास्ता दिखाया। यह अखबार हर रविवार को प्रकाशित होता था।
भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में इस अखबार के 8 मार्च 1857 से 13 सितंबर 1857 तक के अधिकतर अंक उपलव्ध हैं।
दिल्ली की स्वतंत्रता के पहले के अंक भी काफी महत्व के हैं। मौलवी मोहम्मद बाकर केवल देहली उर्दू अखबार के संपादक और स्वामी ही नहीं, बल्कि जाने माने शिया विद्वान भी थे। इस अखबार के प्रिंट लाइन में प्रकाशक के रूप में सैयद अब्दुल्ला का नाम छपता था। दरबार में भी मौलवी बाकर की गहरी पैठ और सम्मान था जबकि दिल्ली शहर में उनकी विशेष हैसियत थी। जाने माने शायर जौक समेत कई जानेमाने लोग उनके मित्र थे।
शुरूआत में अपने पिता से ही मौलवी बाकर को प्रारंभिक शिक्षा मिली। बाद में दिल्ली के जाने-माने विद्वान मियां अब्दुल रजाक के सानिध्य में उन्होंने शिक्षा पाई और 1825 में उनका देहली कॉलेज में दाखिला कराया गया, जहां अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वह शिक्षक बने। इसी जगह से उनकी विद्वता ने धाक जमाना शुरू किया। अपनी शिक्षा की बदौलत वह महत्वपूर्ण सरकारी ओहदों पर 16 साल तक रहे लेकिन इसके बाद अपने पिता के कहने पर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और धार्मिक शिक्षा के प्रसार में जुट गए। उन्होंने छापाखाना लगाया और देहली उर्दू अखबार शुरू किया।
हालांकि अंग्रेजी राज में अखबार निकालना बहुत टेढ़ा काम था पर 1836 में मैटकाफ के प्रयासों से जो उदार माहौल बना था उसी को देखते हुए मौलवी ने उर्दू अखबार प्रेस खड़ा किया। जिस मकान से यह समाचार पत्र प्रकाशित किया गया वह दरगाहे पंजा शरीफ (कश्मीरी गेट) से बिल्कुल मिलता था और आज भी मौजूद है। यही उनका घर भी था। इस अखबार ने देश के विभिन्न भागों में अपने प्रतिनिधि भी नियुक्त किए थे। अवध में भी इसके कई प्रतिनिधि थे। मौलवी बाकर की कलम आग उगलती थी। उन्होंने समाज के सभी वर्गों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया। क्रांति के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र दिल्ली में यह अखबार ांति को जनांति बनाने में काफी सहायक हुआ।
देहली उर्दू अखबार बाकी अखबारों से इस नाते भी विशिष्ट है क्योंकि यही क्रांति के बड़े नायकों के काफी करीब था
और प्रमुख घटनाओं को इसके संपादक तथा संवाददाताओं ने बहुत नजदीक से देखा। वैसे तो जामे जहांनुमा को उर्दू का पहला अखबार माना जाता है, पर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में यह किसी भूमिका से बाहर था। देहली उर्दू अखबार ने आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया और ऐतिहासिक बलिदान दिया। वैसे जहां तक इस अखबार की भूमिका का सवाल है तो 1857 के पहले इस अखबार में दिल्ली के सभी क्षेत्रों को कवर किया जाता था। अन्य अखबार भी ऐसा कर रहे थे। लेकिन आजादी की जंग के साथ ही देहली उर्दू अखबार का तेवर भी तीखा होता गया। इस अखबार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के लूट राज के खिलाफ खुल कर लोहा लिया। अखबार ने 1857 से संबंधित खबरों को बहुत प्रमुखता से प्रकाशित किया । अखबार का प्रयास रहता था कि महत्वपूर्ण घटनाओं के समय उसके संवाददाता मौके पर मौजूद रहें। इतना ही जनभावनाओं को और विस्तार देने तथा जोश भरने के लिए इस अखबार ने वीर रस का साहित्य भी प्रकाशित किया। धर्मगुरुओं के फतवों तथा बागी नेताओं के घोषणापत्र को भी इस अखबार में प्रमुखता से स्थान मिला।
ऐसी बहुत सी खबरें प्राथमिकता के साथ छापी गईं जिससे बागियों का हौंसला और बुलंद होता हो।
जून 1857 के बाद अखबार की भाषा-शैली में काफी बदलाव आता दिखता है। देहली उर्दू अखबार ने जहां एक ओर सिपाहियों की खुल कर तारीफ की वहीं दूसरी ओर जहां कमियां पाई गईं वहां उसने उसे भी खुल कर लिखा। सिपाहियों को उसने सिपाह-ए-दिलेर, तिलंगा-ए-नर-शेर के रूप में संबोधित कर रहा था। हिंदू सिपाहियों को वह अर्जुन या भीम बनने की नसीहत दे रहा था तो दूसरी ओर मुसलमान सिपाहियों को रूस्तम, चंगेज और हलाकू की तरह अंग्रेजों को समाप्त करने की बात कर रहा था।
सिपाहियों के प्रति उसकी विशेष सहानुभूति तो दिखती ही है, तमाम खबरों को पढ़ कर यह भी नजर आता है कि उसके संवाददाताओं की सिपाहियों के बीच में अच्छी खासी पैठ भी थी। अखबार ने कई मौकों पर बागी सिपाहियों को सिपाहिए हिंदुस्तान भी कहा। अखबार हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रबल पैरोकार था। उसने कई मौकों पर अंग्रेजों की सांप्रदायिक तनाव फैलाने की चालों को बेनकाब पर हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को खबरदार किया। देहली उर्दू अखबार का विचार पक्ष भी काफी मजबूत था। 21 जून 1857 को देहली उर्दू अखबार ने तीसरे पेज पर जो टिप्पणी लिखी, वह देखने लायक है- अंग्रेजी राज में सैकड़ों रुपए मासिकवाले सारे बड़े पद (जिसमें अधिक की कोई सीमा नहीं थी) आपस में अपने रंगवालों को दे दिए जाते थे।
जैसा कि प्रसिध्द है, अंधा बांटे रेवड़ी, फिर अपने-अपने को दे…यह धन वे बड़ी कंजूसी से खर्च करते थे।
वे हजारों लाखों रुपए बचाते थे और अपने देश ले जाते थे। उनका धन किसी प्रकार हमारे भारतवर्ष में न फैलता था न ही उससे हमें कुछ लाभ होता था। भारतीयों में तो बहुत थोड़े से 100 रुपया वेतन पाते थे।
अब ईश्वर ने चाहा तो जल्दी ही जिलों का प्रबंध होगा और इतने इलाके होंगे कि विद्वान लोग ढूंढने पर भी खाली नहीं मिलेंगे। नया राय अभी-अभी स्थापित हुआ है ऐसे में कुछ दिन तुम्हारे लिए कठिनाई है…। यह भी उल्लेखनीय है कि मौलवी बाकर के पुत्र मोहम्मद हुसैन आजाद काफी अच्छे शायर थे। ांति के दौरान उनकी रचनाएं अखबार के पहले पेज पर छपती थीं। 1857 को लेकर उनकी यह नम 25 मई 1857 को मेरठ में विद्रोही सेना की विजय के समाचार के साथ छपी थी ‘सब जौहरे अक्ल उनके रहे ताक पर रक्खे सब नाखूने तदबीरो खुर्द हो गए बेकार काम आए न इल्मो हुनरो हिकमतो फितरत पूरब के तिलंहो ने लिया सबको वहीं मार।
‘ इस अखबार ने 5 जुलाई 1857 के अंक में अखबार ने जामा मस्जिद पर चिपके एक भड़काऊ इश्तहार की पूरी खबर बारीकी से छानबीन कर छापने के साथ अंग्रेजों की रणनीति का भंडाफोड़ किया। इस इश्तहार में कहा गया था कि मुसलमान हिंदुओं के खिलाफ जेहाद करें क्योंकि इसाईयत तो किताबिया धर्म है इस नाते मुसलमान ईसाइयों के निकट हैं। इश्तहार में यह भी कहा गया था कि कारतूस में सुअर की चर्बी की बात भी बिल्कुल झूठ है। स्वाभाविक है कि यह इश्तहार तनाव फैलाने के लिए लगाया गया था। इससे काफी तनाव फैला भी। लेकिन पीछे के सारे षड़यंत्रों को उजागर कर देहली उर्दू अखबार ने उसका बिंदुवार जवाब दिया और एकता को खंडित नहीं होने दिया। कई दृष्टियों से यह महान अखबार और उसके संपादक मौलवी बाकर सदियों तक याद किए जाते रहेंगे। यही नहीं, भारतीय पत्रकारिता के इस पहले महान बलिदानी से युवा पत्रकार हमेशा प्रेरणा पाते रहेंगे।








