रसमलाई के तंज से सियासी संदेश तक: बीएमसी नतीजों में जीत का स्वाद

रसमलाई के तंज से सियासी संदेश तक: बीएमसी नतीजों में जीत का स्वाद

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में निर्णायक जीत और बीएमसी में मजबूत प्रदर्शन के बाद भारतीय जनता पार्टी का उत्साह केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सियासी प्रतीकों और तंज के जरिए भी सामने आया। इस बार जीत का प्रतीक बनी “रसमलाई”, जो सीधे तौर पर राजनीति के हालिया शब्द–युद्ध से जुड़ गई। कर्नाटक के बेंगलुरू सेंट्रल से भाजपा सांसद पी.सी. मोहन का एक्स पर “कुछ रसमलाई ऑर्डर की हैं” लिखना महज मिठाई की बात नहीं थी, बल्कि यह उस सियासी कटाक्ष का जवाब था, जो कुछ समय पहले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे की ओर से तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अन्नामलाई पर किया गया था।

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बीएमसी के नतीजों ने भाजपा को वह आत्मविश्वास दिया है, जिसके सहारे वह विपक्ष के तंज को अब पलटकर जवाब दे रही है। युवा सांसद तेजस्वी सूर्या ने भी जीत को “रसमलाई जैसा मीठा” बताते हुए इसे प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में “ट्रिपल इंजन सरकार” की सफलता से जोड़ा। उनका संदेश साफ था कि यह जीत केवल राजनीतिक अंकगणित नहीं, बल्कि विकास और प्रशासनिक स्थिरता के दावे का प्रमाण है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को बधाई देते हुए भाजपा नेताओं ने यह संकेत भी दिया कि मुंबई के पुनर्विकास और जीवन की सुगमता को अब इस जीत के नैरेटिव से जोड़ा जाएगा।

इस पूरे प्रसंग की जड़ में अन्नामलाई का वह बयान है, जिसमें उन्होंने मुंबई को केवल महाराष्ट्र का नहीं, बल्कि विश्व का शहर बताया था। यह बात भाषायी और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति में तुरंत विवाद का कारण बनी। राज ठाकरे ने इसे अवसर बनाते हुए अन्नामलाई पर निजी तंज कसे और “रसमलाई” शब्द के जरिए उनका मजाक उड़ाया। लेकिन राजनीति में तंज तभी टिकता है, जब उसके पीछे जनादेश न हो। बीएमसी चुनाव के नतीजों ने भाजपा को मौका दे दिया कि वह उसी शब्द को जीत के उत्सव का प्रतीक बना दे।

जहां अन्नामलाई ने प्रचार किया, वहां भाजपा की जीत ने इस प्रतीकात्मक राजनीति को और धार दी। वार्ड 47 और 35 में भाजपा उम्मीदवारों की सफलता को पार्टी ने यह दिखाने के लिए इस्तेमाल किया कि शोर और भावनात्मक नारों के बजाय मतदाता ने काम और संगठनात्मक मजबूती को चुना है। मुंबई भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष तेजिंदर सिंह तिवाना का रसमलाई के साथ फोटो साझा करना और यह कहना कि “मुंबई में काम की जीत हुई है, शोर की नहीं” इसी सोच को आगे बढ़ाता है।

यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि शहरी स्थानीय निकाय चुनाव अब केवल पार्षदों और वार्डों की लड़ाई नहीं रह गए हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति, क्षेत्रीय अस्मिता और नेताओं की छवि से सीधे जुड़ने लगे हैं। एक शब्द, एक मिठाई और एक तंज—इन सबके जरिए राजनीतिक दल अपने-अपने समर्थकों को संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के लिए बीएमसी की जीत केवल सत्ता का विस्तार नहीं, बल्कि उस आलोचना का जवाब भी है, जो उसे क्षेत्रीय पहचान और बाहरी नेतृत्व के आरोपों के रूप में झेलनी पड़ती रही है।

अंततः, रसमलाई का यह सियासी सफर बताता है कि राजनीति में प्रतीक कितनी तेजी से अर्थ बदल लेते हैं। जो शब्द कभी तंज था, वही अब जीत का स्वाद बन गया है। सवाल यह है कि क्या इस मिठास के साथ शासन और विकास की ठोस डिलीवरी भी उतनी ही प्रभावी होगी। मुंबई के मतदाताओं ने अपना फैसला सुना दिया है, अब असली परीक्षा इस जनादेश को जमीन पर उतारने की है, ताकि जीत का स्वाद केवल चुनावी जश्न तक सीमित न रह जाए।