
लेकिन सरकारी जिम्मेदारी निभाने वाले कर्मचारियों से किसी नेता की प्रशंसा वाले वीडियो बनवाने का आरोप गंभीर सवाल खड़े करता है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर मध्य प्रदेश की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को लेकर सामने आया दावा केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र और राजनीतिक प्रचार के बीच की सीमा पर बहस का विषय है। कॉकरोच जनता पार्टी के सह-संयोजक सौरव दास ने दावा किया है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ग्रामीण महिलाओं को जुटाने, दीये बांटने और प्रधानमंत्री तथा उनकी योजनाओं की प्रशंसा वाले वीडियो रिकॉर्ड करने के निर्देश दिए गए। इन आरोपों के समर्थन में उन्होंने एक कथित ईमेल का स्क्रीनशॉट भी साझा किया है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आरोप सही या गलत होने से पहले यह है कि सरकारी व्यवस्था में काम करने वाले कर्मचारियों की भूमिका क्या होनी चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों, महिलाओं और पोषण से जुड़े सरकारी कार्यक्रमों को जमीन तक पहुंचाने वाली कार्यबल का हिस्सा हैं। उनसे किसी सरकारी योजना की जानकारी साझा कराने और किसी राजनीतिक नेता की व्यक्तिगत प्रशंसा वाले वीडियो बनवाने के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।
मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री के जन्मदिन से 17 अक्टूबर तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ चलाने की तैयारियां पहले से सार्वजनिक हैं। राज्य में ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम के तहत गांवों और शहरी वार्डों में दीप जलाने की योजना भी घोषित की गई थी। यानी दीये जलाने का कार्यक्रम अपने आप में कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं है। विवाद उस दावे को लेकर है कि क्या सरकारी कार्यकर्ताओं को इसके साथ राजनीतिक प्रशंसा वाले वीडियो बनाने के लिए निर्देशित किया गया।
यहीं से लोकतांत्रिक मर्यादा का सवाल सामने आता है। राजनीतिक दलों को अपने नेताओं के जन्मदिन, उपलब्धियों और योजनाओं के प्रचार का अधिकार है। नागरिक भी अपनी इच्छा से किसी अभियान में शामिल हो सकते हैं। लेकिन सरकारी जिम्मेदारी निभाने वाले कर्मचारी यदि किसी राजनीतिक प्रचार गतिविधि में शामिल होने के लिए दबाव महसूस करें, तो यह स्थिति अलग तरह की जांच और जवाबदेही की मांग करती है।
सौरव दास ने इसी बहस को आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कथित समस्याओं से जोड़ते हुए वेतन, काम के बोझ, रिक्त पदों, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे मुद्दे उठाए हैं। इन दावों में भी अलग-अलग बिंदुओं की स्वतंत्र जांच आवश्यक है, लेकिन मूल प्रश्न महत्वपूर्ण है—सरकारी व्यवस्था की ऊर्जा का प्राथमिक इस्तेमाल सेवा वितरण और कर्मचारियों की कार्यस्थितियां सुधारने में होना चाहिए या राजनीतिक प्रचार में?
इस पूरे मामले में सरकार की आधिकारिक स्थिति सामने आना इसलिए जरूरी है। यदि ऐसा कोई निर्देश जारी हुआ था, तो उसका उद्देश्य, आदेश जारी करने वाली संस्था और उसकी प्रशासनिक वैधता स्पष्ट होनी चाहिए। यदि ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं हुआ, तो सरकार के लिए इस दावे का तथ्यात्मक खंडन करना भी उतना ही जरूरी है। केवल आरोप और प्रत्यारोप से सरकारी कर्मचारियों तथा जनता के बीच पैदा हुए संदेह दूर नहीं होंगे।
लोकतंत्र में राजनीतिक समर्थन स्वैच्छिक होना चाहिए। किसी योजना से लाभ मिलने के बाद नागरिक उसके बारे में सकारात्मक राय रख सकता है, लेकिन सरकारी मशीनरी का काम नागरिकों की स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति सुनिश्चित करना भी है, न कि किसी खास राजनीतिक संदेश के लिए उन्हें तैयार करना।
इसलिए मध्य प्रदेश का यह विवाद एक व्यापक संस्थागत सवाल उठाता है। सरकार और राजनीतिक संगठन की भूमिकाओं की स्पष्ट सीमा जितनी मजबूत होगी, उतना ही प्रशासन पर जनता का भरोसा कायम रहेगा। जन्मदिन मनाना या सेवा कार्यक्रम आयोजित करना राजनीतिक गतिविधि का हिस्सा हो सकता है, लेकिन सरकारी कर्मचारियों की भूमिका और नागरिकों की स्वतंत्र इच्छा के बीच की रेखा धुंधली नहीं होनी चाहिए।
आखिरकार किसी भी सरकार की उपलब्धियों का सबसे मजबूत प्रमाण नागरिकों का स्वतंत्र अनुभव और सार्वजनिक सेवाओं की वास्तविक गुणवत्ता होती है। प्रशंसा जुटाने से ज्यादा जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि आंगनवाड़ी जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था में काम करने वाले कर्मचारियों को अपना मूल दायित्व निभाने के लिए पर्याप्त संसाधन, सम्मान और सुरक्षित कार्य वातावरण मिले।











