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  • असम में भाजपा की हैट्रिक की राह आसान या कठिन

    Assam election 2026 BJP analysis Himanta Biswa Sarma politics

    पूर्वोत्तर भारत की राजनीति में असम केवल एक राज्य नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से “प्रवेश द्वार” है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर के माध्यम से यह पूरे पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ता है। यही कारण है कि असम की राजनीतिक दिशा न केवल क्षेत्रीय, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करती है। 2026 का विधानसभा चुनाव इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। राज्य में 126 सीटों के लिए 9 अप्रैल को एक चरण में मतदान होगा। राज्य में विशेष पुनरीक्षण (एसआर) 2026 के तहत अंतिम मतदाता सूची के अनुसारकुल मतदाताओं की संख्या 2,49,58,139 है। यहाँ 2,43,485 नाम अंतिम सूची से हटाए गए हैं। असम में 1,24,82,213 पुरुष मतदाता हैं जबकि 1,24,75,583 महिला मतदाता और तृतीय लिंग वर्ग के 343 मतदाता हैं।

    असम की राजनीति में 2016 एक निर्णायक मोड़ था, जब सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने 15 वर्षों से सत्तारूढ़ कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया। यह बदलाव केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं था, बल्कि राजनीतिक संस्कृति और शक्ति-संतुलन में व्यापक परिवर्तन का संकेत था। इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि 2015 में हिमंता बिस्वा सरमा के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने से तैयार हुई। उनके आने के बाद भाजपा ने संगठनात्मक विस्तार और चुनावी रणनीति के स्तर पर अभूतपूर्व मजबूती हासिल की।

    2021 के चुनाव में भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 126 सदस्यीय विधानसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। भाजपा ने 60 सीटें जीतीं और सहयोगियों, असम गण परिषद और यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल के साथ मिलकर 75 से अधिक सीटों का आंकड़ा पार किया। इसके बाद हिमंता बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री बने और भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर अपनी पकड़ को मजबूत कर दिया। 2026 के चुनाव में भाजपा ने असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन बनाया है, जिसमें भाजपा 89, एजीपी 26 और बीपीएफ 11 सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं।

    भाजपा इस चुनाव में “डबल इंजन” विकास, बुनियादी ढाँचे के विस्तार, कनेक्टिविटी और कानून-व्यवस्था को मुख्य मुद्दा बना रही है। सरकार का दावा है कि पिछले पाँच वर्षों में राज्य की प्रति व्यक्ति आय ₹86,947 से बढ़कर ₹1,85,429 हो गई है, जो 113% की वृद्धि दर्शाती है। इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से शासन की छवि को मजबूत करने का प्रयास किया गया है। इस विकास नैरेटिव को जमीनी समर्थन भी मिलता दिखता है। गुवाहाटी स्थित असमिया लेखक, कवि और सीनियर ब्रॉडकास्टर दीपक सरमा कहते हैं, “पिछले पाँच वर्षों में हिमंता विश्वा सरमा ने राज्यभर में व्यापक विकास कार्य किए हैं, जो कांग्रेस अपने लंबे शासनकाल में नहीं कर सकी। उन्होंने युवाओं को पारदर्शी तरीके से सरकारी नौकरियाँ दी हैं, जिसके लिए उनकी सराहना होती है। जूबीन गर्ग हत्या प्रकरण से युवा वर्ग कुछ आहत अवश्य है, लेकिन मुख्यमंत्री ने जाँच में तेजी दिखाई है और अब मामला न्यायालय में विचाराधीन है।”

    हालाँकि, विकास के साथ-साथ असम की राजनीति में पहचान और नागरिकता के मुद्दे भी उतने ही प्रभावी हैं। ‘मिया मुसलमान’ का प्रश्न लंबे समय से राज्य की राजनीति के केंद्र में बना हुआ है। बांग्लाभाषी मुसलमानों को लेकर अवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय परिवर्तन की बहस लगातार तेज होती रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में मुस्लिम आबादी 34.22% थी, जो अब अनुमानतः 40% के आसपास मानी जा रही है। साउथ सालमारा, धुबरी और बरपेटा जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी का अनुपात अत्यधिक है। इन क्षेत्रों में पिछले वर्षों में चलाए गए अतिक्रमण विरोधी अभियानों ने इस मुद्दे को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

    इस परिप्रेक्ष्य में गुवाहाटी हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाष चंद्र केयाल का कहना है, “टिकट वितरण को लेकर भाजपा में असंतोष जरूर है, क्योंकि अन्य दलों से आए नेताओं को प्राथमिकता दी गई है और जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हुई है। इसके बावजूद राज्य में प्रभावी विपक्ष के अभाव में भाजपा के लिए सत्ता हासिल करना कठिन नहीं दिखता।” ‘मियां मुसलमान’ मुद्दे पर वे कहते हैं कि यह नया नहीं, बल्कि लंबे समय से चला आ रहा गंभीर विषय है। “राज्य के कई जिलों की जनसांख्यिकी में परिवर्तन हुआ है। मुख्यमंत्री ने अवैध प्रवासियों के मुद्दे को गंभीरता से उठाया है, लेकिन इसके कारण अन्य मुस्लिम समुदायों में भी असंतोष देखने को मिल रहा है।” कांग्रेस की स्थिति पर उनका आकलन है कि जिन क्षेत्रीय दलों से उसका गठबंधन हो रहा है, उनका प्रभाव सीमित है।

    असम की चुनावी राजनीति में चाय जनजाति (Tea Tribes) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह समुदाय राज्य की लगभग 20% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और 30-35 विधानसभा सीटों पर निर्णायक प्रभाव रखता है। डिब्रूगढ़, जोरहाट, नगांव और तिनसुखिया जैसे क्षेत्रों में इनकी उपस्थिति चुनावी परिणामों को सीधे प्रभावित करती है। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा चाय जनजाति और आदिवासी समुदायों के लिए प्रथम और द्वितीय श्रेणी की सरकारी नौकरियों में 3% आरक्षण की घोषणा इसी सामाजिक आधार को सुदृढ़ करने का प्रयास है। इससे इन समुदायों के युवाओं के लिए सरकारी नौकरी में नए अवसर खुलने की उम्मीद है।

    स्थानीय स्तर पर यह प्रभाव और स्पष्ट दिखाई देता है। तिनसुखिया जिले के डूमडूमा क्षेत्र से संस्कृति कर्मी एम. मणिराम सिंह का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में टिकट वितरण को लेकर असंतोष और विद्रोह के स्वर उभर रहे हैं। “इसके बावजूद ‘मियां मुसलमान’ मुद्दा मतदाताओं के बीच प्रभावी बना हुआ है।” वे आगे बताते हैं कि टी-ट्राइब समुदाय विशेष रूप से ऊपरी असम में निर्णायक भूमिका निभाता है। “यह समुदाय परंपरागत रूप से भाजपा का समर्थन करता रहा है और पार्टी में इसके प्रभावशाली नेता भी मौजूद हैं। कुछ क्षेत्रों में मुकाबला कड़ा है, लेकिन समग्र रूप से भाजपा का पलड़ा भारी नजर आता है।”

    विपक्ष की स्थिति पर नजर डालें तो कांग्रेस 2021 में 29 सीटों तक सीमित रह गई थी, जबकि एआईयूडीएफ ने कुछ क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बनाए रखी। यह परिणाम विपक्ष के बिखराव और नेतृत्व संकट को दर्शाता है। 2026 में भी विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती एकजुटता और विश्वसनीय नेतृत्व प्रस्तुत करना है। गौरव गोगोई जैसे नेता एंटी-इंकंबेंसी की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन केवल असंतोष को संगठित जनसमर्थन में बदलना आसान नहीं होता।

    भाजपा के सामने भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। टिकट वितरण को लेकर असंतोष, स्थानीय स्तर पर नाराजगी और कुछ क्षेत्रों में कड़े मुकाबले की स्थिति पार्टी के लिए चिंता का विषय हो सकती है। फिर भी उसका मजबूत संगठन, संसाधनों की उपलब्धता और नेतृत्व की स्पष्टता उसे बढ़त दिलाते हैं। पार्टी यह चुनाव महिला मतदाताओं के सहारे भी जीतना चाहती है। लगभग, 50 प्रतिशत महिला मतदाता हैं। वरिष्ठ चुनाव विश्लेषक डी. एन.बसुमातारी कहते हैं कि “महिला वोटर को हिमन्ता ने आर्थिक सहायता देकर उनका दिल जीता है। इसी तरह माइग्रेंट लेबर को भी भूमि आवंटित की है, जिससे उनकी दशकों पुरानी मांग पूरी हुई है। ” बसुमातारी कहते हैं कि “कांग्रेस के बड़े नेता पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए है। इससे भी कांग्रेस कमजोर हुई है। “

    अंततः, असम विधानसभा चुनाव 2026 केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं है। यह राज्य की राजनीतिक दिशा तथा विकास मॉडल पर जनमत का व्यापक परीक्षण है। क्या मतदाता विकास और स्थिरता को प्राथमिकता देंगे, या पहचान और असंतोष के मुद्दे चुनावी परिणाम तय करेंगे? क्या विपक्ष अपने बिखराव को दूर कर एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत कर पाएगा, या भाजपा तीसरी बार सत्ता में वापसी कर पूर्वोत्तर में अपनी पकड़ और मजबूत करेगी?

    इन सवालों के उत्तर ही असम की राजनीति का भविष्य तय करेंगे। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2026 की यह जंग केवल सीटों की नहीं, बल्कि विकास के मॉडल की निर्णायक लड़ाई है, जिसका प्रभाव असम से आगे पूरे पूर्वोत्तर भारत पर पड़ेगा। आने वाले चार मई को साफ हो जायेगा कि राज्य के मतदाताओं ने किसको पसंद किया है।

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    प्रो. (डॉ.) सुभाष चंद्र थलेडी

    (लेखक मीडिया स्टडीज के प्रोफेसर और भारतीय प्रसारण सेवा (IBS) के पूर्व अधिकारी हैं।)

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    News Desk

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