🌹प्रेम पर शंका क्यों होती है

🌹प्रेम पर शंका क्यों होती है
🌹प्रेम पर शंका क्यों होती है

आप केवल अपने जीवन की सकारात्मक चीज़ों पर ही शंका करते हैं? नकारात्मक चीज़ों पर शंका नहीं करते। आप किसी की ईमानदारी पर शंका करते हैं और उसकी बेईमानी पर विश्वास। जब कोई आपसे नाराज़ होता है तो उसकी नाराज़गी पर आपको कोई शंका नहीं होती। पर जब कोई कहे कि वे आपको प्रेम करते हैं तभी शंका आ जाती है और आप सोचने लगते हैं “क्या? सच में वे मुझसे प्रेम करते हैं?”

आप वास्तव में किसके साथ सहज और स्वच्छन्द अनुभव करते हैं ? उनके साथ जो आपके प्रेम पर सन्देह नहीं करता, जो नि:सन्देह विश्वास करता है कि आप उसको प्रेम करते हैं। है ना?

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जब कोई आपके प्रेम पर सन्देह करता है और आपको निरन्तर अपने प्रेम को साबित करना है तो फिर यह आपके लिए एक भारी बोझ बन जाता है। वे आपसे प्रश्न करते हैं और आपके प्रत्येक कार्य का स्पष्टीकरण चाहते हैं। आप जो भी करते हैं, उसकी व्याख्या देना मानसिक बोझ है। आपका स्वभाव है बोझ को हटाना, क्योंकि आप चैन नहीं महसूस करते।

आप सदा साक्षी हैं। स्वयं के कार्यों के प्रति भी आप उतने ही साक्षी हैं जितने दूसरों के कार्यों के प्रति। जब लोग आपसे आपके कार्यों का स्पष्टीकरण मांगते हैं तो वे कर्ताभाव से बोल रहे हैं और उस कर्तापन को आप पर थोप रहे हैं। यह बेचैनी लाता है। न तो स्पष्टीकरण माँगें और न ही दें।

‘सखा’ जीवन और मत्यु का साथी है – यह कभी साथ नहीं छोड़ता। सखा को केवल प्रियतम चाहिए। उसे ज्ञान या मुक्त्ति की परवाह नहीं। उत्कंठा, तृष्णा के कारण प्रेम अधूरा है। उसका प्रेम असीम है और अनन्तता में कभी पूर्णता संभव नहीं। उसका प्रेम अनन्त अपूर्णता में पूर्ण है। प्रेम के पथ का कोई अंत नहीं।

प्रेम सबसे बड़ी शक्ति है और वही आपको बिल्कुल कमज़ोर भी बना देती है। इसलिए ईश्वर नहीं चाहते कि आपका प्रेम और विश्वास और अधिक बढ़े। अत्यधिक प्रेम और निष्ठा से आप ईश्वर को कमज़ोर बना देते हैं इसलिए ईश्वर के लिए तो यही अच्छा है कि आपकी श्रद्धा, भक्ति कम रहे। सब कुछ तो वैसे ही चलता रहेगा।

प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम ना दो
प्रेम को केवल प्रेम रहने दो। उसे कोई नाम न दो। जब आप प्रेम को नाम देते हैं, तब वह एक संबंध बन जाता है, और संबंध प्रेम सीमित करता है।

आपमें और मुझमें प्रेम है। बस, उसे रहने दीजिये। यदि आप प्रेम को भाई, बहन, माता, पिता, गुरु का नाम देते हैं, तब आप उसे संबंध बना रहे हैं। संबंध प्रेम को सीमित कर देता है। स्वयं अपने साथ आपका क्या संबंध है? क्या आप अपने भाई, पति, पत्नी या गुरु हैं?

प्रेम को प्रेम ही रहने दो। उसे कोई नाम ना दो।

🌹ओशो 🌹💕💕